भारतीय अर्थव्यवस्था का उज्ज्वल भविष्य

डॉ. हनुमन्त यादव
विश्व बैंक के चीफ इकानॉमिस्ट व सीनियर वाइस प्रेसीडेंट कौशिक बसु के अनुसार, वैश्विक अभिवृद्धि दर 2.5 प्रतिशत दर बने रहने के अनुमानों के बीच भारत की सालाना जीडीपी वृद्धि दर 7.5 फीसदी से अधिक बने रहने की संभावना है। दुनिया के कुछ देश पहले से ही मंदी की चपेट में हैं तो मंदी से उबरे कुछ देशों में पुन: मंदी के लक्षण दिखाई देना प्रारम्भ हो रहे हैं। अधिकतर देशों की अर्थव्यवस्था में शिथिलता के कारण निर्मित निराशाजनक वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की चमक महत्वपूर्ण है। डॉ. कौशिक बसु ने भारत के संबंध में उत्साहवद्र्धक यह बात गत 27 दिसम्बर को हैदराबाद में आयोजित भारतीय अर्थशास्त्रियों के तीन दिवसीय 98वें सालाना सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कही। उक्त सम्मेलन के उद्घाटन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी थे। जब प्रणव मुखर्जी भारत के वित्तमंत्री थे उस समय डॉ. कौशिक बसु वित्त मंत्रालय के मुख्य सलाहकार थे। डॉ.बसु इंडियन इकानॉमिक एसोसिएशन इंटरनेशनल के अध्यक्ष बनने के एक साल पूर्व इंटरनेशनल इकानॉमिक एसोसिएशन के अध्यक्ष बन चुके थे।
डॉ. बसु ने कहा कि इस समय वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष अनेक बड़ी चुनौतियां हैं। यूरोप के अनेक देश अभी भी 2008 के वैश्विक मन्दी से उबर नहीं पाए हैं तो दूसरी ओर दुनिया के अनेक देशों में नई मन्दी के आसार नकार आ रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष भी अनेक बड़ी चुनौतियां हैं। चीन के समान ही भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक मन्दी से कम प्रभावित रही है। भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती 7.5 प्रतिशत की वर्तमान जीडीपी दर को कायम रखने की है। वर्तमान परिस्थितियों में तीव्र अभिवृद्धि दर बनाए रखने के लिए विकासोन्मुखी आर्थिक नीतियों को प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वयन करना जरूरी है। यह भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
डॉ. बसु का कहना था कि अर्थव्यवस्था की गति भी विचित्र होती है । 2008 की वैश्विक मन्दी के मूल में अमेरिका के सब-प्राइम मार्टगेज बाजार से प्रारम्भ हुई तथा पूरी दुनिया को चपेट में ले लिया। इसका सबसे अधिक प्रभाव यूरोपीय संघ के देशों पर पड़ा। यूरोप के अनेक देशों के न केवल बैंक बल्कि यहां की सरकारें भी दिवालियापन के कगार पर पहुंच गई। अमेरिकी सरकार तथा अमेरिकी फेडरल बैंक के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर वैश्विक मन्दी कम प्रभाव पड़ा। वैश्विक मन्दी के समय अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशकों ने दूसरे देशों से डॉलर वापस लेने के कारण अमेरिका में डॉलर का प्रवाह बढ़ गया, क्योंकि निवेशकों का मानना था कि मन्दी के समय जमा व निवेश अमेरिका में ही सुरक्षित है। मन्दी के समय डॉलर की स्थिति मजबूत बनी रही।
डॉ. बसु के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के विश्व आर्थव्यवस्थाओं के विकास के इंजन बनने का सबसे बड़ा श्रेय वहां के केन्द्रीय बैंक की सार्वभौमिकता कायम रखने को जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति का अमेरिकी फेडरल बैंक की मौद्रिक नीति बनाने या ब्याज दरों के तय करने में तनिक भी हस्तक्षेप नहीं होता है। इसी प्रकार भारत में मौद्रिक नीति बनाने व ब्याज दर निर्धारण में वित्तमंत्री हस्तक्षेप नहीं कर पाता है, भारतीय रिजर्व बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था के सामयिक अध्ययन के आधार पर मौद्रिक नीति, आर्थिक समीक्षा तथा ब्याज दरें घोषित करता है तथा सभी बैंक भारतीय रिजर्व बैंक की सलाह पर काम करते हैं। डॉ. बसु का कहना था कि यूरोपीय संघ के देशों में मन्दी के गहरे प्रभाव का सबसे बड़ा कारण उनके स्वयं के केन्द्रीय बैंक का न होना रहा है। यह तो सर्वविदित है कि 1998 में यूरोपियन सेन्ट्रल बैंक की स्थापना के साथ ही सभी 28 देशों के केन्द्रीय बैंकों का यूरोपियन सेन्ट्रल बैंक संविलियन हो गया। इस प्रकार इन देशों में स्वयं का प्रभुत्व सम्पन्न बैंक न रहा जो कि देश की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर मौद्रिक नीति बनाता व देश के बैकों को दिशानिर्देश देता।
डॉ. बसु का भारतीय रिजर्व बैंक की सर्वप्रभुता के संबंध में कही गई बात बिल्कुल सही है। यदि पिछले पांच साल का ही उदाहरण लें तो स्पष्ट है कि पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम् तथा वर्तमान वित्तमंत्री अरुण भरसक प्रयास के बावजूद रिजर्व बैंक के ब्याज दरें कम करवाने में असफल रहे। रिजर्व बैंक ने सभी निर्णय अर्थव्यवस्था तथा मौद्रिक नीति की समीक्षा के बाद स्वयं लिए। जबकि चीन में वहां का केन्द्रीय भी प्रभुता-सम्पन्न होने के बावजूद वहां की केन्द्रीय सरकार की सलाह पर काम करते देखा गया है। आगे आनेवाले दशकों में भी भारत में रिजर्व बैंक की संप्रभुता कायम रहने वाला है। इस प्रकार भले ही भारत में राजकोषीय नीति को पूर्व की भांति राजनीति प्रभावित करती रहे किन्तु रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति बनाने एवं उसके क्रियान्वयन का कार्य स्वतंत्रता के साथ करता रहेगा।
डॉ. कौशिक बसु के ये विचार विश्व बैंक के जून 2015 में प्रकाशित वैश्विक आर्थिक संभावना रिपोर्ट पर आधारित है। चूंकि विकासशील देशों में चीन व भारत की अर्थव्यवस्थाएं बहुत बड़ी हैं इसलिए अनेक पश्चिमी अर्थशास्त्री इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने को प्रेरित होते रहे हैं तथा अध्ययन करके भविष्यवाणियां करते रहे हैं। डॉ. कौशिक का यह उद्गार कि 2024 तक भारत की जीडीपी अभिवृद्धि दर चीन से आगे बढ़ जाएगी निश्चय ही सत्तारूढ़ दल भाजपा का मनोबल बढ़ाने वाला तो है ही भारतीय अर्थव्यवस्था की चिन्ता करने वाले हर भारतीय को सुकून पहुंचानेवाला तथा उत्साहवद्र्धन करने वाला है।

Pin It