मालदा, पूॢणया का घटनाक्रम असहिष्णुता की चरम स्थिति

जहां बिहार के मुख्यमंत्री ने पूर्णिया कांड पर चुप्पी साध रखी है वहीं मालदा की घटना को बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्थानीय लोगों और सीमा सुरक्षा बल के बीच निरंतर चलने वाला संघर्ष बताया है। इस्लामी आतंकवादियों से ज्यादा खतरनाक उनकी ढाल बनकर खड़े होने वाले राजनीतिक दोषी हैं।

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
पश्चिम बंगाल के मालदा और उसके बाद बिहार के पूर्णिया में जो कुछ हुआ, वह इस बात का सबूत है कि समाज के एक वर्ग में असहिष्णुता की पैठ अत्यंत गहरी है, जो हिंसक होने से गुरेज नहीं करती। एक अत्यंत महत्वहीन व्यक्ति जिसकी साख उसके मोहल्ले तक में नहीं है और जो रासुका में निरुद्ध हो चुका है यदि उत्तर प्रदेश के एक मंत्री के कथन से उत्तेजित होकर उसी प्रकार की अभिव्यक्ति पैगम्बर मोहम्मद साहब के बारे में कर देता है, तो उसको क्या इतना महत्व दिया जाना चाहिए। क्या देशभर में लाखों लोगों को सडक़ों पर उतरना चाहिए और क्या पुलिस चौकी और हिन्दुओं की बस्ती को आग लगा देना चाहिए। ऐसा जिन लोगों ने किया है उन्होंने असहिष्णुता की चरम स्थिति का परिचय दिया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, कम से कम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के लोगों को तो स्मरण ही होगा कि बौद्धों द्वारा मुसलमानों के साथ किए गए व्यवहार का विरोध करने के लिए नमाज के बाद सडक़ पर उतरकर जैन मुनि महावीर और गौतम बुद्ध की प्रतिमा को तोड़ते हुए किस प्रकार का उग्र प्रदर्शन किया गया था।
उत्तर प्रदेश के मंत्री आजम खां आजकल जिस भाषा का प्रयोग कर विभिन्न प्रकार की घटनाओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, उससे उत्तेजित होना अस्वाभाविक नहीं है लेकिन ऐसी किसी भी उत्तेजना की प्रतिक्रिया हिंसात्मक नहीं हुई, होनी भी नहीं चाहिए। यह बात अलग है कि आजम खां ने सत्ता का सहारा लेकर अपने विरोधियों का मुंह बंद करने का प्रयास किया है। अखिलेश यादव सरकार उस पर मौन है जब सभी ओर से यहां तक कि सौ से अधिक मुस्लिम इमामों ने फ्रांस की घटना की निंदा की थी तब भी आजम खां ने अपनी प्रतिक्रिया से उनके कृत्यों का समर्थन किया था। हिन्दू महासभा के जिस व्यक्ति ने आजम खां की समलैंगिकता सम्बन्धी अभिव्यक्ति पर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया की थी, शायद ही वह इतना महत्वपूर्ण बन पाता जैसा उस पर उग्र प्रतिक्रिया के माध्यमों से किया गया है।
जहां बिहार के मुख्यमंत्री ने पूर्णिया कांड पर चुप्पी साध रखी है वहीं मालदा की घटना को बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्थानीय लोगों और सीमा सुरक्षा बल के बीच निरंतर चलने वाला संघर्ष बताया है। इस्लामी आतंकवादियों से ज्यादा खतरनाक उनकी ढाल बनकर खड़े होने वाले राजनीतिक दोषी हैं। जब कभी कोई आतंकी घटना होती है या उग्रवाद का घिनौना चेहरा बेनकाब होता है, मुस्लिम समुदाय की ओर से ‘इस्लाम की सहिष्णुता’ की मिसाल पेश किए जाने के लिए वक्तव्यों की आंधी चल पड़ती है। मुसलमानों की देशभक्ति संदेह से परे है। प्रश्न यह है कि देशभक्ति पर इस प्रकार के वक्तव्यों के अलावा कहां पर संदेह का संशय खड़ा किया गया। ऐसा वक्तव्य यदि आतंकी गतिविधियों में संलग्न या उनके मददगारों की गिरफ्तारी पर होता है तो उसका निहितार्थ कुछ और ही होता है। हमारे देश में दादरी की एक घटना पर जिसमें कुछ लोगों की संलिप्तता थी, ऐसी तूफानी प्रतिक्रिया हुई जिससे ऐसा लगता था कि इस देश में मुसलमान असुरक्षित है। एक व्यक्ति की उत्तेजनावश हत्या हो या हजारों की संख्या में सडक़ पर उतरकर आगजनी, लूटपाट और हत्या करने का मामला हो, दोनों ही निंदनीय है।
लेकिन क्या कारण है कि एक व्यक्ति की हत्या होने पर जिन लोगों ने देश-विदेश में भारत की छवि बिगाडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी वे और वे भी जो तटस्थ होने का दावा करते हैं, हजारों लोगों के उन्मादी कृत्य पर मौन हैं। एक ओर देश की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान में पल और बढ़ रहे आतंकी हमलावर हैं तो दूसरी ओर पूर्वी छोर पर जो सीमा बांग्लादेश से लगती है मुस्लिम बहुल इलाके हिंसात्मक हो गए हैं। क्या कारण है कि इस प्रकार की हिंसात्मक घटनाएं वहीं घटित हो रही हैं जहां मुस्लिम आबादी की बहुलता है। बंगाल और बिहार के सीमावर्ती इलाकों में बांग्लादेशियों को घुसपैठ की जो खुली छूट मिलती रही तथा जिससे सत्ता पाने के लिए लाभान्वित राजनीतिक दल उनकी ओर से नजर हटाकर शह देते रहे, उसने सीमान्त इलाकों में स्थिति को अत्यंत विस्फोटक बना दिया है जो प्रगट होने के लिए किसी बहाने का इंतजार करती रहती है। कमलेश तिवारी की अभिव्यक्ति आपत्तिजनक हो सकती है, लेकिन कमलेश इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं कि उसका ऐसा संज्ञान लिया जाता। उसका संज्ञान जिस प्रकार से लिया गया है, वह इस बात का प्रमाण देता है कि असहिष्णुता की जड़ें कहां और कितनी गहरी हैं।

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