भारत का पड़ोसी बांग्लादेश से परमाणु करार

डॉ. रहीस सिंह

भारत सरकार की पहले की पड़ोसी नीति भले ही अभी बेहतर परिणाम न दे पा रही हो, लेकिन भारत अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को और अधिक ऊंचाई देने का लगातार प्रयास कर रहा है। इसे बांग्लादेश के साथ परमाणु समझौते के रूप में देखा जा सकता है।
भारत-बांग्लादेश परमाणु समझौता न सिर्फ अपने पड़ोसी देश के साथ भारत के संबंधों को मजबूती देगा, बल्कि यह 21वीं सदी में ऊर्जा और सुरक्षा के क्षेत्र के लिए भी अहम साबित होगा। इसका कारण यह है कि भारत और बांग्लादेश के राजनीतिक हित आपस में जुड़े हुए हैं। दोनों सुरक्षा के मुद्दे पर संवेदनशील होने के साथ-साथ आर्थिक सहयोगी भी हैं।
भारत-बांग्लादेश परमाणु समझौता भारतीय विदेश मंत्रालय और बांग्लादेश के विज्ञान एवं तकनीक विभाग के बीच संपन्न हुआ है। राजनयिक सूत्रों के मुताबिक यह दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा भर है। इसे कई परिप्रेक्ष्यों में देखा जाना चाहिए। प्रथम- भारत बंगाल की खाड़ी में चीन व पाकिस्तान की शक्ति को काउंटर करने में बांग्लादेश के सहयोग का लाभ उठा सकता है। हालांकि यह भारत की भावी कूटनीतिक क्षमता पर निर्भर करेगा, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश को करीब लाने के लिए आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक निकटता और भावी तरक्की के साथ इमोशनल थेरेपी भी देने की जो शुरू से कोशिश की है, उसका लाभ मिल सकता है।
उन्होंने कुछ उदारहणों के जरिए बांग्लादेश के उस मनोवैज्ञानिक धरातल को बदलने की कोशिश की जो उसे भारत के प्रति शंकालु बनाती है। इसके साथ ही उन्होंने ब्लू इकोनॉमी पर साथ मिलकर काम करने की इच्छा जताई। इस तरह से देखा जाए तो भारत ने अपने दायित्वों को निभाने की एक ईमानदार कोशिश की जिसके लाभांश आने वाले समय में भारत को मिलने चाहिए। दरअसल बांग्लादेश ही नहीं बल्कि नेपाल, भूटान, र्शीलंका आदि भारत की सामरिक नीति में एक क्रोड के रूप में माने जा सकते हैं, इसलिए भारत यदि इन देशों के साथ निर्णायक साझेदारी स्थापित करने में सफल हो गया तो फिर परिधि के राष्ट्रों के साथ कूटनीतिक सौदेबाजी में संतुलन भारत के ही पक्ष में रहेगा।
द्वितीय- बांग्लादेश सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के बहुत ही करीब है, आर्थिक दृष्टि से वह भारत पर निर्भर है, लेकिन सामरिक व कूटनीतिक दृष्टि से भारत को उसकी जरूरत है। तृतीय-बांग्लादेश के अंदर बहुत से ऐसे ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं जो उल्फा, मुस्लिम युनाइटेड लिबरेशन टाइगर्स ऑफ असम, एनसीएन, पीएलए, केवाईकेएल के लिए सुरक्षित पनाहगाह का कार्य करते हैं। अभी भी हरकत-उल-जिहाद, अल-इस्लामी, इस्लामी लिबरेशन टाइगर ऑफ बांग्लादेश, जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी छात्र शिबिर, अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गेनाइजेशन आदि कट्टरपंथी संगठनों की पूर्वोत्तर राज्यों चल रही अलगाववादी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हें नियंत्रित करने के लिए बांग्लादेश से साझेदारी जरूरी है।
भारत-बांग्लादेश परमाणु समझौते की बदौलत बांग्लादेश को रूस से अपने पहले परमाणु ऊर्जा प्लांट को स्थापित करने में भी बड़ी मदद मिलेगी। ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने पलटाना से बांग्लादेश के लिए 100 मेगावाट के पावर ट्रांसमिशन लाइन का उद्घाटन किया था और अब भारत इसकी क्षमता बढ़ाकर 500 मेगावाट करने वाला है। हाल ही में ढाका का दौरा कर चुके पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बांग्लादेश को पश्चिम बंगाल से डीजल भेजने का वादा भी किया है। इसका संभवत: प्रतिफल यह मिलेगा कि भारत को अपने पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेश के जरिये एलपीजी और एलएनजी का ट्रांसपोर्ट करने के लिए रास्ता मिल जाए। यही नहीं भारत पूर्वोत्तर राज्यों में पावर हाउस बनाना चाहता है जिसके लिए ट्रांसमिशन लाइन बांग्लादेश से होकर गुजरेगी।
भारत ने यह पक्ष बांग्लादेश के समक्ष रखा है जिसके बदले में वह बांग्लादेश को पावर सेक्टर में हिस्सेदार बनाने के लिए तैयार है। उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश में पावर प्लांट स्थापित करने के लिए चार भारतीय कंपनियों- भेल, रिलायंस, शपूर जी पलोन जी और अडानी, ने बिड में हिस्सा लिया है। भारत सरकार का अगला कदम बांग्लादेश के रास्ते रेल सेवा को विस्तार देने संबंधी है। अखौरा-अगरतला, खुलना दर्शाना और पार्वतीपुर-कवनिया रेलवे लाइन पर ट्रेन चलाने की योजना सरकार की प्राथमिकता सूची में है। 1965 में भारत-पाक युद्घ के बाद पाकिस्तान ने इन सेवाओं बंद कर दिया था। अभी भारत और बांग्लादेश को समुद्री मामलों को सुलझाना शेष है, लेकिन अनुमान किया जा रहा है कि दोनों देशों के बीच लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट के साथ कार्यान्वयन के बाद समुद्री मामलों के सुलझने की उम्मीद बढ़ गई है।
लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ढाका यात्रा के दौरान संपन्न हुआ था जिसके तहत भारत के 111 गांव बांग्लादेश को और बांग्लादेश के 51 गांव भारत को प्राप्त हुए। ढाका-गुवाहाटी-अगरतला के बीच बस सेवा चलाने, अंतरराष्ट्रीय तटीय जल मार्ग और मालवहन तथा रेलवे लिंक के विस्तार करने संबंधी करार भी हुआ था। उसी समय भारत ने बांग्लादेश को आधारभूत ढांचे जैसे रेल, बस, बंदरगाह के नवीकरण के लिए दो अरब डॉलर देने का निर्णय भी किया था और दोनों देशों ने समुद्री सुरक्षा में आपसी सहयोग के साथ-साथ ह्यूूमन ट्रैफिकिंग तथा जाली भारतीय नोटों की तस्करी रोकने के लिए प्रतिबद्घता जाहिर की थी। गौर से देखा जाए तो बांग्लादेश के सहयोग से भारत पूरब की ओर से आने वाले खतरों को न केवल रोक सकता है, बल्कि आवाजाही के लिए बांग्लादेशी जमीन का इस्तेमाल कर अपने उत्तर-पूर्वी इलाकों में विकास का काम में भी तेजी ला सकता है। बांग्लादेश के चटगांव पोर्ट के जरिए नार्थ-ईस्ट के राज्यों को आयात-निर्यात की सुविधा मिल सकती है। इस क्षेत्र के विकास के जरिए इंफाल-तामू-यंगून-सिंगापुर पैसेज का विकास भी संभव हो सकता है।

Pin It