भारत में पारम्परिकता बनाम आधुनिकता

इस बारे में एक शोध दरभंगा क्षेत्र की निवासरत 200 शिक्षिकाओं पर मुजम्मिल हसन आरजू द्वारा किया गया, जो वर्ष 2009 में समाप्त हुआ। इसमें 50 से अधिक प्रश्न उत्तरदाताओं से पूछे गये थे। उनके उत्तर निम्न मध्यम वर्ग से जो मिले, उन्हें प्रतिनिधि उत्तरों के रूप में माना जा सकता है- न केवल दरभंगा अथवा बिहार के लिए बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए।

ललित सुरजन
भारत देश के निवासियों का रहन-सहन सदियों की परम्पराओं के उपरान्त परिभाषित हुआ है। उसमें अपनी बुराईयां भी हैं, और अच्छाइयां भी।
यहां ब्रिटिश शासन और बाद में उससे आजादी के बाद का नया संविधान लागू किया गया, जिसमें आधुनिक दृष्टिकोण अपनाया गया। इसका सबसे चर्चित बिन्दु हैं धर्म-निरपेक्षता और सबसे प्रशंसनीय बिन्दु है समस्त नागरिकों की स्वतंत्रता, बराबरी, और भाईचारा। धर्मनिपरेक्षता एक ऐसा आदर्श है, जो एक आदर्श स्थिति को बतलाता है, परन्तु उस आदर्श तक पहुंचने का रास्ता इतना आसान नहीं है। हम सभी धर्मों से विमुख हो जायें, यह इतना आसान नहीं हैं। चूंकि हमारे पुरखे सदियों पहले एक धर्म के अनुयायी होकर उसके तौर-तरीकों के अनुसार अपना जीवनयापन करते आ रहे हैं। वे एक समाज के सदस्य हैं जिनमें आपस में शादी व रिश्ते होते हंै। स्वाभाविक है कि हम अपने पड़ोसी के रूप में उसी धर्म के लोगों को ज्यादा पसन्द करेंगे जिसमें हम स्वयं हैं। अन्य भी कई बिन्दुओं पर आकर हम ठिठक जाते हैं कि हम आधुनिक तार्किक और ठोस बौद्धिक वैज्ञानिक क्यों नहीं हो सकते? कुछ बाधाओं को नि:शंक क्यों नहीं कर सकते? लोगों का सामाजिक व्यवहार किन बिन्दुओं पर अधिक संकुचित है।
इस बारे में एक शोध दरभंगा क्षेत्र की निवासरत 200 शिक्षिकाओं पर मुजम्मिल हसन आरजू द्वारा किया गया, जो वर्ष 2009 में समाप्त हुआ। इसमें 50 से अधिक प्रश्न उत्तरदाताओं से पूछे गये थे। उनके उत्तर निम्न मध्यम वर्ग से जो मिले, उन्हें प्रतिनिधि उत्तरों के रूप में माना जा सकता है- न केवल दरभंगा अथवा बिहार के लिए बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए। उत्तरदाता सभी शिक्षित तो जरूर थीं पर न अधिक शिक्षित न अधिक साधन-सम्पन्न अथवा अति-आधुनिक । फिर भी, उनके विचारों में आ रहा परिवर्तन गौरतलब है।
सबसे पहले यह विचारणीय है कि आधुनिकता किसे कहेंगे? अंग्रेजी में इसका जो पर्यायवाची शब्द है ‘मॉडर्न’ व ग्रीक शब्द ‘मोडो’ से लिया गया है- अर्थात जो प्रचलन में है उसे स्वीकार करना। इसके विपरीत परम्परा (ट्रेडीशन) का आशय है एक-दूसरे को देना। इसमें शामिल हैं, साधु-महात्मा के उपदेश, धार्मिक कपोल कल्पना- कथायें व भूले हुए तथा जिन्हें जनता पीढ़ीदर पीढ़ी ग्रहण करती है। आधुनिकता के लक्षण यह हैं-
1. अपना जीवन स्तर बढ़ाना 2. शिक्षा बढ़ाना 3. विज्ञानपरक विचार 4. जाति-पांति से ऊपर उठना 5. औद्योगीकरण व व्यापक आर्थिक साझेदारी 6. शहरीकरण 7. राजनैतिक साझेदारी व मतदान में वृद्धि 8. संचार साधनों में क्रांति।
आधुनिकीकरण की तीन विशेषताएं होती हंै-
1. नगरीकरण 2. साक्षरता 3. मध्य सहभागिता
नगरीकरण होने से औद्योगीकरण, पश्चिमीकरण, राजनीतिकरण, लौकिकीकरण और जनतंत्रीयकरण की प्रक्रियायें तेका हो जाती हैं। परिवार, जाति, धर्म, शिक्षा आदि के प्रभाव से धारणायें व जीवन-पद्धति को आत्मसात करने लगते हैं। साथ ही अपनी नवीन इच्छाओं की पूर्ति के लिए साधनों का विकास करते हैं।
मध्य सहभागिता उस स्थिति को कहते हैं, कि जब शहरों की ओर पलायन कर रहे लोगों को नये अनुभव होते हैं तो उनमें आत्मसंतोष भी होता है और नये-नये कौशल भी वे प्राप्त करते हैं। ऐसे में सहभागिता भी उनके बीच प्रगट होती है। इससे आधुनिकीकरण में सम्मिलित आर्थिक-राजनैतिक और धार्मिक परिवर्तन संभव होते हैं। विचाराधीन अध्ययन में कई विरोधाभासी प्रवृत्ति उत्तरदाताओं में मिली-जैसे यदि कोई दुर्घटना किसी के साथ हो जाती है, तो उसे उसी व्यक्ति की गलती के कारण माना जाना चाहिये, न कि दैवयोग से। बीमार होने पर रोगी को डॉटकर के पास ले जाना चाहिये, न कि झाड़-फंूक वाले के पास। यदि लडक़ी किसी ऊंची जाति के लडक़े से अपनी मर्जी से शादी करती है, तो उसमें आपत्ति नहीं है, किन्तु लडक़ा यदि अपने से नीची जाति की लडक़ी से शादी करता है, तो वह स्वीकार्य नहीं है।

