महाशक्ति बनता भारत

प्रमोद गौरव

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी की सदस्यता के लिए व्यापक सर्मथन जुटाने के साथ ही भारत को मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था समूह, मसलन एमटीसीआर के सदस्य समूह देशों में शामिल करने के प्रयासों को हरी झंडी मिल गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो साल के भीतर अमेरिका की चार यात्राओं और राष्टï्रपति बराक ओबामा से सात मुलाकतों के बाद संभावनाओं के ये द्वार खुलने जा रहे हैं। एनएसजी का सदस्य बनने से भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश कहलाने लग जाएगा।
वहीं एमटीसीआर देशों की कतार में शामिल होने से भारत को मिसाइल बेचने के लिए विश्व बाजार के दरवाजे खुल जाएंगे। ये दोनों ही अवसर भारत को मोदी और ओबामा के बीच बीते दो सालों के भीतर प्रगाढ़ हुई दोस्ती का परिणाम हैं। लेकिन एनएसजी में चीन का शत्रुतापूर्ण दखल अभी भी इसलिए बना रहेगा, क्योंकि इन दोनों संगठनों में सदस्यता मिलने के बाद दक्षिण एशियाई देशों में जहां चीन का वर्चस्व टूटेगा, वहीं पाकिस्तान लगभग अलग-थलग पड़ जाएगा।
ये दोनों ही स्थितियां वैश्विक फलक पर भारत की भूमिका को महत्पूर्ण और असरकारी बनाने का काम करेंगी। इस बार मोदी की अमेरिका समेत पांच देशों की यात्रा भारत के लिए कूटनीतिक उपलब्धियों की दोहरी सफलता का कारक बनने जा रही है। एमटीसीआर 34 देशों का समूह है। इस समूह की स्थापना 1987 में हुई थी। शुरुआत में इसमें जी-7 देश अमेरिका, कनाडा, जापान, इटली, फ्रांस और ब्रिटेन शामिल थे। चीन इस समूह का सदस्य नहीं है। इसलिए उसके द्वारा भारत का विरोध मुमकिन ही नहीं है, बावजूद चीन ने इस समूह के दिशा-निर्देश पालन की इच्छा जता दी है। इसके पीछे चीन का मकसद बैलिस्टिक मिसाइल बेचने की सीमा सुनिश्चित करना है।
दरअसल एमटीसीआर मुख्य रूप से 500 किलोग्राम पोलेड ले जाने वाली एवं 300 किमी तक मार करने वाली मिसाइल और अनमैंड एरियल व्हीकल प्रौद्योगिकी ड्रोन की खरीद-ब्रिकी पर नियंत्रण रखती है। भारत को एमटीसीआर की सदस्यता इसलिए जरूरी थी, क्योंकि पिछले एक-डेढ़ साल के भीतर भारत कई तरह की मिसाइलों का सफल परीक्षण कर चुका है। भारत ने मिसाइल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता 90 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक से की है। लिहाजा उसे कालांतर में दुनिया के बाजार में मिसाइल बेचने का अधिकार मिल जाएगा तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो और रक्षा अनुसंधान विकास संस्थान डीआरडीओ अरबों-खरबों कमाकर स्वयं तो आर्थिक रूप से स्वालंबी होंगे ही, भारत की अर्थव्यवस्था की गति बढ़ाने में भी इन संस्थानों का बहुमूल्य योगदान मिलने लग जाएगा।
