ब्रिटिश चुनाव में कौन बनेगा महाबली

कृष्ण भाटिया
ब्रिटेन की नई सरकार चुनने के लिए वीरवार 7 मई को वोट पड़ेंगे। लेकिन परिणाम क्या होगा यह अभी ही से सबको मालूम है। कोई चमत्कार हो जाए तो अलग बात है, लेकिन सभी अनुमान, सभी ओपिनियन पोल यही कह रहे हैं कि किसी पार्टी को इतना बहुमत प्राप्त नहीं होगा कि वह अकेले अपने ही बलबूते पर सरकार बना सके। जिस भी पार्टी की सरकार बनेगी, वह लंगड़ी होगी। चलने के लिए उसे किसी दूसरी पार्टी की बैसाखी, उसकी सहायता की जरूरत होगी। अभी से चर्चे हैं कि स्वयं सुदृढ़ न होने की वजह से नई सरकार अधिक देर तक नहीं चल सकेगी और संभवत: इस वर्ष के अंत से पहले ही मध्यवर्ती चुनाव होंगे।
यह चुनाव बड़ा विचित्र है। इतना फीका चुनाव पहले कभी नहीं देखा गया। न कोई दमखम, न जोर, न जोश-ओ-खरोश। कहां वह भारत के चुनाव। जिधर देखो गहमा-गहमी, चहल-पहल, धूम-धड़ाके, फुलझडिय़ां और पटाखे, जलसे और जुलूस, लहराते झंडे और गूंजते लाऊडस्पीकर, प्रचार के लिए टोलियों की टोलियां गली-बाजारों में घूम रही हैं, घर-घर जाकर वोटरों की मिन्नत-समाजत की जा रही है। इश्तिहारों और पम्फलेटों की भरमार है। लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ, कुछ भी नहीं। सिर्फ टी.वी. पर पार्टी लीडरों की बहस, अखबारों में बयानबाजी, उम्मीदवारों के फोटो के साथ लैटर बक्सों के अंदर लीफ्लैट्स फैंके गए हैं। यहां बड़ी जोरदार कन्वैसिंग का रिवाज नहीं। गली बाजारों के नुक्कड़-चौराहों पर खड़े होकर उम्मीदवार और पार्टी कार्यकत्र्ता इश्तिहार बांट कर आने-जाने वालों से वोट की अपील करते हैं।
चुनाव प्रचार में बहुत अधिक गर्मा-गर्मी की कमी के बावजूद ब्रिटेन का यह चुनाव बड़ा महत्वपूर्ण और पेचदार है क्योंकि इसके जो भी परिणाम होंगे उनके साथ कई ऐसे प्रश्र जुड़े हुए हैं, जिनका भावी राजनीति के साथ देश के भविष्य पर भी गहरा असर पड़ेगा। जो नतीजे निकलने वाले हैं, उनके बारे में कोई बहुत ज्यादा भ्रांति नहीं, लेकिन जो नतीजा निकलने वाला है, वह चिन्ता का विषय है। चूंकि किसी पार्टी को बहुमत मिलने की संभावना नहीं, सरकार बनाने के लिए पेचीदगियां पैदा होने की आशंका है। जिस भी पार्टी ने सरकार बनानी है, उसे कुल 650 में से 326 सीटों का बहुमत चाहिए। लेकिन दोनों बड़ी पाॢटयों में से किसी को 270-275 से ज्यादा सीटें मिलती नजर नहीं आ रहीं। 2020 के चुनाव में टोरी पार्टी को 307, लेबर पार्टी को 270 और लिबरल डैमोक्रेटिक पार्टी को 57 सीटें मिली थीं। टोरी और लिबरल डैमोक्रेट्स ने आपस में मिलकर सांझी सरकार बना ली, लेकिन इस बार दोनों की स्थिति कमजोर है। ओपिनियन पोलों में टोरी और लेबर 35-34 प्रतिशत के अनुपात से एक-दूसरे के लगभग आगे-पीछे ही चलते रहे हैं।
