महिला उद्यमिता: दृढ़ता से कदम बढ़ाएं

इंदिरा मिश्र
असंगठित क्षेत्र में उद्यमिता को बढ़ाने हेतु गठित केन्द्रीय आयोग ने वर्ष 2004-05 में ये आंकड़े, प्रस्तुत किये थे, कि देश में लगभग गैर कृषि क्षेत्र में संलग्न सूक्ष्म और मध्यम आकार के 90 प्रतिशत उद्योग ही भारत से निर्यात होने वाली 90 प्रतिशत वस्तुओं के निर्माता है, और इन उद्योगों की संख्या 3.2 करोड़ है। इनमें संलग्न लोगों में एक बड़ी संख्या महिलाओं की है। परन्तु ऐसे कम ही उद्योग होंगे जिनमें महिला ही मुखिया है और इसका कारण यह है, कि महिलाओं में आत्मविश्वास की कमी है।
कोई भी उद्योग तब सफल होता है जब उसका उत्पाद जमाने और समय की जरूरतों और पसन्द के अनुरूप होता है। समय की पसन्द क्या है, वह जानने के लिए उक्त वस्तु के व्यापार-विनिमय, और क्रेताओं का व्यवहार परखने की जरूरत होती है। नये उत्पाद व नई डिजाइन को अपनाने के लिए नई तकनीक सीखनी पड़ती है और बहुधा नई मशीनरी भी खरीदनी होती है। हमारे यहां महिलायें मेहनत तो खूब कर लेती हैं, लेकिन बाजार के बारे में गहराई से जानकारी नहीं लातीं। नई मशीनें कहां से मिलेंगी, इसकी जानकारी के लिए उनके डीलर का पता लगाना मशीनरी मंगाने की शर्तों, परिवहन, टूट-फूट के प्रति जिम्मेदारी- इन सभी की व्यवस्था जरूरी होती है। जिन महिलाओं में सफल उद्यमी बनने की संभावना होती है, सरकार विस्तृत प्रशिक्षण कराये तो बहुत अच्छा हो।
अहमदाबाद, गुजरात में ईडीआई अथवा इंटरनलशिप डेवलेपमेंट इंस्टीट्यूट आफ इंडिया नामक प्रसिद्ध संस्था है। वे छोटे, लघु व सूक्ष्म उद्योग, सभी में मदद पहुंचाने के लिहाज से प्रशिक्षण कराते हैं। इस प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण भाग होता है। यह कि आप अपनी पसन्द का कोई उत्पाद बनाने और बेचने का प्रस्ताव (प्रोजेक्ट प्रपोजल) बनायें और प्रशिक्षक को दिखलाएं। जब प्रस्ताव बनाकर दिखाया जाता है, तो समझ में आता है, कि उद्योग स्थापित करना एक जटिल कार्य है। इसमें कच्चा माल, भूमि, मशीनरी, कौशलयुक्त श्रमशक्ति और पूंजी तो लगती ही है, इसमें उद्योग लगाने के स्थल के चयन से लेकर उसकी वस्तु की मार्केर्टिंग के पूरे जाल का संयोजन करना होता है। फिर भी कमाल की बात यह है, कि उद्यमिता पसन्द करने वाले उद्योग ही स्थापित करते जाते हैं। (एक सफल उद्योग के पीछे 2-3 असफल उद्योग भी हों तो कोई अचरज नहीं।) ये लोग अपनी किस्मत को एक सफल उद्योग के सहारे ही चलाकर संतुष्ट नहीं बैठते। ये एक के बाद एक उसी शृंखला के उद्योग (अथवा अन्य भी) लगाते चले आते हैं- और कुल मिला कर नफे में ही रहते हंै। आवश्यकता पडऩे पर एक होटल को बेचकर उसके मुनाफे से दूसरा होटल या मॉल भी चला सकते हैं। यह वर्ग उन व्यक्तियों का होता है जो किसी से नौकरी नहीं