ये उत्तरदाता 3 बच्चों वाले परिवार को आदर्श मानती हैं फिर भी ज्यादातर के परिवार में 5 बच्चे हैं और वे परिवार नियोजन की पक्षधर भी हैं किन्तु कईयों के 7-7 बच्चे भी हैं। वे अखबार नियम से पढ़ती हैं। परन्तु उक्त भी अधिक धार्मिक पत्रिकाएं नियम से पढ़ती हंै और कई फिल्मी पत्रिकाएं भी पढ़ती हैं। वे अपने बच्चों को बी.ए. तक तो अवश्य पढ़ाना चाहती हैं ताकि बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठ सकें, परन्तु एम.ए. तक पढ़ाने की इच्छा कम की है। कोई भी दूसरे धर्म के लोगों को पड़ोसी बनाना नहीं चाहती। कई अपने दाम्पत्य जीवन से संतुष्ट नहीं हैं किन्तु फिर भी किसी अस्वच्छता को बिल्कुल नहीं चाहतीं। वे ब्यूटी पार्लर जाने की इच्छुक हंै, (भले ही जेब उनकी यह गवारा नहीं करतीं)। उनमें से आधी महिलाओं के घर आधे पक्के आधे कच्चे (मिट्टी के) बने हैं। ये सभी धर्म-कर्म जरूर करती हंै, सामाजिक, धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन अवश्य करती हैं। वे अपने धर्म को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानती हैं। जबकि कईयों ने वैज्ञानिक समाचारों में अपनी तीक्ष्ण उत्सुकता जताई पर अधिकतर उनमें से यह कहती हैं कि विज्ञान संसार को कभी समझ नहीं पायेगा। कर्मकांड में कभी ढील नहीं करतीं। अपनी लडक़ी को नौकरी करने के लिए अकेले दूसरे शहर जाने देने में हिचकती हैं, परन्तु मजबूरी हो तो जरूर जाने की सिफारिश करती हैं। यदि उनके पुरुष सहकर्मी हैं तो उनके साथ कार्य करने के विचार से बिल्कुल भयभीत नहीं होतीं (39 प्रतिशत) किन्तु 6 प्रतिशत यह मानती हैं कि थोड़ा डर तो रहता है। उनका दृढ़ विचार है कि धर्म को माने बिना कोई व्यक्ति अच्छा हो ही नहीं सकता।
राजनैतिक समाचारों में 28 प्रतिशत रुचि लेती हैं जबकि 4 प्रतिशत अपराध समाचार पढ़ती हैं, 22 प्रतिशत में खेल-कूद समाचार व 23 प्रतिशत ने वैज्ञानिक समाचारों को रुचिकर माना। अधिकांश ने कहा कि सामाचार पत्रों के माध्यम से अंधविश्वास व परम्परावादी मान्यताओं का अन्त हो सकता है, पर शेष ने इसे सत्य नहीं माना।
किसी अन्यापूर्ण कानून के लागू करने का प्रतिकार वे कैसे करेंगी, वे नहीं जानतीं। अर्थात् वे विरोधियों का मनोबल तो बढ़ायेंगी, परन्तु खुद विरोध-अभियान का नेतृत्व नहीं करेंगी। विवाह संबंध निश्चित करने में वे पद-प्रतिष्ठा व परिवार की पृष्ठभूमि की अपेक्षा वर के निजी गुणों को अधिक महत्व देती है। प्रेम विवाह की अपेक्षा शत-प्रतिशत परंपरागत रूप से निश्चित किये गये विवाह को पसन्द करती हंंै, यद्यपि वे यह भी कहती हैं कि व्यक्ति के पूर्ण वयस्क होने पर ही उसकी पसन्द से विवाह होना चाहये। आखिरी तीन शर्तों का आपस में समायोजन कैसे होगा, यह उन्हें मालूम नहीं है।
इस प्रकार काफी दुविधा में जी रहे हैं, ‘आधुनिक’ बनने के प्रयास में आज लोग अपनी परम्परा को भी नहीं छोड़ पाते, बल्कि ‘कावडिय़ों’ आदि को देखा जाए, तो यह उन्माद अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया है। किन्तु पूर्ण तार्किक जीवन अपनाने लायक अभी उनमें आत्म-विश्वास नहीं आ पाया।

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