भूमि अधिग्रहण विधेयक का भविष्य अनिश्चित

वर्तमान स्थिति यह है कि महत्वपूर्ण विकास योजनाओं के लिए भी भूमि अधिग्रहण में कम से कम पांच साल तो लग ही जाते हैं। इस समय 90 हजार करोड़ रुपये की निवेश की 132 परियोजनाएं भूमि उपलब्ध न होने के कारण रुकी पड़ी हैं। दूसरी ओर, राज्यों के मुख्यमंत्री एवं उद्योगमंत्री विदेशी दौरा करके अधोसंरचना सुविधायुक्त भूमि उपलब्ध करवाने का आश्वासन देकर निवेशकर्ताओं को आमंत्रित करना जारी रखे हुए हैं।

 डॉ. हनुमंत यादव
नरेन्द्र मोदी सरकार तीसरी बार अध्यादेश लाकर आम सहमति न बन पाने के कारण संसद के चालू सत्र में भूमि अधिग्रहण विधेयक की संसद से मंजूरी प्राप्त करना असंभव दिखाई दे रहा है। यद्यपि राज्य सभा की प्रवर समिति की रिपोर्ट एक या दो दिन में प्रस्तुत किए जाने की सम्भावना है किन्तु कांग्रेस दल के वर्तमान विरोधी रुख को देखते हुए विधेयक के लम्बित पड़े रहने की सम्भावना अधिक है। अब सरकार के सामने दो ही विकल्प बचे हैं, पहला विकल्प है कि सरकार चौथी बार राष्ट्रपति से अध्यादेश जारी करवाए तथा दूसरा विकल्प है कि विधेयक को वर्तमान स्वरूप में संसद से पारित करवाने का इरादा त्याग कर राज्यों को भूमि अधिग्रहण कानून बनाने की आजादी प्रदान कर दे। सरकार अध्यादेश जारी करने के विकल्प अब शायद ही चुने क्योंकि तीसरे अध्यादेश जारी करवाने के बावजूद कानून बनाने में असफल रहने पर सरकार की बहुत किरकिरी हो चुकी है। वर्तमान विधेयक के संशोधनों के साथ अब संसद के शीतकालीन सत्र में आने की संभावना है।
31 दिसम्बर 2014 को जब सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन कानून 2013 में बदलाव हेतु अध्यादेश जारी करवाया था तो उस समय सरकार इतने अधिक आत्मविश्वास में थी कि किसानों के संगठनों एवं क्षेत्रीय दलों से सही ढंग से चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझा गया था। भाजपा की सहयोगी शिवसेना व अकाली दल ही नहीं, बल्कि आर.एस.एस. के सहयोगी प्रकल्प स्वदेशी जागरण मंच के सुझावों पर भी ध्यान नहीं दिया गया था। यद्यपि सरकार ने 31 दिसम्बर 2014 को अध्यादेश जारी करके रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, ग्रामीण अधोसंरचना, सस्ते घर, औद्योगिक कॉरीडोर और अन्य आधारभूत संरचनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण को प्रभावशील कर दिया है, किन्तु अभी तक सरकार द्वारा उक्त अध्यादेश के तहत एक इंच जमीन भी अधिगृहीत नहीं की गई है। किसानों एवं सिविल सोसाइटी संगठनों द्वारा इस बिल के विरोध का मुख्य कारण 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के किसानों की सहमति और सामाजिक प्रभाव के आंकलन की अनिवार्यता को हटा देना है। फिलहाल वर्तमान स्थिति यह है कि महत्वपूर्ण विकास योजनाओं के लिए भी भूमि अधिग्रहण में कम से कम पांच साल तो लग ही जाते हैं। इस समय 90 हजार करोड़ रुपये की निवेश की 132 परियोजनाएं भूमि उपलब्ध न होने के कारण रुकी पड़ी हैं। दूसरी ओर, राज्यों के मुख्यमंत्री एवं उद्योगमंत्री विदेशी दौरा करके अधोसंरचना सुविधायुक्त भूमि उपलब्ध करवाने का आश्वासन देकर निवेशकर्ताओं को आमंत्रित करना जारी रखे हुए हैं। अब तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अपने मेक इन इंडिया अभियान के तहत हर विदेश दौरे पर वहां के उद्योगपतियों को भारत में उद्योग लगाने हेतु आमंत्रित कर रहे हैं।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने गत 1 अगस्त को टिकाऊ एवं समावेशी शहरीकरण विषय पर आयोजित एक सम्मेलन में कहा कि भारत में विकास योजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण करना वर्तमान सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। उनके मुताबिक भारत में किसी भी बड़ी परियोजना एवं शहरी विकास के लिए भूमि अधिग्रहण में पांच साल लग ही जाते हैं। किन्तु भूमि अधिग्रहण में गैर-सरकारी संगठनों द्वारा आन्दोलन या न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से विरोध किया जाता है तो पांच साल से अधिक समय भी लग जाता है। उनका कहना है कि बहुमंजिला भवनों के निर्माण को शहरीकरण नियोजन में महत्वपूर्ण स्थान देकर भूमि की मांग में कमी लाई जा सकती है किन्तु सिंचाई व जलविद्युत परियोजनाओं के लिए तो कृषि भूमि के डूबत में जाने की संभावना बनी रहेगी। जमींदारी उन्मूलन तथा भूमि सीलिंग कानून के बाद भारत के अधिकतर किसानों को मालिकाना अधिकार मिल पाया।
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