‘महाराजाओं’ जैसा जीवन कब तक बिताते रहेंगे नेता

न्यायालय ने महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों की जयंती पर उनके फोटो प्रकाशित करने की अनुमति भी दी है। न्यायालय के इस निर्णय से पिछले सप्ताह एन.आर. माधव मैनन की अध्यक्षता में 3 सदस्यीय समिति द्वारा सरकारी विज्ञापनों की विषय-वस्तु विनियमनों को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। किन्तु न्यायालय ने इस समिति की सिफारिशों में कुछ सुधार किया है और विज्ञापनों में मुख्यमत्रियों और राज्यपालों के फोटो प्रकाशित करने के सुझाव को अस्वीकार कर दिया है।
पूनम आई. कौशिश

मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार सत्ता में आने का एक वर्ष पूरा होने पर समारोह आयोजित करने की तैयारी कर रही है जिसमें वह 26 मई को अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करेगी, किन्तु उच्चतम न्यायालय ने इसके रंग में भंग डाल दिया है। न्यायालय ने कहा बहुत हो गया। और देश में व्याप्त वी.आई.पी. संस्कृति के कारण उपजी 2 बीमारियों ‘कुछ लोगों के अन्य लोगों से अधिक समान होने की ओरवेलियन विकृति’ और हमेशा ‘और अधिक की मांग’ करने की ओलिवर बीमारी पर अंकुश लगा दिया है। उच्चतम न्यायालय साधुवाद का पात्र है।
एक उल्लेखनीय निर्णय में पिछले सप्ताह न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि हमारे नेतागणों द्वारा व्यक्तिगत गुणगान और छवि बनाना लोकतांत्रिक कार्यकरण के विपरीत है और इस दिशा में न्यायालय ने सरकार को प्रिंट, टी.वी. और ट्विटर, फेसबुक तथा अन्य सोशल मीडिया साइटों सहित इंटरनैट पर सरकारी विज्ञापनों पर मंत्रियों, सांसदों और महत्वपूर्ण नेताओं के फोटोग्राफ प्रकाशित करने पर रोक लगा दी है क्योंकि सरकारी परियोजनाओं को नेताओं की व्यक्तिगत उपलब्धि दर्शा कर यह व्यक्तित्व को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति है।
न्यायालय ने इस बात पर दुख जताया कि सरकार की उपलब्धियां प्रदर्शित करने वाले विज्ञापन किसी घटना या अवसर के साथ एक औपचारिकता बन गए हैं और अब इन विज्ञापनों पर केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीश के फोटो ही प्रकाशित किए जा सकते हैं। न्यायालय ने महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों की जयंती पर उनके फोटो प्रकाशित करने की अनुमति भी दी है। न्यायालय के इस निर्णय से पिछले सप्ताह एन.आर. माधव मैनन की अध्यक्षता में 3 सदस्यीय समिति द्वारा सरकारी विज्ञापनों की विषय-वस्तु विनियमनों को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। किन्तु न्यायालय ने इस समिति की सिफारिशों में कुछ सुधार किया है और विज्ञापनों में मुख्यमत्रियों और राज्यपालों के फोटो प्रकाशित करने के सुझाव को अस्वीकार कर दिया है।
द्रमुक सुप्रीमो करुणानिधि ने कहा है कि वह इस निर्णय को चुनौती देंगे क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति अन्नाद्रमुक की अम्मा जयललिता और द्रमुक के करुणानिधि के आसपास घूमती है। अन्य राज्यों के नेता भी निजी तौर पर करुणानिधि का समर्थन कर रहे हैं। किन्तु न्यायालय के निर्णय की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि झारखंड में हमारे खास आदमियों ने इसे ठेंगा दिखाते हुए अपने वेतन में 80 प्रतिशत की वृद्धि कर दी। किन्तु केवल उन्हें ही क्यों दोष दें? उन्होंने तो अपने बड़े भाई सांसदों का अनुसरण किया है जो पहले ही अपने वेतन में सर्वसम्मति से वृद्धि कर चुके हैं। इससे भी हैरानी की बात यह है कि हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर विशेष वी.आई.पी. लेनों से असंतुष्ट हमारे सम्माननीय सांसदों ने प्रत्येक विमानपत्तन पर एक नोडल अधिकारी की मांग की है जो वहां पर उनका पूरा ध्यान रखे ताकि उन्हें पंक्ति में न लगना पड़े, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर चैक इन सुविधा मिले और हवाई अड्डे के वी.आई.पी. लॉज में उन्हें भोजन और अन्य सुविधाएं मिलें। यदि आप उनसे पूछें कि उन्हें ये सुविधाएं कैसे मिल सकती हैं तो आपको उनके कोपभाजन के लिए तैयार रहना पड़ेगा और उनका उत्तर होता है कि मैं खास आदमी हूं, तुम कौन हो, जबकि आम आदमी उनकी इस विलासिता के लिए भुगतान करता है। यही नहीं, उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग पर टोल प्लाजा के कर्मचारियों के व्यवहार में भी सुधार की मांग की है कि इन कर्मचारियों में सभ्यता की कमी है और उनका दृष्टिकोण लापरवाह है और इसका कारण यह है कि ये कर्मचारी उनसे टोल टैक्स मांग लेते हैं।

प्रश्न उठता है कि क्या ये लोग वास्तव में इस अतिरिक्त महत्व के हकदार हैं? क्या यह शक्ति के प्रतीक हमारे संविधान में वॢणत गणतंत्र की विशेषताओं के विपरीत नहीं है? क्या हमारा गरीब देश इन स्वयंभू नए महाराजाओं, मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के महंगे खर्चों को वहन कर सकता है? और फिर जनता द्वारा, जनता का और जनता के लिए लोकतंत्र का क्या होगा?

