महापुरुषों के सहारे दलित वोटों के लिए लामबंदी

ajay kumarकिसी भी बिरादरी से सियासी रिश्ता जोडऩे के लिये उनके महापुरूषों का कुछ विशेष अवसरों पर महिमामंडन करने की परम्परा दशकों पुरानी है। यह ऐसा नुस्खा है जो हमेशा कारगर साबित होता है। आपके मन में श्रद्धाभाव हो या न हो लेकिन जुबान और बॉडी लैंग्वेज से ऐसा आभास होना चाहिए जैसे आप उनके कुल देवताओं या महापुरुषों के दर्शन करके धन्य हो गये हैं। पूरा खेल काफी चतुराई भरा होता है, जरा सा फिसलना भारी नुकसानदायक हो जाता है। वैसे तो पूरे साल तमाम महापुरूषों के सामने ‘श्रद्धालु’ नतमस्तक होते रहते हैं। मगर चुनाव के समय इसमें और अधिक तेजी आ जाती है। ठीक वैसे ही जैसे परीक्षाओं के समय में मंदिरों में छात्रों की संख्या बढ़ जाती है, जिसने साल भर पढ़ाई की वह भी और जिसने किताब खोलकर नहीं देखी वह भी परीक्षा के समय भगवान मेहरबानी करेंगे, ऐसी उम्मीद लगाये रहता है। छात्रों में जो श्रद्धा परीक्षा के दौरान दिखाई देती है, वैसा ही श्रद्धाभाव नेताओं में चुनाव के समय दिखाई देता है।

उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। बंगाल में भी चुनाव होने हैं। ऐसे में सियासतदारों के बीच तमाम महापुरूषों को लेकर श्रद्धाभाव बढऩा लाजिमी है, जिस समाज का जितना मजबूत वोट बैंक है उसके महापुरूषों की उतनी ही पूछ होती है। यही वजह है आजकल दलितों को लुभाने के लिये बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के बाद संत रैदास के लिए सियासतदानों की श्रद्धा में भी अचानक सेंसेक्स की तरह उछाल आ गया है। 22 फरवरी 2016 को रैदास जयंती पर उनके जन्म स्थान बनारस में प्रधानमंत्री से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री तक सिर दंडवत करते नजर आये। जो वाराणसी नहीं पहुंच पाये उन्होंने जहां थे वहीं से संत रैदास को याद किया। लखनऊ में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के दफ्तरों में उनके विचार गूंजे तो दलितों पर अपना हक जताने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कई नेताओं की संत रविदास की स्तुति और मत्था टेकने पर तंज करते हुए कहा कि संत के आदर्शों और कर्मों को अपनाकर ही इंसान बना जा सकता है। तभी देश के गरीबों और शोषित जनता का सही रूप में भला होगा। मायावती ने कहा कि उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) को तो संत रविदास की जयन्ती मनाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, जिसने सत्ता में आते ही बसपा सरकार के उनके नाम पर रखे गए संतरविदास नगर जिले का नाम बदलकर भदोही कर दिया।
रैदास जयंती पर पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हो रहे सियासी जुटान को यूपी-पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों से जोडक़र देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में करीब 21 फीसदी और पंजाब में 32 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी दलित वोटों की है। भाजपा के लिए यूपी-पंजाब दोनों ही अहम हैं। बताते हैं कि भाजपा की स्थानीय इकाई के सुझाव पर ही प्रधानमंत्री को गए निमंत्रण को हामी मिली थी। वहीं, आम आदमी पार्टी पंजाब में दिल्ली जैसा दम दिखाना चाह रही है। मजबूत काउंटर अटैक के लिए मोदी के 15 मिनट के बदले केजरीवाल 1.5 घंटे रैदास मंदिर में रहे। सपा कार्यालय पर भी पहली बार संत रविदास के कार्यक्रम का दायरा बढ़ा दिया गया। यह और बात है कि प्रोन्नति में आरक्षण कोटा खत्म किये जाने, सपा राज में दलितों पर बढ़ते अत्याचार की वारदातों, दलितों की जमीन बिक्री कानून में बदलाव के चलते दलित समाजवादी पार्टी से खासे नाराज चल रहे हैं।
संत रविदास ने संदेश दिया था कि जाति का भाव खत्म किए बिना मानवता को जोड़ा नहीं जा सकता। करीब 600 साल बाद उन्हीं संत रविदास के बहाने जाति की बिसात पर सियासी फसल लहलहाने की कोशिशें हो रही हैं। अंबेडकर के बाद संत रविदास के नाम पर भाजपा, बसपा और कांग्रेस के साथ ही सपा भी दलित वोटों की होड़ में शामिल हो गई है। काशी में जन्मे संत रविदास ऐसे महान संत थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के जरिये सामाजिक विसंगतियों पर गहरी चोट की। इसमें जातिवाद की बुराई भी शामिल थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां वाराणसी में रविदास मंदिर में आयोजित समारोह में शामिल हुए वहीं सपा के प्रदेश कार्यालय में भी पहली बार अनुसूचित जाति, जनजाति प्रकोष्ठ की ओर से रविदास जयंती समारोह पूर्वक मनाई गई।
आप नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पहली बार काशी में रविदास जयंती समारोह में शामिल हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने रविदास जयंती के जरिये भाजपा के दलित एजेंडे को पुख्ता करने की कोशिश की। संत रविदास जंयती से चार दिन पहले दलित सम्मेलन करने वाली कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय में संत रविदास जयंती समारोह आयोजित करके विरोधी दलों पर निशाना साधा गया। वक्ताओं ने कहा, मौजूदा राजनीतिक माहौल में संत रविदास की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। प्रदेश कांग्रेस कांग्रेस अनुशासन समिति के अध्यक्ष रामकृष्ण द्विवेदी ने बसपा का नाम लिए बिना कहा कि कुछ दल एक जाति विशेष का इस्तेमाल केवल वोट बैंक के लिए कर रहे हैं। उनका दबे-कुचले और वंचित समाज के विकास व उत्थान से कोई लेना-देना नहीं है।
बहरहाल, एक तरफ दलितों के महापुरूषों की पूजा हो रही है तो दूसरी सच्चाई यह भी है कि दलितों के साथ आदिकाल से अन्याय होता आ रहा है। उनके साथ भेदभाव किया जाता है। समाज में बराबरी का हक नहीं मिलता है। कथित ऊंची जाति वाले इनके हाथ का छुआ खाना खाना तो दूर इनकी बस्ती से गुजरने से भी परहेज करते हैं। इन्हें सवर्ण जाति के लोग अपने बराबर में नहीं बैठने देते हैं। कई जगह दलितों को कुएं-हैंडपंप से पानी नहीं भरने दिया जाता। यह दर्दनाक स्थिति तब बनी हुई है जबकि तमाम सरकारें दलितों के उत्थान के लिये बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाती हैं। दलितों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया जाता है, उसी से दुखी होकर महात्मा गांधी ने कहा था कि अस्पृश्यता इंसानियत और जीवन के लिये अपराध है। बीते कुछ दशकों में यह भेदभाव काफी कम हुआ है, लेकिन आज भी जातिवाद के खिलाफ पूरी तरह से जागरूकता नहीं आई है। छुआछूत का खत्मा होने में शायद अभी कुछ और दशक लग जायेंगे। तमाम कोशिशों के बाद भी छुआछूत अगर खत्म नहीं हुआ है तो इसकी जितनी बड़ी वजह हमारा समाज और वर्ण व्यवस्था है, उससे कहीं अधिक जिम्मेदार हमारे सियासतदार हैं जो दलितों केा वोट बैंक के नजरिये से देखते हैं। जहां अशिक्षा वहाँ अंधेरा, यह बात दलित समाज पर पूरी तरह से लागू होती है। दलित आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है तो इसकी मुख्य वजह शिक्षा का अभाव है। कारण कोई भी हो परंतु हकीकत यही है। शिक्षा के अभाव में जब दलित अपने अधिकार के बारे में ही नहीं समझ पायेंगे तो अपना हक कैसे लेंगे। अपने अधिकार हासिल करने के लिये कभी कांग्रेस के और कभी बसपा के पीछे लामबंद होने वाला यह समाज पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ खड़ा दिखाई दिया।
2017 में दलित हमारे हो जायें। यह मुहिम सभी दलों के नेता चलाये हुए हैं। यहां तक की उत्तर प्रदेश में पहली बार विधान सभा के उपचुनाव में अपनी पार्टी की किस्मत आजमाने के लिये मैदान में उतरे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता ओवैसी को भी वोट बैंक की सियासत में मुस्लिमों के बाद दलितों पर सबसे अधिक भरोसा है। बीकापुर में ओवैसी की पार्टी ने किस मुसलमान को नहीं एक दलित को चुनाव मैदान में उतारा था। इसी भरोसे उन्होंने फैजाबाद की बीकापुर विधानसभा क्षेत्र में चुनावी समीकरण पलट दिये। बसपा की गैर-मौजूदगी में यहां के दलितों ने कांग्रेस, सपा और भाजपा के मुकाबले एआईएमआईएम पर अधिक भरोसा जताया। बिना किसी खास तैयारी से उतरे ओवैसी के दलित उम्मीदवार प्रदीप कोरी को 11,857 वोट मिले जो ओवैसी के लिये एक अच्छा संदेश रहा। यह वोट भाजपा प्रत्याशी से मात्र 76 वोट कम थे। उप-चुनाव में एक सीट पर हुई ओवैसी की धमाकेदार इंट्री ने 2017 के लिये ताल ठोक रहे तमाम दलों के दिग्गज नेताओं की नींद उड़ा दी है। ऐसा लगता है कि कई दलों के नेता समाजवादी पाटी के मजबूत एम-वाई (मुस्लिम-यादव) गठजोड़ को डी-एम (दलित-मुस्लिम) गठबंधन के सहारे ध्वस्त करके अपनी ताकत बढ़ाने के फिराक में लगे हैं।

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