महिला मुख्यमंत्रियों का वर्चस्व सरकार ही नहीं पार्टी पर भी

 बाल मुकुन्द ओझा

7देश में वर्तमान में चार महिला मुख्यमंत्री विभिन्न राज्यों में सत्तासीन हैं। चारों महिला मुख्यमंत्री अलग-अलग राजनीतिक दलों से सम्बद्ध हैं मगर उनकी पार्टी पर उनका जलवा बरकरार है और वे विधिवत निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं ना कि किसी नेता के द्वारा थोपी गईं मुख्यमंत्री। पार्टी हाईकमान भी वे स्वयं हैं और अपने सभी प्रकार के निर्णय खुद ही लेती हैं इसमें किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करतीं। चारों महिलाएँ अपने-अपने राज्यों में काफी लोकप्रिय हैं और धरातलीय नेता हैं।
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे हैं। वह पहली बार 2003 में राजस्थान की मुख्यमंत्री बनीं। मध्य प्रदेश के सिंधिया राजघराने की बेटी वसुन्धरा राजे भाजपा की बड़ी नेता विजयाराजे सिंधिया की बेटी हैं। वे 2013 में दूसरी बार प्रदेश की मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुईं। बताया जाता है कि राजे का पार्टी पर कब्जा इतना मजबूत है कि वे भाजपा हाईकमान की भी नहीं सुनतीं। वे अपनी पार्टी की खुद ही हाईकमान हैं और पार्टी के निर्णय खुद ही लेना पसन्द करती हैं। पार्टी विधायक दल में उनका भारी बहुमत है। राजे जन-जन में बेहद लोकप्रिय और व्यापक जनाधार वाली नेत्री हैं। जनता में अपनी इस विशिष्ट लोकप्रियता के कारण वह संगठन और अनुशासन की अधिक परवाह नहीं करतीं।
इसी भांति जे. जयललिता तमिलनाडू, ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल और महबूबा मुफ्ती जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री हैं। जयललिता अन्नाद्रमुक की सर्वेसर्वा हैं जबकि ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो हैं। वहीं महबूबा मुफ्ती पीडीपी की प्रमुख हैं। देश में अब तक 16 महिलाएँ विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री पद पर रह चुकी हैं। सुचेता पटेल को देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य मिला। वे कांग्रेस पार्टी की थीं जबकि उनके पति आचार्य जे.बी. कृपलानी प्रजा समाजवादी पार्टी के बड़े नेता थे।
नंदिनी सत्पथी उड़ीसा की पहली मुख्यमंत्री थीं। शशिकला काकोडकर गोवा, जानकी रामचन्द्रन तमिलनाडू, सैय्यद अनवरा तैमूर असम, मायावती उत्तर प्रदेश, शीला दीक्षित दिल्ली, राबड़ी देवी बिहार, सुषमा स्वराज दिल्ली, आनंदी पटेल गुजरात, उमा भारती मध्य प्रदेश, राजिन्दर कौर भट्टल पंजाब के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो चुकी हैं। राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में महिलाओं को पुरूषों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील माना गया है और यह निर्विवाद भी है। मगर यह भी सच है कि महिला मुख्यमंत्रियों ने अपने सांगठनिक कौशल और दबदबे से राजनीति में एक नया आयाम स्थापित किया। वरिष्ठ नेताओं ने भी इनकी आधीनता स्वीकार करने में अपनी भलाई समझी। राजस्थान में भैंरोंसिंह शेखावत सरीखे कद्दावर नेता भी एक समय वसुन्धरा के आगे अपने को बेबस समझे थे। प. बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में जयललिता के सामने सभी नेता बौने हो गये थे। कइयों ने साष्टांग दण्डवत करना शुरू कर दिया था। उत्तर प्रदेश में मायावती के सामने बसपा के सभी नेता हाथ जोड़ कर खड़ा रहने में अपनी भलाई समझते हैं। राजनीति में निश्चय ही महिला मुख्यमंत्रियों ने सभी नेताओं को पछाडक़र अपना परचम फहराया था। इनका जयकारा लगाने में नेताओं में होड़ लगी रहती है। महिला मुख्यमंत्रियों का अपनी-अपनी पार्टियों में वर्चस्व सर्वविदित है और असन्तुष्ट गतिविधियाँ ना के बराबर हैं।
बताया जाता है कि ममता, जयललिता, मायावती सरीखी नेता अपने-अपने प्रदेशों से निकलकर देश की राजनीति में अपने पैर पसारना चाहती हैं। ये महिला नेता किसी राष्ट्रीय दल अथवा गठबंधन में शामिल नहीं हैं और अपनी राजनीति की खुद पैरोकार हैं। तीसरा मोर्चा बनाने में भी इनकी रूचि नहीं है। वे एक संघीय सिंडिकेट का निर्माण अवश्य चाहती हैं जिनमें प्रदेशों का भरपूर बोलबाला हो। ममता बनर्जी ने चुनाव जीतने के बाद ऐसे संकेत भी दिये थे। ममता चाहती हैं कि ऐसे सिंडिकेट में तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, दिल्ली जैसे राज्यों के गैर कांग्रेसी और गैर भाजपा मुख्यमंत्री शामिल होकर देश की राजनीति और विकास में अपनी सक्रिय भागीदारी निभायें।

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