नि:संदेह हमारे राजनेताओं की कभी समाप्त न होने वाली मांगों से आम आदमी उनसे खिन्न हो गया है जो पहले ही महंगाई, बेरोजगारी आदि समस्याओं से जूझ रहा है। साथ ही हमारे शासक अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी और सम्मानजनक ढंग से नहीं निभाते हैं।

क्या हमारे नेता उस असली भारत की तस्वीर को पहचानते हैं जिसकी रक्षा करने की वे कसमें खाते हैं जहां पर आज भी 70 करोड़ से अधिक लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन करते हैं किन्तु इन नेताओं को इसकी कोई परवाह नहीं है। इन नेताओं के कारण आम आदमी का सुरक्षा कारणों से सडक़ों पर प्रतिदिन उत्पीडऩ़ होता है। अपने बंदूकधारी कमांडो की सुरक्षा में वे यातायात को रोककर लालबत्ती पार कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और यदि कोई इनके इन कारनामों पर उंगली उठाता है तो उसे उनका कोपभाजन बनना पड़ता है।

इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण यह है कि देश में 400 से अधिक वी.आई.पी. लोगों की सुरक्षा पर प्रतिवर्ष 250 करोड़ से अधिक रुपए खर्च किए जाते हैं। उन्हें खतरा हो या न हो, वे अपने सुरक्षा बंदोबस्त के बिना कहीं नहीं जाते हैं। साथ ही क्या हमारे जनसेवकों को उस जनता से सुरक्षा के लिए सुरक्षाकर्मियों की आवश्यकता है जिनकी सेवा करने की वे कसमें खाते हैं? गत 5 वर्षों में मुंबई में वी.आई.पी. लोगों की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या में 1200 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पंजाब में 703 वी.वी.आई.पी. को सुरक्षा मिली हुई है। इस संबंध में दिल्ली उच्च न्यायालय के 2008 के निर्णय को भुला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि वी.आई.पी. सुरक्षा अनावश्यक है। यह मात्र एक प्रतिष्ठा का प्रतीक है और जब आम आदमी सडक़ों पर मारा जा रहा हो, वृद्ध आदमियों की हत्या की जा रही हो और इन राजनेताओं को करदाताओं के धन से इतनी भारी सुरक्षा मिल रही हो तो यह किसी घोटाले से कम नहीं है।

गत वर्षों में हम इस बात के आदी हो गए हैं कि ये ‘अधिक समान लोग’ जनता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और जिसके चलते आम आदमी व खास आदमी के बीच खाई बढ़ती जा रही है जिससे नेताओं के प्रति लोगों में खिन्नता और अवमानना की भावना पैदा हो रही है। फलत: लोग खुल्लम-खुल्ला नियम-कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं। दुखद तथ्य यह भी है कि जब हमारा देश 21वीं सदी की ओर बढ़ रहा है तो ये नए महाराजा 19वीं सदी में ही जीना चाहते हैं जिसके अंतर्गत वे किसी भी नियम का पालन नहीं करते और कानून के नाम पर शासन करते हैं। इन सभी लोगों ने महात्मा गांधी के सादा जीवन, उच्च विचार के दर्शन को भुला दिया है।

यदि शुरूआत स्वयं ये नेतागण करें तो दिल्ली के सप्त सितारा बंगलों में रहने वाले इन लोगों को कुछ कदम उठाने चाहिएं। इन बंगलों में बड़े-बड़े सुसज्जित लॉन हैं जहां पर वे सब्जियां और अनाज पैदा कर रहे हैं। उन्हें नि:शुल्क फर्नीचर, एयरकंडीशनर व फ्रिज आदि उपलब्ध कराए जाते हैं।

इन बंगलों में हर चीज की देखरेख सरकार द्वारा की जाती है जिससे कि वे बड़े साहिबों की तरह रह सकें। इसके कारण करदाताओं को प्रतिवर्ष 60 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने पड़ते हैं। दिल्ली के इन बंगलों को 1000 से 2000 वर्ग गज के प्लाटों में बांटकर बेचा जाए तो प्रत्येक की कीमत 200 से 350 करोड़ रुपए होगी और सरकार को हजारों करोड़ रुपए मिलेंगे और यदि इन्हें किराए पर दिया जाए तो प्रत्येक बंगले का 25 से 50 लाख रुपए किराया मिलेगा।

इन नेताओं को मिली हुई सुविधाएं अंतहीन हैं और अब स्थिति यह आ गई है कि लोगों का इनसे और व्यवस्था से मोह भंग होने लग गया है जिससे लोगों में आक्रोश है। अधिकाधिक लोग कानून अपने हाथ में लेने लग गए हैं। लोगों का धैर्य समाप्त होता जा रहा है। मोदी हमेशा से कहते आए हैं कि वह एक गरीब चाय वाले से प्रधानमंत्री बने हैं अत: उन्हें यह समझना होगा कि लोकतांत्रिक सरकार की मूल धारणा लिंग, आयु, जाति, मूल वंश, धर्म, राजनीतिक विश्वास, वर्ग, आॢथक स्थिति आदि को ध्यान में रखे बिना कानून के समक्ष सभी नागरिकों की समानता है। औपनिवेशक सामंतशाही या निरंकुश शासनों के विपरीत लोकतंत्र में कानून का शासन सभी लोगों पर समान रूप से लागू होता है और यहां राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री सहित कोई भी लोकसेवक कानून से ऊपर नहीं होता है। यदि भारत की छवि एक उभरती विश्व महाशक्ति के रूप में बनानी है तो हमारे नेताओं को अनावश्यक विशेषाधिकारों को छोडऩा होगा।

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