मशीन खराब रहती है या बात कुछ और है

एक करोड़ लागत से लगाई गई डिजिटल एक्सरे मशीन अक्सर रहती है खराबस्टॉफ की कमी से भी आ रही दिक्कतें

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। राजधानी के सभी सरकारी अस्पतालों में जनवरी माह में डिजिटल एक्सरे मशीन लगवाई गई थी ताकि लोगों को बेहतर सुविधा मिले, लेकिन लोगों को सुविधा मिल नहीं रही। इसका कारण बताया जाता है कि मशीन खराब है। मशीन सच में खराब रहती है या बात कुछ और है? ये तो स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार जानें। फिलहाल मरीजों को एक्सरे कराने के लिए प्राइवेट सेंटरों का सहारा लेना पड़ रहा है।
गुरुवार को बलरामपुर अस्पताल में डिजिटल एक्सरे मशीन दो घंटे तक खराब रही, जिससे एक्सरे के लिए आये मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ा। ये पहला मामला नहीं है। अक्सर सिविल, बलरामपुर और डफरिन अस्पताल की डिजिटल एक्सरे मशीन में दिक्कत आ जाती है। करीब 1 करोड़ की लागत से खरीदी गई डिजिटल एक्सरे मशीन 5 माह भी ठीक से नहीं चल पायी यह भी सोचने का विषय है। सूत्रों की मानें तो अस्पतालों में रेडियोलॉजिस्ट की कमी के चलते भी परेशानी खड़ी हो रही है।
नहीं दिया गया प्रशिक्षण
डिजिटल एक्सरे मशीन के आने के बाद रेडियालॉजिस्टों को मशीन का प्रशिक्षण दिया जाना था। प्रशिक्षण के अंतर्गत मशीन से संबंधित सभी जानकारियों और सावधानियों को शामिल किया गया था। प्रशिक्षण न होने के कारण मशीन का सही संचालन करने में असुविधा हो रही है, जिससे मशीन खराब होने का सिलसिला जारी है।
रेडियोलॉजिस्टों की कमी
अस्पतालों में रेडियोलॉजिस्टों की कमी है। सिविल व बलरामपुर अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट के 7 पद हैं और तैनाती मात्र 3 की है। इन्हीं लोगों पर सामान्य एक्सरे से लेकर डिजिटल एक्सरे करने का दबाव रहता है। वहीं डफरिन अस्पताल में एक ही रेडियोलॉजिस्ट तैनात है, जिसके कारण मशीन रेगुलर चल नहीं पाता।
मशीन पर पड़ता है दबाव
जब से अस्पतालों में डिजिटल एक्सरे मशीन आई है तब से सामान्य जांचों में भी इसका प्रयोग होने लगा है। मरीजों की जिद के कारण डॉक्टर भी मजबूरी वश डिजिटल एक्सरे के लिए ही लिखते हैं, इससे मशीन पर अधिक दबाव पड़ता है। सिविल अस्पताल के सीएमएस डॉ. राजेश ओझा ने बताया डिजिटल एक्सरे मशीन की क्षमता 130 है, जबकि रोजना 150 से 160 एक्सरे किया जाता है। मशीन पर दबाव पड़ रहा है, इसलिए खराब हो जाती है।

अस्पताल प्रशासन की अव्यवस्था बनी मरीजों के लिये समस्या

डिजिटल एक्सरे मशीन अगर एक ही व्यक्ति चला रहा है तो उसके खराब होने के मौके कम रहते हैं। वहीं अगर कई लोग मशीन को चला रहे हैं तो मशीन खराब होने के आसार ज्यादा रहते हैं। दूसरी तरफ अस्पताल कर्मियों और अस्पताल प्रशासन की इस हीलाहवाली से मरीज परेशान हो रहे हैं। अस्पताओं में जहां फ्री या कम पैसे देकर उनकी जांच हो जाती है वहीं प्राइवेट पैथोलॉजी सेंटरों पर उसी जांच के लिये दुगने पैसे वसूल किये जाते हैं।

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