महिला की गरिमा के साथ समझौता नहीं

दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद समाज में जो जागरूकता महिला अधिकारों को लेकर आई है, उसका बहुत ज्यादा प्रभाव अदालती प्रक्रियाओं और कोर्ट के फैसलों पर नहीं दिखता। समय-समय पर ऐसे फैसले और ऐसे कमेंट आते रहते हैं जो न्यायपालिका की गरिमा के अनुरूप नहीं कहे जा सकते।

sanjay sharma editor5सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ-साफ कहा कि रेप के मामलों में किसी भी सूरत में समझौते या मध्यस्थता की कोई बात सोची भी नहीं जा सकती। मध्यप्रदेश के जिस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है उसमें भी आरोपी ने सात वर्षीय पीडि़ता के माता-पिता के साथ समझौते की पेशकश की थी जिसे ठुकराते हुए निचली अदालत ने उसे पांच साल जेल की सजा सुनाई थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि शीर्ष अदालत के आदेश के बाद निचली अदालतों की उस प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा जिसके तहत बलात्कारी द्वारा शादी के प्रस्ताव या आर्थिक मुआवजे के आधार पर कई बार समझौते के प्रस्ताव को समर्थन दिया जाता था।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कुछ ही दिन पहले मद्रास हाईकोर्ट ने नाबालिग से रेप के एक मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया और आरोपी को जमानत दे दी। हाइकोर्ट ने यह फैसला पीडि़ता की तकलीफ को देखते हुए दिया था। पीडि़ता के माता-पिता गुजर चुके हैं और रेप के बाद पैदा हुए एक बच्चे की वह अविवाहित मां है, बावजूद इसके, पीडि़ता ने मध्यस्थता के प्रयासों में शामिल होने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना बिल्कुल वाजिब है कि किसी महिला के साथ बलात्कार उसकी गरिमा पर चोट करना है। जाहिर है, किसी भी संवेदनशील व्यक्ति या व्यवस्था से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह बर्बरता की शिकार महिला को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दे कि वह अपने सम्मान को नष्ट करने वाले के साथ समझौता कर ले, लेकिन दुर्भाग्य से हमारी कानूनी और सामाजिक व्यवस्था में यह होता रहा है। अदालतों का ऐसा रुख इन्हीं दोनों मामलों तक सीमित नहीं है। दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद समाज में जो जागरूकता महिला अधिकारों को लेकर आई है, उसका बहुत ज्यादा प्रभाव अदालती प्रक्रियाओं और कोर्ट के फैसलों पर नहीं दिखता। समय-समय पर ऐसे फैसले और ऐसे कमेंट आते रहते हैं जो न्यायपालिका की गरिमा के अनुरूप नहीं कहे जा सकते। अदालतें पीडि़ता की न्याय की अपेक्षा को कुचलते हुए ऐसे समझौतों को बढ़ावा देती रही हैं और पंचायतें भी अर्थदंड से ऐसे मामलों को रफा-दफा करती रही हैं।
बलात्कार जैसे मामले में समझौता कराना यौन हिंसा से पीडि़त के साथ-साथ संविधान की गरिमा की भी घोर अवमानना है। समाज के स्तर पर वहशियों को ‘‘भोला’ और बलात्कार पीडि़ता को ही कहीं न कहीं ‘‘जिम्मेदार’ मानने की तुच्छ और घृणित सोच से हम कब उबरेंगे। यदि समाज अपनी जिम्मेदारी निभाए कि पीडि़त महिला के साथ जुल्म हुआ है तो बलात्कार का आरोपी उस पीडि़ता के सामने शादी का प्रस्ताव रखने की हिम्मत कभी नहीं कर पाएगा।

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