महंगाई की जानलेवा सरकार

सरकार भले दलील गढ़े कि तेल मूल्यों में वृद्धि के लिए वह जिम्मेदार नहीं है लेकिन तेल वृद्धि का खेल बगैर सरकार के इशारे के संभव नहीं है। यह मजे की बात है कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल मूल्यों में गिरावट के कारण देश में तेल मूल्यों में कमी आती है तो इसका श्रेय सरकार लेती है। अपनी नीतियों की जमकर प्रशंसा करती है और पूर्ववर्ती सरकार को कोसने से भी नहीं चूकती है।

अरविंद जयतिलक

ऐसे समय में जब महंगाई चरम पर है और आम आदमी का जीना मुहाल है तेल कंपनियों ने पेट्रोल मूल्य में 3.13 रुपये और डीजल मूल्य में 2.71 रुपये की वृद्धि कर मोदी सरकार के अच्छे दिन आने के दावे की धज्जियां उड़ा दी है। लजाई-सकुचाई सरकार दलील दे रही है कि चूंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ रही है इसलिए पेट्रोल और डीजल मूल्य में वृद्धि आवश्यक हो गया। समझना कठिन होता जा रहा है कि मोदी सरकार का यह कैसा आर्थिक सुधार कार्यक्रम है कि तेल कंपनियां मालामाल हो रही हैं और आम आदमी महंगाई की आग में झुलसने को मजबूर है।
लोग उम्मीद लगाए बैठे थे कि एक साल पूरा होने पर सरकार की ओर से महंगाई से जूझ रही जनता को राहत देने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन आश्चर्य कि सरकार ऐसा करने के बजाए तेल कंपनियों को छूट दे दी कि वह जनता की गला रेत दे। गौर करें तो फरवरी के बाद तेल कंपनियों ने चौथी बार तेल मूल्यों में वृद्धि की है। लेकिन सरकार की नजरों में यह वृद्धि मामूली है। दरअसल सरकार की मंशा जनता की जेब काटकर अपनी आमदनी बढ़ाना है। यह तथ्य है कि 2014-15 में सरकार को पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी के कारण 74465 करोड़ रुपए का राजस्व मिला जो कि पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले यह इजाफा 50 फीसद से ज्यादा था। लेकिन आम जनता को कोई राहत नहीं मिली। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल मूल्यों में लगातार गिरावट जारी था तब भी मोदी सरकार ने आमजन को उचित राहत नहीं दी। थोड़ी-बहुत कीमतें घटाकर वाहवाही लूटी। अब तेल कंपनियां जनता का तेल निकालने पर आमादा हैं। तेल मूल्यों में वृद्धि का सर्वाधिक मार निम्न मध्यम वर्ग को ही झेलना होगा जो पहले से ही महंगाई की मार से त्रस्त हैं। सरकार भले दलील गढ़े कि तेल मूल्यों में वृद्धि के लिए वह जिम्मेदार नहीं है लेकिन तेल वृद्धि का खेल बगैर सरकार के इशारे के संभव नहीं है। यह मजे की बात है कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल मूल्यों में गिरावट के कारण देश में तेल मूल्यों में कमी आती है तो इसका श्रेय सरकार लेती है। अपनी नीतियों की जमकर प्रशंसा करती है और पूर्ववर्ती सरकार को कोसने से भी नहीं चुकती है। फिलहाल यह आवश्यक था कि सरकार महंगाई को देखते हुए तेल कंपनियों को तेल कीमतों में वृद्धि करने से रोकती। इससे महंगाई पर लगाम लगता और आम जनता को राहत मिलती। लेकिन सरकार ने ऐसा न कर अपनी नासमझी का ही परिचय दिया है। सच तो यह है कि उसने तेल मूल्यों में वृद्धि कर पहले से ही महंगाई की बोझ से दबे लोगों के घाव पर नमक छिडक़ दिया है। यह सच्चाई है कि जब तक आम आदमी के हाथ में पैसा नहीं होगा तब तक अर्थव्यवस्था की हालत सुधरने वाली नहीं है। लोगों के हाथ में पैसा रहेगा तभी बाजार गुलजार होगा और कल-कारखानें एवं उद्योग-धंधों के पहिए नाचेंगे। जहां तक इंफ्रास्ट्रक्चर को गति देने का सवाल है वह भी आम आदमी की खुशहाली से ही जुड़ा है।
वित्तमंत्री का दावा है कि आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था 8 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ेगी और आमजन की मुश्किलें कम होंगी। लेकिन भला इस दावे पर कौन भरोसा करेगा? राजस्व घाटा 2.8 फीसद और राजकोषीय घाटा 3.9 फीसद रहने के अनुमान से स्पष्ट है कि वर्ष 2015-16 में सरकार पर वित्तीय संकट मंडराता रहेगा। किसी से छिपा नहीं है कि वित्तमंत्री की लाख सक्रियता के बावजूद भी अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ सकी है। दूसरी ओर अपेक्षा के अनुरुप निवेश भी नहीं हो रहा है। एफडीआई को लेकर भी सरकार असमंजस में है। अर्थशास्त्र का नियम है कि महंगाई बढने से मांग घटती है। अभी तक तो मोदी सरकार महंगाई की जानलेवा सरकार ही साबित हुई है।

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