मजलूमों की आवाज बने फैशनपरस्त पूर्व आईएएस अनीस अंसारी

Captureलखनऊ। पूर्व कृषि आयुक्त और ख्वाजा मोइनुद्ïदीन चिश्ती के पूर्व वाइस चांसलर अनीस अंसारी भी अब बैक डोर से राजनीति करेंगे। पिछले कई महीनों से बेकार पड़े अनीस अंसारी ने अपने लिए काम ढूंढ लिया है। अनीस अंसारी अपनी पत्नी असमा हुसैन के साथ अब घर-घर जाकर ओबीसी, बैकवर्ड और दलित समाज को जागरूक करेंगे। अब वह वंचित मुस्लिम समाज की आवाज को बुलंद करेंगे। अनीस अंसारी ने कौमी वंचित मोर्चा नाम से एक एनजीओ बनाया है। इस एनजीओ के जरिये वह लोगों को जागरूक करने का काम करेंगे। अनीस अंसारी ने बताया कि पॉलिटिकल पार्टियां वोट हासिल करके इस समाज को भूल जाती हैं। मुस्लिम ओबीसी की हालत दिन प्रतिदिन खराब हो रही है।
अनीस अंसारी बैक डोर से राजनीति करेंगे। उन्होंने कोई पालिटिकल पार्टी तो नहीं बनाई लेकिन काम वह राजनीति से मिलता जुलता ही करेेंगे यानी कि सेवा। वह लोगों की सेवा करेंगे। उनके बीच जाएंगे। उनके हक और हुकूक के बारे में उनको बताएंगे। अनीस अंसारी से जब यह पूछा गया कि उन्होंने सीधे तौर पर पालिटिकल पार्टी क्यों नहीं बनाई तो उनका कहना था कि उनके पास पैसे नहीं हैं और न ही वर्कर की फौज इसलिए वह एनजीओ की मॉर्फत लोगों की सेवा करेंगे। उनकी सेवा किसी न किसी राजनीतिक पार्टी को परेशान करने वाली और किसी दूसरे राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने वाली होगी। क्योंकि इस बार उत्तर प्रदेश का इलेक्शन मुस्लिम राजनीति के इर्द-गिर्द ही घूमेगा। ऐसे में राजनीतिक पंडित उनके इस नये मोर्चे के सियासी मायने निकाल रहे हैं। समाजशास्त्री डीके त्रिपाठी कहते हैं कि अगर सेवा ही करना उददेश्य है तो पहले से इस दिशा में काम कर रहे सियासी संगठनों से जुडक़र सेवा की जा सकती थी। इससे दो फायदे होते। अनीस अंसारी का व्यापक अनुभव का फायदा मिलता और काम का बंटवारा होने से मेहनत भी कम लगती। अनीस अंसारी ने अपना मोर्चा बनाया है ऐसे में सवाल यही है कि जो बीड़ा उन्होंने उठाया है उसमें कड़ी मेहनत चाहिए। जनता के बीच जाना और उनको मोटिवेट करना कोई आसान काम नहीं होगा। आईएएस जावेद उस्मानी और आईपीएस रिजवान अहमद जैसे अधिकारियों को सरकार ने हाल ही में सिस्टम में समायोजित किया है। जावेद उस्मानी सीआईसी बनाये गये हैं तो रिजवान अहमद को मुलायम सिंह यादव स्टडी सेंटर का डायरेक्टर बनाया गया है। ऐसे में लंबे समय से मुख्य धारा में जुडऩे के लिए बेताब अनीस अंसारी को स्वयं आगे आना पड़ा। निश्चित तौर पर वह सेवा पहले से कर रहे थे। लेकिन उन्होंने अपने द्वारा की जा रही सेवा का ढिंढोरा नहीं पीटा। अनीस अंसारी स्वयं के काम से कम और पत्नी के काम के कारण ज्यादा चर्चा में रहे हैं। मायावती राज में पिंक फैशन शो को शायद ही अभी कोई भूला हो। वह समय-समय पर फैशन शो में अवतरित होते हैं। अनीस अंसारी अपने ड्रेसिंग सेंस के कारण भी लोगों का केन्द्र बिंदु बनते हैं। वह अच्छे शायर हैं और पिछले वर्ष मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनकी किताब का विमोचन किया था। काफी देर तक चले उस प्रोग्राम के बाद लगने लगा था कि अनीस अंसारी को कोई न कोई काम मिल जाएगा। लेकिन उनको काम नहीं मिला और वह इस तरह का दल बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
आखिरकार यह कैसी सजा…

