मस्ती कैंप में बच्चे भूल रहे अपना कल्चर

  • जगह-जगह समर कैंप का आयोजन
  • हिप हॉप और स्वीमिंग के शोर में मंद पड़ी कथक
  • क्लास्किल डांस की थॉप

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। आज की इस भागती दौड़ती जिन्दगीं मे जहां हर कोई अपने दिन प्रतिदिन के कामों मे व्यस्त है। वहीं गर्मियों की छुट्टिïयों ने बच्चों की व्यस्तता को बढ़ा दिया है। अब न नानी के घर छुटिटयां बिताने का प्रोग्राम और न ही पिता जी की उंगली थामे सुबह की सैर। अब तो हर दिन नया संघर्ष की तर्ज पर मां बाप अपने बच्चों को भविष्य की चुनौतियों से निबटने के लिए छुट्टियों का सद्उपयोग बजाए मस्ती के उनकों हुनरमंद बनाने में कर रहे हैं। शायद ही ऐसा कोई स्कूल होगा जहां इन दिनों समर कैंप का आयोजन नहीं किया जा रहा है। ज्यादातर स्कूलों में म्यूजिक, डांसिंग और आउटडोर गेम्स सिखाये जा रहे हैं। बच्चों को सिखाने वाली कलाओं में वेस्टर्न कलाओं का जोर है। हिप हॉप, लॉकिंग पॉपिंग, बेली डांस, की ट्रेनिंग दी जा रही है। वहीं आऊटडोर गेम्स लडक़े एंव लडकियों दोनों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। बच्चे क्रिकेट खेलते हुए दिख रहे हैं तो कुछ फुटबॉल, बास्केट बॉल, स्वीमिंग आदि के क्रेजी दिखे।

समर कैंप में बच्चों को म्युजिक सिखा रही लवलीन सिंह कहतीं हैं कि वेस्टर्न म्यूजिक बच्चों की पहली पसंद बना हुआ है आज कल बच्चे हनी सिंह को कॉपी करने की होड़ मे लगे हैं। वहीं कुछ बड़े लोक संगीत नाट्य कला अकादमी, थियेटर व सांस्कृतिक कला के रंगों मे रगने के लिये इन संस्थानों को पहली प्राथमिकता दे रहे हैं।

शांति जूनियर प्ले ग्रुप स्कूल में बच्चों की कलात्मक शैली को बढ़ावा देने के लिए क्लेवर्क, पजल, फ्रिज के लिए मैगनेट और सेल बैटरी से कलाओं का विकास करा रहे हैं जिससे बच्चों का दिमागी विकास हो सके।

कम है कथक का जोर
कथक टीचर रामेश्वरी कहतीं हैं कि लोक नृत्य संगीत व कथक जैसी कलाओं को सिखाने के लिए मां बाप बच्चों को कम ला रहे हैं। कई बार ऐसा होता है पैरेंट्स के दबाव मे बच्चे आ तो जाते हैं लेकिन बेमन से सीखते हैं जिसके कारण जैसे परिणाम आना चाहिए वह नहीं आते। उनका मानना है कि जमाना तेजी से बदला है और बदलते जमाने में बच्चों के शौक भी बदल गये है।

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