लिबरल डैमोक्रेटिक पार्टी की हालत पतली है और इमीग्रेशन के मुद्दे को भडक़ीला रूप देकर उठी नई पार्टी यूनाइटिड किंगडम इंडीपैंडैंट पार्टी को कुछ जोरदार सफलता मिलने की आशा नहीं। इस बार ताकत स्कॉटलैंड की क्षेत्रीय पार्टी-स्कॉटिश नैशनल पार्टी के हाथ में आती नजर आ रही है और इस संभावना से टोरी और लेबर दोनों ही अंदर ही अंदर से सहमी हुई हैं क्योंकि उन्हें पता है कि स्कॉटिश पार्टी के समर्थन के बिना उनमें से कोई भी सरकार नहीं बना सकेगी जिसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। स्काटलैंड की स्वतंत्रता की मांग के फिर से जोर पकड़ उठने की आशंका है। पिछले वर्ष हुए जनमत संग्रह में स्काटलैंड के लोगों ने इंगलैंड से अलग होने की मांग के विरुद्ध वोट दिया था लेकिन पृथकतावादियों ने स्वतंत्रता की मांग को छोड़ा नहीं। पिछली बार स्कॉटलैंड की 59 सीटों में से लेबर ने 41 पर जीत हासिल की थी लेकिन इस बार उम्मीद की जा रही है कि स्कॉटिश नैशनल पार्टी 56 सीटें ले जाएगी। बड़ी दिलचस्प स्थिति है कि ब्रिटेन का सारा चुनाव स्कॉटलैंड की एक ऐसी नारी के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जो स्वयं चुनाव नहीं लड़ रही। परिणाम निकलने के बाद राजनीति की चक्की किस तरफ घुमानी है वह शक्ति भी उसी नारी महोदया निकोला स्टर्जन के हाथ में होगी, जो स्कॉटिश नैशनल पार्टी की नेता है और स्वतंत्र स्कॉटलैंड की मांग की जोरदार समर्थक हैं। यह बात सर्वविदित है कि वह अपने पत्ते वक्त आने पर खेलेंगी। टोरी पार्टी के नेता प्रधानमंत्री डेविड कैमरन और लेबर नेता एड मिलिबैंड दोनों ही इस खेल को समझते हैं। सरकार बनाने के लिए चूंकि निकोला की मदद की जरूरत की संभावना के चलते दोनों में से किसी ने भी चुनाव अभियान के दौरान ऐसी कोई बात नहीं कही कि जिससे वह नाराज हो उठे। उसने भी दोनों नेताओं को खूब चक्कर में डाले रखा है। जो भी उसे हाथ डालेगा सांप के मुंह में छिपकली वाली बात होगी। स्कॉटलैंड की आजादी की मांग उठाई गई तो जो भी प्रधानमंत्री होगा, सरकार बचाए रखने के लिए उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। एक प्रमुख ब्रिटिश समाचार पत्र ने लिखा है कि निकोला स्टर्जन ब्रिटेन की सबसे खतरनाक औरत है। नई ब्रिटिश संसद में रंगदार सांसदों की संख्या बढ़ जाने की आशा है। पिछली संसद में 11 काले और एशियाई मूल के 16 सांसद थे। इस बार सभी पाॢटयों के रंगदार सांसदों की संख्या 40-45 तक पहुंच जाने की आशा है। 30-35 चुनाव क्षेत्र ऐसे हैं, जहां भारतीय मूल के मतदाता किसी भी पार्टी की हार-जीत के लिए बड़े निर्णायक सिद्ध होंगे। पार्टी नेताओं ने भारतीय वोटों के लिए मंदिरों, गुरुद्वारों में जा कर माथे टेके। प्रधानमंत्री डेविड कैमरन पत्नी सहित जब प्रसिद्ध स्वामी नारायण मंदिर गए तो भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनावी नारे का अनुकरण करते हुए ऊंची आवाज में हिन्दी में कहा कि फिर एक बार कैमरन सरकार।

 

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