मांगते बल्कि कई लोगों को नौकरी दे सकते हैं। ऐसे लोगों की आज कितनी सख्त जरूरत है, इसे हम सब समझते हैं, चंूकि प्रतिवर्ष एक शिक्षित बेरोजगार युवाओं की बड़ी सी जमात में वृद्धि होती जाती है। भारत में इस समय 25 करोड़ से अधिक व्यक्ति कृषि के असंगठित क्षेत्र में संलग्न हैं अर्थात वे कृषक हैं, या कृषि मजदूर हैं या कृषि उपज संबंधी किसी गतिविधि में संलग्न हैं। संगठित क्षेत्र में सरकारी वर्ग में कुल 3.1 करोड़ लोग तथा निजी क्षेत्र में 1 करोड़ लोग संलग्न है। शेष सब तो असंठित क्षेत्र में कार्यरत हंै। इनमें से अधिसंख्या अकेले ही अपनी आय-वर्धक गतिविधि में संलग्न है। शेष सूक्ष्म और मध्यम श्रेणी के उद्यमों में संलग्न है। ‘सूक्ष्म’ की परिभाषा यहां ऐसे उद्योगों के लिए है जिनकी लागत 5 लाख से न हो, तथा मध्यम की परिभाषा यह कि जिसकी लागत 25 लाख एवं कर्मचारियों की संख्या 10 से कम हो। बहुधा महिलाओं की स्थिति यही है, लेकिन उन्हें इन सीमित परिभाषाओं तक भी समावेशित नहीं कर पाती और यह स्थिति छत्तीसगढ़ में विशेष तौर पर देखने में आती है। यहां बैंकों का विस्तार कम है, तथा शिक्षित महिलाओं का प्रतिशत कम है। यह विशेष पढऩे में नहीं आता कि कितनी महिला उद्योगपतियों ने यहां अपने उद्योग स्थापित किये। उनकी बात यहां छोडऩी होगी, जिन्हें परिस्थितिवश उद्योगपति की पदवी संभालनी पड़ी। सूक्ष्म व मध्यम स्तर का उद्योग स्थापित कर कुछ समय, लागत व उच्चतर प्रतिशत के पश्चात महिला आसानी से अपना दायरा व स्तर बढ़ा सकती है, बशर्ते वह अपनी मजबूरियों के वास्तविक और काल्पनिक मकडज़ाल के बाहर आ सके। इस मकडज़ाल में है-बाजार पर पुरुष वर्ग का प्रभुत्व, महिला का अपना नेटवर्क स्थापित करने में व्यवस्थित न हो पाना, चौबीसों घंटे, उद्योग की ही चिन्ता में लीन न रह पाना, अधीनस्थों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता, एकाएक मौके पर निरीक्षण के लिए न पहुंच पाना, इंटरनेट आदि पर नवीनतम उत्पाद, या कच्चे माल पर अध्ययन न कर पाना, शीघ्र निर्णय न ले पाना, रिस्क न ले पाना, बैंकों द्वारा उन्हें ऋण देने में आनाकानी, महिलाओं के अपने नाम पर कोई ऋण लेने के लिए स्थायी सम्पत्ति रहन रखने लायक न होना, आदि। साथ ही शेष समाज के साथ कोई अप्रिय सांठ-गांठ में संलग्न न हो पाना।
परन्तु अगर ज्यादा से ज्यादा महिलाएं दृढ़ता से इस ओर कदम बढ़ायें, तो उन्हें निश्चित रूप से अधिक सफलता मिल सकती है। लिज्जत पापड़ इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। इसी प्रकार सेवा संस्था के वस्त्रोद्योग के उत्पाद महिलाओं के आभूषण, खाद्य व्यंजन, रेस्तोरां, विज्ञापन, दुग्ध व्यवसाय, कैन्टीन व घर पहुंच केटरिंग सेवा- इन सब पर वे सफलता से प्रभुत्व जमा सकती हैं।

Pin It