महिलाओं का अधिकार और परंपरा

समानता और नागरिक अधिकार के मूल्य के साथ आज आस्था और विश्वास को भी अपना मेल बिठाना होगा। कई संतों का यह कहना कि स्त्रियों के प्रति भेदभाव की वजह से नहीं बल्कि उन्हें अमंगल से बचाने के लिए एक धार्मिक विधान के रूप में शनि की पूजा की मनाही है। ऐसे में यह तर्क कहीं से खरे नहीं उतरते।

sanjay sharma editor5महाराष्टï्र के शनि शिंगणापुर मंदिर के प्रबंध तंत्र पर हाईकोर्ट के फैसले से दबाव बढ़ गया था। इस तरह आखिरकार महिलाओं को मंदिर में पूजा करने का अधिकार मिल गया। पर असल मायनों में यह जीत पूरी नहीं है। इसकी वजह यह है कि अभी भी कई मंदिरों और समाज में महिलाओं को उनके पूरे अधिकार नहीं मिले है। ऐसे में यह महज एक नई कड़ी के तौर पर महिलाओं को मिली एक जीत भर मानी जा सकती है।
मंदिरों में प्रवेश से जुड़े नियम-कायदे तब के बने हैं जब संविधान, कानून, नागरिक अधिकार आदि हमारे सार्वजनिक जीवन के निर्धारक तत्व नहीं बने थे। लेकिन संविधान के सार्वजनिक जीवन के बड़े हिस्से के तौर पर सामने आने के बाद इस तरह के अधिकार मिलने शुरू हो गए हैं। इसलिए अब इन मामलों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
समानता और नागरिक अधिकार के मूल्य के साथ आज आस्था और विश्वास को भी अपना मेल बिठाना होगा। कई संतों का यह कहना कि स्त्रियों के प्रति भेदभाव की वजह से नहीं बल्कि उन्हें अमंगल से बचाने के लिए एक धार्मिक विधान के रूप में शनि की पूजा की मनाही है। ऐसे में यह तर्क कहीं से खरे नहीं उतरते। कुछ लोग केरल के सबरीमाला मंदिर का भी उदाहरण देते रहे हैं, जहां मासिक धर्म के आयुवर्ग की स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है। सबरीमाला का मामला भी अदालत में है।
सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए तीन महीने पहले सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि संवैधानिक आधार पर ऐसा नहीं किया जा सकता। मंदिर धार्मिक आधार पर तो प्रतिबंध लगा सकते हैं, मगर लैंगिक आधार पर नहीं। सबरीमाला मामले में अंतिम फैसला अभी नहीं आया है, पर जाहिर है शनि शिंगणापुर मामले में मुंबई हाईकोर्ट का फैसला सर्वोच्च अदालत के रुख से एकदम मेल खाता है।
शुरुआती विरोध के बाद महिलाओं ने इस लड़ाई के लिए पूरी तरह से कमान संभाल ली थी। इसमें भूमाता ब्रिगेड का भी योगदान रहा। शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं की जीत ने यह बता दिया कि महिलाएं पूरी तरह से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही है। अभी भी समाजिक और आर्थिक स्तर पर महिलाओं के साथ कई क्षेत्रों में भेदभाव जारी है। ऐसे में शनि शिंगणापुर में महिलाओं के प्रवेश को व्यापक तौर पर देखा जाना चाहिए। आशा है महिलाएं दूसरे मोर्चों पर भी अपने हक की लड़ाई पूरी संजीदगी से लड़ेंगी।

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