भारत के संविधान को जूते के पास रखा गवर्नर के एडीसी ने

भारत के संविधान को जूते के पास रखा गवर्नर के एडीसी ने

जिस संविधान को महामहिम को भेंंट किया गया उसे रख दिया गया कर्मचारियों के जूते के पास

B1इसी संविधान की कसम खाकर राम नाईक बने हैं उत्तर प्रदेश के राज्यपाल

संजय शर्मा
लखनऊ। भारतीय संविधान किसी भी धार्मिक ग्रंथ से कम आस्था नहीं रखता है। इसी संविधान की कसम खाकर देश के कर्णधार अपना काम शुरू करते हैं। राज्यपाल बनने से पहले महामहिम ने भी इसी संविधान के पालन की शपथ खाई थी। अधिवक्ताओं के एक सम्मेलन में महामहिम राज्यपाल ने अधिवक्ताओं को संविधान की एक प्रति दिखाई। जिसके बाद महामहिम ने संविधान की यह प्रति अपने एडीसी को दे दी। एडीसी ने संविधान की इस प्रति को अपने जूतों के पास रख दिया। जबकि होना यह चाहिए था कि भारतीय संविधान की इस प्रति को उन्हें किसी सम्मानित जगह पर रखना चाहिए था।
कार्यक्रम में सभी लोग इस बात की चर्चा करते देखे गए कि संविधान की जो प्रति महामहिम ने लाकर अधिवक्ताओं को दिखाई और बताया कि संसद भवन में भारत के संविधान की अंग्रेजी की प्रति 1955 में आम जनता के अवलोकनार्थ रखी गई थी और उनके अनुरोध पर 1999 से संविधान की हिन्दी प्रति भी आम जनता के लिए रखी गई है। इस संविधान पुस्तक में बने चित्रों में 22 प्रकार के चित्र हैं जिसमें श्रीराम की लंका पर विजय, बुद्ध के जीवन की झांकी, सम्राट अशोक द्वारा विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रसार को चित्रित करता एक दृश्य, अकबर का चित्र और मुगल वास्तुकला, टीपू सुल्तान, लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस एवं हिमालय का दृश्य शामिल है।
महामहिम संविधान की यह हिन्दी प्रति अधिवक्ताओं को देकर जहां उन्हें संविधान के प्रति और जागरूक कर रहे थे साथ ही उन्हें हिन्दी के प्रति और जागरूक करने की कोशिश भी कर रहे थे। संसद में संविधान की हिन्दी प्रति सिर्फ राम नाईक जी के प्रयास से ही रखी गई थी। यह एक बड़ी बात थी।
कार्यक्रम में उपस्थिति सभी लोगों को इस बात का एहसास था कि संविधान की यह हिन्दी प्रति कितनी महत्वपूर्ण है, आम अधिवक्ताओं के लिए और खास तौर से खुद महामहिम के लिए। मगर जिस संविधान की हिन्दी प्रति को खुद महामहिम इतना महत्व दे रहे हैं उनके एडीसी को इस बात का ख्याल भी नहीं कि इस संविधान की पुस्तक को किसी सम्मानित जगह रखते। अगर जगह कम थी तो उसको अपनी गोद में भी रखा जा सकता था। महामहिम के एडीसी का पद बेहद जिम्मेदारी भरा होता है। वह महामहिम के हर कार्यक्रम में और उनकी जिंदगी के रोजमर्रा के काम में इस बात की व्यवस्था करता है कि महामहिम को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। एडीसी का यह दायित्व है कि वह महामहिम की मर्यादा का हर प्रकार से ध्यान रखें। मगर जिस तरह से उन्होंने देश के सबसे बड़े ग्रंथ को अपने जूते के पास रख दिया, उसने साफ कर दिया कि नौकरशाहों के मन में संविधान के प्रति कितनी आस्था है। दरअसल इस देश के नौकरशाहों ने भारत के संविधान के मूल मंत्र को ही खत्म कर दिया है। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं कि भारतीय संविधान से बड़ा ग्रंथ इस देश में कोई नहीं। उन्हें इस बात का भी एहसास नहीं रहा कि जो महामहिम एमबी क्लब में भारतीय परिधान को लेकर इतने संवेदनशील हैं, तो उनकी भारतीय संविधान के प्रति कितनी गहरी आस्था होगी। अब देखना यह है कि महामहिम संविधान की इस बेइज्जती पर क्या निर्णय लेंगे।

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