मंत्रियों की पौ बारह

चेतन गुरुंग
हरीश रावत पर आए सियासी और आपराधिक संकट से मंत्रियों की खास तौर पर इन दिनों पौ बारह है। जिन मंत्रियों को हमेशा शिकायत रहती थी कि मुख्यमंत्री के दरबार में उनकी सुनवाई नहीं होती है और वे नाम मात्र के वजीर हैं, अब उनकी इच्छा के बगैर सरकार में पत्ता नहीं हिल रहा है। मंत्री तो बहुत बड़ी बात है हकीकत यह है कि आज कांग्रेस के आम विधायकों की भी जम कर खातिरदारी हो रही है। अभी भी सरकार और मौजूदा विधानसभा का पांच साला काल पूरा होने के लिए तकरीबन आठ महीने हैं। ऐसे में रावत नहीं चाहते हैं कि ये वक्त बजाय सरकार और संगठन को मजबूती देते हुए आगे बढऩे के आपसी द्वंद्व में खामोख्वाह उलझ कर दिन बर्बाद करें और सरकार को फिर संकट में जाने दें। उनको समझ में आ चुका है कि तानाशाही वाले अंदाज से सरकार चलाने के दिन पूरे हो चुके हैं। अब तो मिल जुल कर नहीं चले तो सरकार की कश्ती कभी भी किसी भी किनारे पर डूब जायेगी। मुख्यमंत्री रुपी उनकी पतवार किसी काम नहीं आएगी। वैसे भी स्टिंग मामले में सीबीआई जांच का सामना करने से वो अब पहले जितने दिल के पक्के अब नहीं दिख रहे हैं। यह बात और है कि रावत ने अकेले बीजेपी के न सिर्फ दांत खट्टे कर दिए हैं बल्कि बहुत हद तक उत्तराखंड में सियासी खेल को लव आल की सूरत में ले आए हैं। हालांकि इस सच्चाई को कई सियासी जानकार मानते हैं कि अगर बीजेपी ने सरकार गिराने की नाहक जल्दबाजी न की होती तो अगले विधानसभा चुनाव में रावत और कांग्रेस सरकार खुद भी बाहर का रास्ता देखती। राज्य की सियासी परंपरा यही साबित करती है। अभी तक कोई भी पार्टी लगातार दूसरा कार्यकाल हासिल नहीं कर पायी है। सरकार जैसी भी चली हो,जितनी अच्छी चली हो। रावत ने भले बीजेपी के हर वार को अब तक निष्फ ल किया है लेकिन वो आज की तारीख में अपने मंत्रियों और विधायकों के भीषण दबाव में हैं। उनकी स्थिति अब वो नहीं रह गई है जो चार महीने पहले तक थी। इंदिरा हृदयेश, यशपाल आर्य, प्रीतम सिंह सरीखे कद्दावर कैबिनेट मंत्रियों की हैसियत कुछ महीने पहले तक आम दरबारी से ज्यादा नही थी। इंदिरा तो इस कदर परेशां थी कि कोई मिसाल नहीं। उनके पास वित्त और भारी उद्योग सरीखे कहने को अहम महकमे शुरू से हैं पर दोनों में ही उनकी पहले कभी नहीं चली। जो नौकरशाहों ने तय किया वही मुख्यमंत्री मानते थे। इंदिरा की हालत इतनी कमजोर हो गई थी कि वाणिज्यकर महकमे में तबादले उनकी मर्जी के बगैर होते रहे और वो इससे जुड़ी फ ाइल की बाट जोहती रहती थीं। तबादले आयुक्त अपने स्तर पर ही कर देते थे। कैबिनेट मंत्री हो और कोई तबादला कराने या रुकवाने उनके पास न जाए तो फि र यह उनकी बेचारगी को जाहिर करने के अलावा कुछ नहीं करती है। एक सचिव स्तर के अफ सर के मुताबिक इंदिरा ने तबादलों में उनकी मंजूरी न लिए जाने पर जम कर नाराजगी भी जताई थी। हालांकि इसका बहुत असर नहीं पड़ा। अफ सर सीएम से आदेश लेते रहे या फि र खुद ही फैसले करते रहे। इंदिरा मन मसोस कर रह जाती थीं।
