बोस से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करें प्रधानमंत्री

कुलदीप नैयर
सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अच्छा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसी राह पर चलना चाहिए था और केंद्र के पास पड़े बोस से संबंधित दस्तावेज और कागज-पत्रों को लोगों के सामने लाना चाहिए था। इन 64 फाइलों, जिसमें 12,744 पन्ने हैं, को सार्वजनिक करते हुए मुख्यमंत्री ने मीडिया को बताया कि बोस की परिवार की जासूसी की गई थी। यह सिद्ध है… मैं इतना ही कहूंगी कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है। बनर्जी ने कहा। एक अखबार समूह की ओर से अप्रैल में किए गए पहले खुलासे से यह पता चला कि बोस परिवार पर 20 साल तक, 1948 से 1968 तक निगरानी की गई थी। स्पेशल ब्रांच की 50 पेजों की दो सार्वजनिक हुई फाइलों से यह जानकारी मिली थी। इन दस्तावेजों से पता चला कि किस तरह इंटेलिजेंस ब्रांच (खुफिया विभाग), इंटेलिजेंस ब्यूरो की राज्य शाखा का उस समय का नाम, के दर्जनों जासूस नेताजी के बड़े भाई शरत चंद्र और उनके बेटे अमियनाथ बोस और शिशिर कुमार बोस पर निगरानी रखे हुए थे।
आईबी के ये भेदिए उनके घर के निकट के पोस्ट आफिस से उनकी चि_ियां को बीच में रोक लिया करते थे और परिवार के सदस्यों का देश भर में पीछा करते थे, और आईबी के नई दिल्ली मुख्यालय के लिए रिपोर्ट तैयार करते थे। ढेर सारे दस्तावेजों से निकली इन शुरूआती जानकारियों ने उचित ही बोस परिवार को नाराज किया है। इस तरह की निगरानी असामाजिक तत्वों पर रखी जाती है, शरत बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानियों पर नहीं। नेताजी के भाई के पोते चंद्र कुमार बोस ने कहा। बोस परिवार अपनी मांग फिर से दोहरा रहा है कि जासूसी के मामले की केंद्र जांच करे।
शुक्रवार को सार्वजनिक हुए दस्तावेजों के इस खजाने से सरकार के उस आदेश का पता चलता है जिसमें पहली बार बोस परिवार के 38/2, एल्गिन रोड़ और वुडबर्न पार्क के घरों से भेजे जाने वाले पत्रों को बीच में रोकने का अधिकार दिया गया था। स्पेशल ब्रांच ने इस आदेश का उल्लेख पत्रों को बीच में रोकने की अवधि को साल भर बढ़ाने के लिए भेजे गए पत्र में किया है कि यह कार्रवाई ‘अच्छे परिणाम’ के साथ की गई। इससे जवाहर लाल नेहरू की छवि पर बुरा असर हुआ है। स्वाभाविक है कि कांग्रेस पार्टी चुप है। फिर भी पार्टी को बोस परिवार को निजी तौर पर यह आश्वासन देना चाहिए था कि जिम्मेदारी तय करने के लिए होने वाली जांच से उसे कोई आपत्ति नहीं है।
नेहरू और सुभाष बोस ब्रिटिश शासकों के खिलाफ चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन की दो प्रमुख नेता थे। दोनों राष्ट्रीय आंदोलन का मार्गदर्शन कर रहे महात्मा गांधी के सिपहसालार थे। दोनों के बीच यह मतभेद था कि नेहरू हथियारों के खिलाफ थे और वे आजादी पाने के लिए ब्रिटिश शासकों के खिलाफ अहिंसा के इस्तेमाल पर पूरा विश्वास करने लगे थे। गांधी जी जर्मनी के हिटलर और ब्रिटेन के विंस्टन चर्चिल में कोई अंतर नहीं मानते थे। नेहरू जी का इससे मतभेद था। लोकतंत्र की रक्षा के लिए धुरी राष्ट्रों से लड़ रहे मित्र राष्ट्रों के प्रति उन्हें सहानुभूति थी। कुछ कारणों से गांधी जी यह विश्वास करने लगे थे कि जर्मनी युद्ध में जीत जाएगा। इस विचार में बदलने में उन्होंने कई साल लगा दिए। लेकिन गांधी जी के विचार का राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी के सोच पर असर हुआ।
कांग्रेस की सबसे ऊंची समिति, कार्य समिति की बैठकों में नेहरू ने कई बार मित्र राष्ट्रों के प्रति अपनी सहानुभूति का इजहार किया। लेकिन उन्होंने गांधी जी के रास्ते को माना क्योंकि उन्हें भरोसा था कि गांधी जी ही ब्रिटिश शासन से देश को मुक्त कराएंगे। बोस इस बारे में स्पष्ट थे कि जरूरत पडऩे पर हिंसा का इस्तेमाल होना चाहिए। वह कोलकाता के कैद से भाग निकले और अफगानिस्तान होकर जर्मनी पहुंच गए तो उन्होंने सोचा कि एक तानाशाह से मदद लेने में कोई नुकसान नहीं है। (मैंने वह दो मंजिला मकान देखा है जहां बोस ने रात बिताई थी।) कोलकाता में दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से आजादी के आंदोलन का खोया पन्ना वापस ला दिया गया है। बोस जिन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों की मदद से इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) का गठन किया, पर लोगों का विशेष ध्यान गया है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों को आईएनए बनाने के लिए मार्गदर्शन किया। यह कल्पना कठिन है कि मुक्ति के बाद जापानी भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रहने देते। फासिस्टों का अपना एजेंडा था और लोकतांत्रिक विचारों के लिए उनके पास कोई जगह नहीं थी। लेकिन बोस के निश्चय के बारे में कोई संदेह नहीं है। वह जापानियों से भी लड़ाई लड़ते अगर जापानी भारत को गुलाम बनाने का प्रयास करते। नई दिल्ली जो ब्रिटिश शासन का केंद्र था, के पास अहम फाइलें हैं। मुझे इस बात पर संदेह है कि सार्वजनिक करने के बाद भी लोगों के सामने यह सवाल रहेगा कि क्या सभी कुछ बाहर कर दिया गया और क्या वे फाइलें जो नेहरू की छवि की खराब दिखाती थीं, को नष्ट कर दिया गया।

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