ब्रिटेन दौरे से मोदी ने क्या हासिल किया?

तीन दिनों की ब्रितानी यात्रा के दौरान भी सब कुछ मोदी के मन के मुताबिक नहीं था। डेविड कैमरन के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनसे ब्रिटिश मीडिया ने चुभते हुए सवाल किए। यहाँ तक कि गुजरात दंगों का भी हवाला दिया जो मोदी को बिलकुल पसंद नहीं। इसके बाद जब वो गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ा रहे थे तो नेपाली, कश्मीरी और पंजाबी समुदाय के लोग उनके खिलाफ नारे लगा रहे थे। भारत में उनके आलोचक भी उन्हें इज्जत के दायरे में बुरा भला कहते हैं लेकिन यहाँ तो ‘मोदी हत्यारा’ और ‘मोदी आतंकवादी’ जैसे नारे लग रहे थे। ज्यादातर भारतीय मीडिया उनके दूसरे विदेशी दौरों की तरह केवल उनकी धूम-धाम और प्रवासी भारतीयों में उनके बढ़ते हुए कद की बातों पर फोकस कर रही थी लेकिन ब्रिटिश मीडिया उन्हें बख्शने के मूड में नहीं थी।

जुबैर अहमद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन की तीन दिनों की यात्रा समाप्त हुई। यहाँ उनका एक सुपर स्टार जैसा स्वागत किया गया। ब्रितानी संसद में भाषण देने वाले वो पहले भारतीय प्रधान मंत्री बने। ब्रिटेन की रानी के बकिंघम पैलेस में खाना खाने वाले पहले भारतीय प्रधान मंत्री का सेहरा भी उन्हीं के सर गया। ब्रितानी प्रधान मंत्री डेविड कैमरन की आव भगत ने उनका कद ऊंचा किया। सही मायने में इतना बढिय़ा स्वागत और इतनी जबरदस्त गर्मजोशी से कोई भी सपनों की दुनिया में खो सकता है। लेकिन सपनों की दुनिया के बाहर असल ंिजंदगी घर वापसी पर उनका इंतजार कर रही होती है। शायद मोदी सोच रहे होंगे कि ये दौरा तुरंत क्यों खत्म हो गया, क्योंकि बिहार विधान सभा चुनाव का सुपर स्टार बनने की उनकी कोशिश बुरी तरह नाकाम रही। इसकी जवाबदेही उन्हीं की होगी क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने उन्हीं के नाम पर चुनाव लड़ा था।
दूसरी तरफ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बगावत की आवाज उनके कानों में अब भी गूँज रही होगी। दिल्ली वापस आने पर ये आवाज तेज होने वाली होगी। वेम्बले स्टेडियम की धूमधाम और चमक-दमक का असर घर जाते ही ख़त्म हो जाएगा। उनके आलोचक एक बार फिर उनसे ये सवाल पूछेंगे कि विदेश की यात्राएं कम करके देश की बढ़ती समस्याओं पर ध्यान क्यों नहीं देते। लोग उनसे कहेंगे कि असहिष्णुता के बढ़ते माहौल के विरुद्ध वेम्बले और मैडिसन स्क्वेयर गार्डन जैसे तेज आवाज वाले बयान क्यों नहीं देते?
लेकिन तीन दिनों की ब्रितानी यात्रा के दौरान भी सब कुछ मोदी के मन के मुताबिक़ नहीं था। डेविड कैमरन के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनसे ब्रिटिश मीडिया ने चुभते हुए सवाल किए।
यहाँ तक कि गुजरात दंगों का भी हवाला दिया जो मोदी को बिलकुल पसंद नहीं। इसके बाद जब वो गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ा रहे थे तो नेपाली, कश्मीरी और पंजाबी समुदाय के लोग उनके खिलाफ नारे लगा रहे थे। भारत में उनके आलोचक भी उन्हें इज्जत के दायरे में बुरा भला कहते हैं लेकिन यहाँ तो ‘मोदी हत्यारा’ और ‘मोदी आतंकवादी’ जैसे नारे लग रहे थे। ज़्यादातर भारतीय मीडिया उनके दूसरे विदेशी दौरों की तरह केवल उनकी धूम धाम और प्रवासी भारतीयों में उनके बढ़ते हुए कद की बातों पर फोकस कर रही थी लेकिन ब्रिटिश मीडिया उन्हें बख़्शने के मूड में नहीं थी।
‘गार्डियन’ अखबार ने अपने एक ताजा संपादकीय में कहा है कि मोदी का दौरा ओवर द टॉप या जरूरत से अधिक चर्चित था। ‘इंडिपेंडेंट’अखबार ने लिखा कि गुजरात दंगों का जिम्मेदार कोई भी हो, ये मारकाट हुई तो उन्हीं के राज में (वो उस समय एक साल पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे)। कई अखबारों ने डेविड कैमरन को इस बात के लिए आड़े हाथों लिया कि वो प्रधानमंत्री मोदी की खुशामद पर क्यों उतर आए थे। बुद्धिजीवियों और मानव अधिकार की संस्थाओं ने कहा कि डेविड कैमरन को चाहिए कि नरेंद्र मोदी से वो पूछें कि उनके देश में असहिष्णुता की बढ़ती घटनाएं क्यों हो रही हैं? लेकिन इन में से कोई सडक़ों पर मोदी विरोधी प्रदर्शनों में शामिल नहीं हुआ। जहाँ भारतीय मूल के आम लोग और भारतीय मूल के ब्रितानी सांसद मोदी के आने पर जोश में दिखाई दे रहे थे वहीं ब्रिटेन की स्थानीय जनता पर उनके दौरे का कोई खास फर्क नहीं पड़ा। उनके लिए इसमें केवल जिज्ञासा से अधिक कुछ और नहीं था, लेकिन दोनों नेताओं के बीच गंभीर बातें भी हुईं। असैनिक परमाणु समझौते जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए गए. ब्रिटेन ने भारत में तीन स्मार्ट शहरों के निर्माण का सौदा भी किया और दोनों देशों के बीच 9 अरब पाउंड के व्यापर पर रज़ामंदी भी हुई। दोनों देशों के रिशतों में एक नई जान फूंकने की जरूरत थी। इस दौरे से इस रिश्ते में एक नई जान आ सकती है लेकिन यहाँ आलोचक कहते हैं ये उपलब्धियां शोर शराबे के बगैर भी हासिल की जा सकती थीं।

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