लखनऊ। विशाखा जांच के बाद विभूतिखंड के पूर्व थानाध्यक्ष पंकज सिंह पर मुकदमा तो दर्ज हो गया लेकिन कार्रवाई के नाम पर अधिकारियों ने उन्हें लाइन हाजिर किया है। लाइन हाजिर कोई सजा नहीं होती है। यह स्थानान्तरण की कार्रवाई होती है।
विभूतिखंड थानाध्यक्ष के पद पर रहते हुए पंकज सिंह ने अपने ही थाने में तैनात एक महिला सिपाही से जहां अश्लील हरकत की थी, वहीं उसे अश्लील विडियो भी दिखाया था। इस मामले में महिला सिपाही ने तत्कालीन एसएसपी जे. रविन्द्र गौड से शिकायत की थी। इसके बाद भी पंकज सिंह थानाध्यक्ष बने रहे। थकहार कर महिला सिपाही ने गौड़ को इस्तीफा भेज दिया। इस्तीफा भेजने से हडक़म्प मच गया। कई माह बाद पंकज सिंह को थानाध्यक्ष के पद से हटाते हुए अपराध शाखा में तैनात कर दिया गया। पंकज पर कार्रवाई न हो इसके लिए अधिकारियों ने उसका फिर स्थानान्तरण करते हुए बाराबंकी जनपद के रामनगर थाने की कमान सौंप दी। एक वर्ष के बाद आखिरकार महिला सिपाही की मेहनत रंग लाई। विशाखा जांच में पंकज सिंह दोषी पाये गए। जहां उनके खिलाफ विभूतिखंड थाने में ही धारा 354(क) और 509 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। बाराबंकी एसपी ने पंकज को लाइन हाजिर कर दिया। सवाल उठता है कि आखिरकार यह कैसी सजा है जिसमें न तो वेतन से कटौती होगी और न ही प्रतिष्ठा पर कोई आंच आएगी। क्योंकि लाइन हाजिर करने से उस पुलिसकर्मी के सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। थानाध्यक्ष को पद से हटाने के बाद सिर्फ उसे सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार मात्र 90 रुपए नहीं मिलते हैं। जबकि अन्य हर सुविधाएं मिलती हैं। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि छेडख़ानी जैसी घटना को अंजाम देने वाले दारोगाओं की गलतियों पर यह कैसी सजा है।

केजीएमयू ट्रॉमा में अब हाईटेक रैन बसेरे की तैयारी

लखनऊ। ट्रॉमा सेंटर में आने वाले मरीजों के तीमारदारों को खुली धूप में समय गुजारना पड़ रहा है। कारण ट्रॉमा सेंटर में रैन बसेरे की व्यवस्था नहीं है। केजीएमयू प्रशासन की ओर से तीमारदारों के लिए छांव का इंतजाम किया गया है लेकिन तीमारदारों की संख्या इतनी ज्यादा है कि कामचलाऊ रैन बसेरे से काम नहीं चल रहा है। वहीं ट्रॉमा में रैनबसेरा बनाने के लिए तोड़-फोड़ का काम खत्म हो गया है। केजीएमयू प्रशासन का कहना है कि रैन बसेरे का निर्माण कार्य जल्दी ही शुरू किया जायेगा।
ट्रॉमा में रैनबसेरे के निर्माण के लिए सरकार ने बजट जारी कर दिया है। ट्रॉमा सेंटर में बनने वाले रैन बसेरे में तीमारदारों के लिए वीआईपी सुविधायें मुहैया कराई जायेंगी। केजीएमयू प्रशासन का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर में बनने वाले रैन बसेरे में पीजीआई के रैन बसेरों की तरह सुविधायें मुहैया कराई जायेंगी।
बताते चलें केजीएमयू स्थित ट्रॉमा सेंटर में रैनबसेरा न होने से तीमारदारों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। जाड़े, गर्मी, बरसात में तीमारदारों को बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ट्रॉमा सेंटर में रैनबसेरे के निर्माण के लिए रसोई घर सहित कई पुरानी ईमारतों को तोडऩे का खत्म हो चुका है। केजीएमयू के उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वेदप्रकाश ने बताया कि रैनबसेरे के निर्माण के लिए सारी जरूरतों को पूरा कर लिया गया है। केजीएमयू में चार से छह हजार मरीज भर्ती हैं। इन मरीजों के तीमारदारों को बेहतर से बेहतर सुविधा प्रदान करने के लिए केजीएमयू प्रशासन की ओर से गहन विचार किया जा रहा है। जल्द से जल्द निर्माण कार्य शुरू किया जायेगा।

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