मां-बाप की बीमारी और बच्चों की भूख पड़ रही कर्मचारियों पर भारी

  • वेतन बढ़ाने के साथ ही नियमितीकरण की मांग जोरों पर
  • आठ जुलाई से कार्य बहिष्कार करने की तैयारी में कर्मचारी

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। प्रदेश की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाने के नाम पर अस्पतालों में आउटसोर्सिंग से मानव संसाधनों की कमी को पूरा किया जा रहा है। इसके लिए अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों में भर्ती प्रक्रिया भी चल रही है। लेकिन जो संविदा कर्मचारी सालों से इन संस्थानों और अस्पतालों में काम कर रहे हैं , उनकी हालत बदतर है। ऐेसे कर्मचारियों के सामने परिवार की रोजी-रोटी चला पाना मुश्किल हो गया है। वर्षों से संविदा पर काम करने वाले कर्मचारी कुछ और करने की हालत में भी नहीं हैं। इन्हें आउटसोर्सिंग पर काम करने की एवज में छह से सात हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है। जो परिवार के लोगों का पेट पालने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाता है। इसलिए वर्षों से नियमित होने की आस लगाये आउटसोर्सिंग कर्मचारियों में शासन-प्रशासन के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है। जो कभी भी भयंकर रूप से सकता है।
राजधानी के अधिकांश अस्पतालों में मानव संसाधनों की आपूर्ति के नाम पर बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने का काम किया जा रहा है। युवा अपनी आंखों में रोजगार मिलने के सपने संजोए, आउटसोर्सिंग ही सही तथाकथित सरकारी नौकरी समझ कर खुश हो रहा है। वहीं जो लोग पहले से अस्पतालों तथा संस्थानों में आउटसोर्सिंग के माध्यम से काम कर रहे हैं। उनका दर्द कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। इनके दर्द पर मरहम लगाने और सांत्वना देने की बजाय जिम्मेदारों का साफ कहना है जो उचित होगा किया जायेगा। लेकिन कई साल का समय बीतने के बाद भी आउटसोर्सिंग का काम करने वालों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।
सपा सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में आउसोर्सिंग के माध्यम से कार्यरत 762 संविदा कर्मचारी 2012 से अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जानकारों की मानें तो यहां के संविदा कर्मचारियों की यह लड़ाई सनï््ï 2012 में तत्कालीन निदेशक डॉ. एम.सी.पंत के समय में शुरू हुई थी। तब से लगातार कर्मचारी आउटसोॢसंग में कम वेतन मिलने की समस्या को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। डॉ. पंत के जाने के बाद डॉ. नुजहत हुसैन संस्थान की निदेशक बनीं, उस समय तक संविदा कर्मचारियों ने अपना संघ नही बनाया था। लेकिन एक घटना ने उनको अपना संगठन बनाने पर मजबूर कर दिया। कर्मचारियों के मुताबिक 2014 में आसिफ नाम के कर्मचारी का पर्चा बनाते समय किसी तीमारदार से झगड़ा हो गया। इस घटना में उस कर्मचारी के सिर पर चोट आ गयी। कर्मचारियों का आरोप था कि उस समय संस्थान में उसकी मरहम पट्ïटी भी नहीं हो पायी थी। कर्मचारियों ने आसिफ को ले जाकर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय में इलाज कराया था। ऐसे में कर्मचारियों ने अपना संगठन बनाने का निर्णय लिया।
कर्मचारियों को इलाज में भी नहीं मिलती छूट
लोहिया संस्थान में आउटसोर्सिंग पर काम करने वाले कर्मचारियों को इलाज में भी किसी प्रकार की छूट नहीं मिलती है। कर्मचारियों का कहना है कि संस्थान में वेतन भी कम मिलता है। यदि कोई मरीज बीमार हो जाता है, तो उसे संस्थान में सस्ते इलाज के माध्यम से कोई सुविधा नहीं दी जाती है। इसलिए संस्थान के लोगों के अमानवीय व्यवहार से कर्मचारी बहुत दुखीं हैं। उनका आरोप है कि जिनके लिए हम सारा दिन काम करते हैं, वे हमारे दुख की घड़ी में कोई सहयोग नहीं करते हैं।
पहला मामला-
कर्मचारियों का कहना है कि अन्य अस्पतालों में अपने कर्मचारियों तथा उनके परिजनों के सस्ते इलाज की व्यवस्था रहती है। लेकिन हमारे लिए संस्थान में कोई व्यस्था नही है। संस्थान में वार्ड ब्वाय का काम करने वाले राजकपूर के माता और पिता दोनों कैंसर जैसी घातक बीमारी के शिकार हैं। उनके इलाज के लिए राजकपूर को अपने साथी कर्मचारियों से मदद के लिए हाथ बढ़ाना पड़ा। कर्मचारियों से तो मदद मिली लेकिन संस्थान ने कोरे आश्वासनों ने अलावा कुछ नहीं दिया।
दूसरा मामला-
न्यूरोलॉजी वार्ड में कार्यरत कर्मचारी कंचन पिछले पांच महीने से बीमार चल रही थीं। उनको संस्थान में इलाज की सुविधा नहीं मिली, तो मजबूरन बाहर इलाज करवा रही हैं। इलाज में व्यस्तता की वजह से अस्पताल में नियमित ड्यूटी पर नहीं जा सकीं, तो उनको नौकरी से निकाल दिया गया। अब वह सारे कागजात पेश कर अपनी नौकरी दोबारा पाने के लिए दर-दर भटक रही हैं।
कर्मचारी नियमितीकरण की मांग पर अड़े
आउटसोर्सिंग के कर्मचारियों की मानें तो उनको हमेशा दबाव में रहकर काम करना पड़ता है। उनका आरोप है कि संस्थान और अस्पताल के अधिकारी बात-बात पर कोई न कोई कमी निकालकर नौकरी से निकाल देने की धमकी देते रहते हैं। संस्थान में अपनी बात कहना भी गुनाह माना जाता है। बीमार होने की हालत में भी नौकरी जाने का खतरा बना रहता है। जबकि वर्षों से संस्थान को अपनी सेवाएं देने वाले अन्य किसी जगह जाने और नौकरी करने की हालत में नहीं हैं।

जो वेतन इस समय आउटसोर्सिंग के कर्मचारियों को मिल रहा है, ठीक उसी प्रकार का वेतन पीजीआई तथा अन्य अस्पतालों के कर्मचारियों को भी मिल रहा है। यहां के कर्मचारियों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाया गया है। वेतन बढ़ोत्तरी को लेकर बात चल रही है, जल्द ही फैसला होगा।
-प्रो. दीपक मालवीय,निदेशक , डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान

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