कैबिनेट मंत्री आर्य की नाराजगी के किस्से तो खुलेआम मीडिया में छपते और दिखते रहे। यह कोई छुपा हुआ सच नहीं था कि आर्य सरकार में अपनी उपेक्षा का आरोप लगा कर रावत से खफ ा होते रहते थे। कई बार तो वो अज्ञातवास तक में चले गए और सीएम दफ्तर तक उनसे संपर्क करने में नाकाम रह जाता था। आर्य की रूचि अपने विभागों तकनीकी शिक्षा और राजस्व में खुल कर काम करने की रहती थी और इसमें सीएम सचिवालय का दखल रहता रहा है। आर्य को अपने पसंद का डीएम भी उधमसिंह नगर में चाहिए होता था। इसको लेकर भी उनकी सीएम से हमेशा तनातनी रही। प्रीतम सिंह गृह मंत्री होने के बावजूद पुलिस और कानून व्यवस्था के मामले में शायद सबसे कम दखल रखते हैं। यह सब सीएम खुद ही देखते रहे हैं। छोटे मामले तो उनके छोटे और खास दरबारी ही देख लेते हैं। इसको लेकर भी प्रीतम खफ ा होते रहे हैं। अब तस्वीर बदलती दिख रही है। जो मंत्री और विधायक खुद को दरकिनार किये जाने का रोना रोते थे आज उनकी जम कर कदर हो रही है। वे इन दिनों जो चाह रहे हैं वो रावत के लिए पत्थर की लकीर साबित हो रही है। इस बदलाव से मंत्रियों की खास तौर पर मौज हो गई है। सीएम ने मंत्रियों के भाव न सिर्फ बढ़ा दिए हैं बल्कि उनको अपने महकमों में खुल कर काम करने की भी एक किस्म से छूट दी है। सबसे ज्यादा शक्तिशाली बन कर अगर कोई नाम उभरा है तो वो इंदिरा हैं। सरकार सिडकुल के प्रबंध निदेशक राजेश कुमार को काफ ी पहले से बदलना चाह रही है लेकिन राजेश अपनी कुर्सी पर बने हुए हैं। माना जा रहा है कि राजेश ने इंदिरा की शरण ले ली है। इसके चलते सरकार उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही है। आज इतना तो तय दिख रहा है कि विभागीय मंत्री इंदिरा की इच्छा के बगैर कोई भी बदलाव सिडकुल में नहीं होगा जो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी सरीखे है। उनकी नाराजगी के कारण ही सख्त किस्म के आईएएस अफ सर दिलीप जावलकर को वाणिज्यकर आयुक्त की कुर्सी से हटाने के लिए रावत को विवश होना पड़ा। जावलकर अरबों की कर चोरी कर सुकून से रह रहे कारोबारियों की पीछे हाथ धो कर पड़ गए थे। घबराये कर चोर कारोबारियों ने दिलीप को हटाने के लिए इंदिरा के यहाँ गुहार लगायी थी। मंत्रियों की बढ़ती ताकत की एक और मिसाल उधम सिंह नगर के जिलाधिकारी की लम्बे समय से खाली कुर्सी है। इतना अहम जिला सिर्फ इसलिए बगैर डीएम के है क्योंकि कैबिनेट मंत्री आर्य को वो नाम पसंद नहीं आ रहे हैं जो सीएम डीएम के तौर पर सुझा रहे हैं, इसके चलते उधमसिंह नगर का प्रशासन भी भगवान भरोसे है। सीएम रावत की हिम्मत नहीं हो रही है कि वो बदले सियासी हालत में आर्य को किसी भी प्रकार से नाराज कर सके। यूँ भी आर्य को भी उन लोगों में शुमार किया जाता है जिनका बीजेपी में जाना तय था और आखिरी पलों में जिन्होंने अपना मत बदल लिया। रावत भी इस तथ्य को जानते हैं। विधायक नवप्रभात प्रदेश में सियासी उठापटक के हालत उत्पन्न होने तक खुद को बेहद उपेक्षित महसूस करते थे। वो इसको छिपाते भी नहीं थे। आज वो रावत के विश्वासपात्रों में शुमार हैं। अब जबकि मंत्रिमंडल में खाली दो सीटों को भरा जाना है तो राजेंद्र भंडारी के साथ नवप्रभात का ही नाम इन सीटों के प्रमुख दावेदारों के तौर पर लिया जा रहा है। आज उनकी हैसियत यह है कि जो वो चाहते हैं मुख्यमंत्री वो करने में हिचकते नहीं या फि र टालमटोल करने की कोशिश नहीं करते हैं। इस तरह देखा जाए तो हरीश रावत पर गिरी स्टिंग और सियासी विपदा की गाज मंत्रियों और विधायकों के लिए नया और स्फ ूर्ति भरा जीवन ले आया है।

 

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