भारत ने पिछले साल एमटीसीआर की सदस्यता के लिए आवेदन किया था। हालांकि चंद देशों ने विरोध भी किया। किंतु ओबामा और अमेरिकी प्रशासन के भारत के पक्ष जबरदस्त सर्मथन के कारण यह विरोध नक्कारखाने में तूती साबित हुआ। यही नहीं अमेरिका ने एमटीसीआर के अलावा तीन अन्य निर्यात नियंत्रण व्यवस्था समूहों में भी भारत की भागीदारी सुनिश्चित करने की जोरदार पैरवी की है। ये हैं, परमाणु प्रदाता समूह, आस्ट्रेलिया समूह और वैसेनार अरेंजमेंट समूह। इनमें आस्ट्रेलिया समूह रासायनिक हथियारों पर नियंत्रण करता है। वैसेनार कमोबेश छोटे हथियारों पर नियंत्रण करता है। खैर, फिलहाल मोदी-ओबामा की इस गर्मजोशी से भरी मुलाकात से इतना तो तय हो गया कि भारत को एमटीसीआर की सदस्यता मिल जाएगी। यह सदस्यता भारत को जल्दी मिले इस उद्देश्य से एमटीसीआर के अध्यक्ष रोनाल्ड वीज भी अगले महीने भारत आ रहे हैं।
मोदी की दूसरी बड़ी कामयाबी में अमेरिका और स्विट्जरलैंड को एनएसजी की सदस्यता के लिए मिला सर्मथन है। अभी तक स्विट्जरलैंड और मेक्सिको इसलिए खिलाफत कर रहे थे, क्योंकि भारत ने फिलहाल परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं किए हैं। 9 जून को हो रही 48 सदस्यीय एनएसजी की बैठक में एक प्रमुख एजेंडा, भारत के सदस्यता संबंधी आवेदन पर विचार करना है। दरअसल 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग समझौते के तहत भारत को इस समूह में शामिल करने पर सहमति बन गई थी। इसलिए जिन देशों ने अंतरराष्टï्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए में उक्त समझौते को स्वीकृति दी थी, उनका नैतिक दायित्व बनता है कि वे एनएसजी में भारत के पक्ष में खड़े दिखाई दें। ब्रिटेन, रूस और फ्रांस पहले से ही भारत के सर्मथन में हैं। अब अकेला चीन है, जो भारत का खुलेआम विरोध करता है।
दरअसल चीन के अपने स्वार्थ हैं। चीन अपने परमाणु कारोबार को बड़े स्तर पर फैलाना चाहता है। पिछले दो दशक में वह अनेक परमाणु इकाइयां भी स्थपित कर चुका है। गोया, भारत यदि परमाणु संपन्न शक्ति के रूप में उभर आता है तो चीन का परमाणु बाजार प्रभावित होगा। इसलिए चीन कह रहा है कि भारत के साथ-साथ पाकिस्तान को भी एनएसजी की सदस्यता दी जाए। दरअसल चीन की अंदरूनी मंशा पाकिस्तान में अपने परमाणु केंद्र स्थापित करने की है। इस लिहाज से अमेरिका समेत आतंकवाद विरोधी देशों की आशंका है कि पाक जिस तरह से आतंकवाद की गिरफ्त में है, उसके मद्देनजर पाक को एनसीजी का सदस्य बनाया जाना, भविष्य के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
इस सब के बावजूद जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर भारत को परमाणु ऊर्जा संपन्न देश बनाया जाना इसलिए जरूरी है, जिससे कार्बन उत्सर्जन की कटौती में भारत की भूमिका रेखांकित हो। दरअसल औद्योगिक विकास के साथ-साथ भारत की ऊर्जा संबंधी जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। इसी मकसद पूर्ति के लिए मोदी की इसी अमेरिकी यात्रा के दौरान अमेरिकी कंपनी वेस्टिंग हाउस और भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम के बीच 6 परमाणु बिजली रिएक्टरों पर काम शुरू करने पर सहमति बनी है। इन दोनों कंपनियों के बीच जून 2017 तक अनुबंध होने की उम्मीद है। इस दौरान संयंत्र स्थापना संबंधी शर्तें तय होंगी। इससे भारत को 4800 मेगावाट अतिरिक्त परमाणु बिजली मिलने लगेगी। ऊर्जा के क्षेत्र में बहुआयामी दृश्टिकोण अपनाते हुए मोदी सरकार सौर ऊर्जा के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रही है।

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