भाजपा को दोहरी मार

भारतीय जनता पार्टी ने 2010 में 300 मुस्लिम कैंडीडेट्ïस मैदान में उतारे थे जिसमें 250 उम्मीदवारों को सफलता मिली थी। इस बार पार्टी ने इसी उम्मीद में 200 उम्मीदवारों को ज्यादा टिकट दे दिया लेकिन चुनावी परिणाम सिफर रहा। चुनावी परिणाम ने भाजपा खेमे की बेचैनी बढ़ा दी है।

sanjay sharma editor5यह कहें कि भाजपा बुरे दौर से गुजर रही है तो गलत नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों की पराजय, बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की हुई फजीहत पर चर्चा थमी ही थी कि गुजरात में हुए दो चरणों में हुए स्थानीय निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव परिणामों में मुस्लिम उम्मीदवारों की हार ने भारतीय जनता पार्टी के दिग्गजों के माथे पर बल ला दिया है।
स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों के परिणामों में भाजपा को भले ही राहत की सांस दी हो, लेकिन कांग्रेस की ग्रामीण अंचल में जीत की खबर ने गुजरात में पार्टी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। भाजपा को इस चुनाव में बहुत उम्मीद थी। इस चुनाव में भाजपा ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए भारी संख्या में मुस्लिम कैंडीडेट मैदान में उतारे थे। भाजपा का मुस्लिम कैंडीडेट्ïस के सहारे मुस्लिम वोट बैंक का भरोसा जीतने का प्रयास और प्रयोग असफल रहा है। इस तरह देखें तो भाजपा को दोहरी मार पड़ी है। भाजपा के 500 मुस्लिम उम्मीदवारों में से 490 स्थानीय निकाय चुनाव हार गए। दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने 2010 में 300 मुस्लिम कैंडीडेट्ïस मैदान में उतारे थे जिसमें 250 उम्मीदवारों को सफलता मिली थी। इस बार पार्टी ने इसी उम्मीद में 200 उम्मीदवारों को ज्यादा टिकट दे दिया लेकिन चुनावी परिणाम सिफर रहा। चुनावी परिणाम ने भाजपा खेमे की बेचैनी बढ़ा दी है।
यह कहें कि 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवार उतारने के भाजपा के प्रयोग को झटका लगा है तो गलत नहीं है। भाजपा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। कुल मिलाकर परिणाम यही बताते हैं कि गुजरात में एक ओर भाजपा से पटेल नाराज हुए हैं और पटेलों के बाद अल्पसंख्यकों का भरोसा भी डगमगाया है। गुजरात में अल्पसंख्यकों का भरोसा डगमगाने की एक बड़ी वजह हाल की घटनाओं जैसे दादरी कांड, बिहार चुनाव के दौरान भाजपा नेताओं के बीफ को लेकर दिए गए बयानों और गुजरात में ही कुछ जिलों में सांप्रदायिक घटनाओं और असहिष्णुता जैसे मुद्दों को भी माना जा सकता है। जिस मोदी लहर के भरोसे भाजपा चुनाव जीतने का सपना पाले हुए थी, उसमें कामयाबी नहीं मिल रही है। गुजरात से मोदी के जाने से भाजपा के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं। हालांकि देखा जाए तो विधानसभा चुनावों में टिकट के वितरण का पार्टी का एक अलग ही गणित है। सीएम आनंदीबेन पटेल से पटेल नाराज हैं और अनामत आंदोलन के रूप में ये नाराजगी जगजाहिर हो चुकी है जबकि दूसरी ओर कांग्रेस गांवों में मिली जीत से आत्मविश्वास से भरी हुई दिखाई दे रही है। यानी एक तरह से यह चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए राहत वाली खबर है और वह इन परिणामों के आधार पर 2017 के चुनावों में सांप्रदायिकता के मुद्दों और पटेलों की बीजेपी से नाराजगी को भुनाने का काम करेगी। यकीनन इसे भाजपा पर पडऩे वाली दोहरी मार कहा जा सकता है।

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