महिला शिकायतकर्ता की मौत के बाद आई महिला आयोग से चिट्ठी

आयोग ने 22 फरवरी तक महिला को साक्ष्यों के साथ उपस्थित होने का नोटिस भेजा
दिसंबर 2012 में महिला की तरफ से आयोग में की गई थी लिखित शिकायत

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। महिला आयोग महिलाओं को न्याय दिलाने में कितनी सक्रियता दिखाता है, इसका अंदाजा रहीमनगर की पीडि़ता शकुंतला देवी की शिकायत पर की गई कार्रवाई से लगाया जा सकता है। पीडि़ता ने दिसंबर 2012 में आयोग को पत्र लिखकर अपने उत्पीडऩ और जान-माल के खतरे से अवगत कराया था। इसके साथ ही आयोग से मामले को गंभीरता से लेकर त्वरित कार्रवाई की मांग की थी लेकिन अफसोस की बात है कि पड़ोसियों के उत्पीडऩ से परेशान महिला के मामले में आयोग ने बिल्कुल भी सक्रियता नहीं दिखाई। उस महिला की वर्ष 2014 में मौत हो गई। अब महिला के पति स्वामीनाथ वर्मा उन्हीं पड़ोसियों का आतंक झेल रहे हैं। वह अपनी जान और माल की सुरक्षा को लेकर चिन्तित हैं लेकिन कहीं भी सुनवाई नहीं हो रही है। ऐसे में पीडि़ता के पते पर करीब एक सप्ताह पहले महिला आयोग की चिट्ठी आई, जिसमें शिकायतकर्ता को साक्ष्यों के साथ आयोग के समक्ष प्रस्तुत होने का आदेश दिया गया है। इस आदेश ने शिकायतकर्ता महिला के बुजुर्ग पति को राहत देने की बजाय उनके जख्मों को कुरेदने का काम किया है, जिसकी वजह से उनकी तबीयत और अधिक बिगड़ गई है।
न्यायालय में लंबित पड़ा वाद
रहीमनगर डी-6 निवासी 93 वर्षीय स्वामीनाथ वर्मा पिछले सात साल से डर-डर कर जिन्दगी जी रहे हैं। इनका आरोप है कि पड़ोस में रहने वाला उनका सगा भतीजा अशोक वर्मा और उसकी पत्नी नीलम वर्मा जायदाद की वजह से जान के दुश्मन बने बैठे हैं। वह घर का अधिकतर सामान अपने कब्जे में ले चुके हैं। रोजाना किसी न किसी बात को लेकर झगड़ा और मारपीट करते रहते हैं। उनको डरा -धमका कर सारी चल-अचल सम्पत्ति अपने नाम करवाने का दबाव बना रहे हैं। जबकि पत्नी की मौत के बाद पीडि़त की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। वह महीनों से बीमार हैं और दवा के सहारे चल रहे हैं। न्याय की आस में बार-बार कोर्ट और कचहरी का चक्कर नहीं लगा सकते हैं। इसलिए लचर व्यवस्था से काफी नाराज हैं। पीडि़त का यह भी कहना है कि प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। उन्होंने उप जिलाधिकारी सदर के न्यायालय में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 के तहत जुलाई 2014 में वाद दाखिल किया था। इस मामले में दोनों पक्षों की सुनवाई हो चुकी है लेकिन उप जिलाधिकारी ने फैसला सुनाने की बजाय वाद सुरक्षित कर लिया है। इस वजह से आरोपी के हौसले बुलंद हैं। वह रोजाना अपने हक में फैसला करवाने और अपने खिलाफ फैसला आने पर जान से मारने की धमकी देता रहता है। बताया जा रहा है कि आरोपी और उसकी पत्नी की तरफ से पीडि़त को जान से मारने की कई बार कोशिश की जा चुकी हैं। इस कारण पीडि़त काफी डरा हुआ है। इसलिए इस संबंध में 19 अगस्त 2015 को जिलाधिकारी को पत्र भेजकर अपने वाद का जल्द से जल्द निस्तारण करवाने की मांग भी की थी लेकिन जिलाधिकारी ने भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया।

सपोला निकला भतीजा
स्वामीनाथ वर्मा ने बताया कि आरोपी अशोक वर्मा उनके छोटे भाई स्व. जगन्नाथ वर्मा का पुत्र है। अपनी कोई औलाद नहीं होने और भाई की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से बचपन में ही उन्होंने अशोक को अपने घर में रखकर पाला-पोषा और पढ़ाया लिखाया। पति और पत्नी दोनों ने अशोक को अपने सगे बेटे की तरह प्यार दिया। इस दम्पति को एहसास भी नहीं था कि जिस बच्चे को जान से ज्यादा प्यार किया है, जिसकी हर हसरत पूरी की है, वह बुढ़ापे का सहारा बनने की बजाय जान का दुश्मन बन जायेगा। लेकिन वक्त बीतने के साथ ही अशोक की सोच बदलने लगी और अपनी शादी के कुछ ही वर्षों बाद उसने बुजुर्ग दम्पति को परेशान करना शुरू कर दिया। इस काम में अशोक की पत्नी नीलम भी शामिल है। पति-पत्नी मिलकर बुजुर्ग दम्पत्ति को कई बार पीट चुके हैं। शकुंतला के पास जितने भी जेवर थे सब जबरन उठा ले गये। इसी गम में शकुंतला की मौत हो चुकी है। इसके अलावा आरोपी पति-पत्नी स्वामीनाथ को खाने में जहर मिलाने और चाकू-छूरी दिखाकर जान से मारने की धमकी देते रहते हैं।

धुंधली नजर आने लगी न्याय मिलने की आस
स्वामीनाथ 2014 में पत्नी की मौत होने के बाद से बिल्कुल अकेले पड़ चुके हैं। उनको न्याय मिलने की आस धुंधली नजर आने लगी है। इसके साथ ही अफसोस भी है कि उन्होंने जिस बच्चे को अपनी औलाद से ज्यादा प्यार किया, वही उनकी जान का दुश्मन बन बैठा है। फिलहाल महिला आयोग की तरफ से आये आदेश की चिट्ठी ने स्वामीनाथ के जख्मों को कुरेदने का काम किया है, जिसमें 22 फरवरी तक शिकायतकर्ता को आयोग में उपस्थित होकर अपना पक्ष और समस्त साक्ष्य प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है। इस आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए स्वामीनाथ कहते हैं कि जब तक पत्नी जिन्दा थी, महिला आयोग की तरफ से न्याय मिलने की उम्मीद जिन्दा थी लेकिन उनकी मौत के बाद महिला आयोग से विश्वास ही उठ गया है। अब शिकायतकर्ता को साक्ष्यों के साथ आयोग के समक्ष प्रस्तुत होने का आदेश भेजकर महिला आयोग के लोगों ने जता दिया कि उसको महिलाओं की जान-माल की चिन्ता नहीं है। मामला चाहे जितना भी गंभीर क्यों न हो, वह अपनी सुविधा के अनुसार ही काम करेंगे।

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