मरीज को डॉक्टर ने किया वापस, कहा जाओ प्राइवेट अस्पताल में कराओ इलाज

अस्पताल नहीं धर्मशाला है, जिंदा रहना है तो जाओ यहां से कहीं और

मरीज को भर्ती करा दिया गया था। इलाज भी शुरू हो गया था। मरीज को किसी प्रकार की समस्या थी। तो उसकी जानकारी मुझे देते । उसका समाधान किया जाता। मरीज के साथ हुए गलत व्यवहार की जांच करायी जायेगी।

डॉ. प्रमोद कुमार,
निदेशक,
बलरामपुर अस्पताल।

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। प्रदेश सरकार की ढेरों कवायदों के बाद भी व्यवस्था सुधरने का नाम नही ले रही है। जहां एक तरफ सरकार लोगों के इलाज के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं तो वहीं कुछ डॉक्टरों की गैरजिम्मेदाराना रवैये के चलते मरीजों के लिए ये सुविधाएं बेमानी साबित हो रही हैं। सरकार सरकारी अस्पतालों में निजी संस्थानों से अच्छी चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध करा रही है तो वहीं राजधानी के केजीएमयू तथा बलरामपुर अस्पताल के कुछ चिकित्सक अपनी हरकतों के चलते सरकार के छवि धूमिल कर रहे हैं।
सरकारी अस्पतालों में आम लोगों को इलाज के नाम पर बेड न खाली होने का बहाना बता कर वापस कर दिया जाता है, जिसके बाद ट्रामा सेन्टर या बलरामपुर अस्पताल से इलाज न मिल पाने की सूरत में मरीज को जान बचाने के लिए उन्हें राजधानी के निजी संस्थानों मे जाना पड़ रहा है। ट्रामा सेन्टर से मरीजों को भगाया जाना आम बात हो गया है। साथ ही बलरामपुर अस्पताल में भी चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह चरमराई नजर आ रही है। बलरामपुर जिले के निवासी धर्मराज सिंह (56)के पेट में समस्या होने पर परिजनों ने जिला अस्पताल में दिखाया था। वहां के चिकित्सकों ने मरीज की हालत गम्भीर देख केजीएमयू रेफर कर दिया। मरीज को लेकर परिजन 28 फरवरी की सुबह केजीएमयू के ट्रामा सेन्टर पहुंचे। वहां पर इमरजेन्सी में मरीज को भर्ती कर चिकित्सकों द्वारा इलाज शुरू किया गया। मरीज के पुत्र रिंकू सिंह का आरोप है कि इमरजेन्सी में थोड़ी देर इलाज करने के बाद ट्रामा सेन्टर स्थित मेडिसिन विभाग में भेज दिया गया लेकिन वहां मौजूद चिकित्सक डॉॅ.सीताराम ने फटकार लगाते हुए भगा दिया कि यहां पर जब जगह नही है तो तुमकों भर्ती किसने कर लिया। यहां इलाज नही हो पायेगा। भाग जाओं यहां से। परिजनों ने मरीज की बिगड़ती हालत देखकर काफी मानमनौव्वल किया लेकिन चिकित्सक का मन नहीं पसीजा। परिजनों की लाख गुजारिशों के बाद भी उस
चिकित्सक के अन्दर मर चुकी मानवीय संवेदना नही जागी।

इमरजेन्सी के चिकित्सक ने जिला अस्पताल कोबताया धर्मशाला

थक हार कर परिजन मरीज को लेकर बलरामपुर अस्पताल पहुंचे। पहले तो वहां पर मौजूद चिकित्सक ने मरीज की हालत गम्भीर बताकर भर्ती करने से मना कर दिया। इस बात की जानकारी जब अस्पताल के निदेशक को हुयी तो उन्होने मरीज को भर्ती कराया। इमरजेन्सी के नाराज चिकित्सक ने मरीज के परिजनों से यहां तक कह डाला कि यह अस्पताल नही धर्मशाला है, मरीज को जिंदा देखना चाहते हो तो इसे किसी प्राइवेट अस्पताल में ले जाओ। आए दिन इस तरह के मामले बलरामपुर अस्पताल में देखने को मिलते रहते हैं। जब गंभीर हालत में मरीज अस्पताल पहुंच कर बेचारगी की अवस्था में पड़े होते हैं तब अस्पताल के डॉक्टर उन्हें प्राइवेट अस्पतालों में जाने का सुझाव देते रहते हैं। लेकिन मरीज के परिजनों की आर्थिक हालत खस्ताहाल होने के कारण वह सरकारी अस्पतालों के मोहताज बने रहते हैं। कई मामलों में तो मरीज अस्पताल पहुंच कर अपना दम भी तोड़ देते हैं।

तीन घंटे बीतने के बाद भी नही मिला इलाज

चिकित्सक के नाराजगी का आलम यह रहा कि तीन घंटे बीतने के बाद भी मरीज का इलाज नही शुरू हो पाया। बार-बार मरीज के परिजनों से एक ही बात कही जा रही थी कि फोन कराने से इलाज नही मिल पायेगा। अब मरीज को यहां से लेकर जाना ही पड़ेगा।
गार्ड बना गुंडा
अस्पताल के सुरक्षा की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है वो गुंडो जैसा व्यवहार कर रहे हैं। मरीज के पुत्र रिंकू का कहना है कि इमरेजन्सी में लगे नल से पानी लेकर मरीज को खिलाने के लिए खिचड़ी ठंडी कर रहे थे कि तभी वहां मौजूद गार्ड ने डांटते हुए कहा कि मरीज खिचड़ी खाये या मर जाये, हमे पानी भरने दो।

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