भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें…

भ्रष्टाचार करने वाले किसी दूसरे ग्रह के लोग तो हैं नहीं। भ्रष्टïाचार को अंजाम जनता ही दे रही है। जो जहां नियुक्त है वहीं रिश्वत ले रहा है। एक दौर था कि बेईमान, रिश्वत लेने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता था और आज जो ईमानदार है उसे आश्चर्य के साथ देखा जा रहा है।

sanjay sharma editor5सरकार चाहे कितनी कोशिश कर ले, भ्रष्टïाचार पर अंकुश नहीं लग सकता। दरअसल भ्रष्टïाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि उसे उखाड़ पाना आसान नहीं है। छोटे-छोटे काम बिना रिश्वत के नहीं होते। अब तो आलम यह है कि यह बात लोगों की मानसिकता में आ गई है कि बिना पैसे दिए काम नहीं होगा। आदमी अपना काम कराने जाता है तो खुद ही रिश्वत की पेशकश करने लगता है। न लोगों को देने में शर्म आती है और न लोगों को लेने में। इस व्यवस्था से आम आदमी इतना त्रस्त हो गया है कि वह यह उम्मीद नहीं कर पाता है कि बिना रिश्वत दिए कुछ काम हो सकता है। सरकारी नौकरी चाहिए तो रिश्वत दो। और तो और जन्म प्रमाण पत्र तक के लिए दो सौ से पांच सौ रुपए लोगों को रिश्वत देना पड़ रहा है, तो और किसी काम के लिए लोगों को कितनी परेशानी का सामना करना पड़ता होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। भ्रष्टïाचार की गंभीरता को सरकार भी समझ रही है और कोर्ट भी। सरकारें समय-समय पर भ्रष्टïाचार से निपटने के लिए अनेक उपाय बताती है और कोर्ट समय-समय पर सरकार की खिंचाईं करती है, लेकिन परिणामस्वरूप कुछ हासिल नहीं होता।
दो फरवरी को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने भ्रष्टïाचार के मामलों में लगातार हो रही वृद्धि पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि नागरिक इसके खिलाफ आवाज उठाएं। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार अगर भ्रष्टïाचार को काबू करने में विफल रहती है तो नागरिक टैक्स अदा न करते हुए असहयोग आंदोलन की शुरुआत करें। जस्टिस अरुण चौधरी ने भ्रष्टïाचार को बड़े सिर वाला राक्षस बताते हुए कहा कि यह समय एक साथ आकर अपनी सरकारों को यह बताने का है कि अब अति हो चुकी है और साथ मिलकर भ्रष्टïाचार की सड़ांध को खत्म किया जा सकता है। उन्होंने आगे कहा कि, बावजूद इसके यह जारी रहता है तो असहयोग आंदोलन के तहत टैक्स देना बंद कर देना चाहिए। कोर्ट ने सुझाव तो दे दिया, लेकिन देश के नागरिक इसका कितना पालन करेंगे, इसमें थोड़ा संशय है। इसका कारण भी ठोस है, क्योंकि भ्रष्टïाचार करने वाले किसी दूसरे ग्रह के लोग तो हैं नहीं। भ्रष्टïाचार को अंजाम जनता ही दे रही है। जो जहां नियुक्त है वहीं रिश्वत ले रहा है। एक दौर था कि बेईमान, रिश्वत लेने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता था और आज जो ईमानदार है उसे आश्चर्य के साथ देखा जा रहा है। उसके लिए कहा जाता है कि सिस्टम के साथ चल नहीं पाएगा। आज रिश्वत का चलन भी बदल गया है। पद के हिसाब से रिश्वत तय हो गई है। ऐसे में कोर्ट के सुझाव पर अमल कितने लोग करते हैं यह देखना दिलचस्प होगा।

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