बैंकों पर टारगेट का दबाव

हाल के समय में दो खबरें बैंकिंग जगत से एक साथ आयीं। वेल्स फार्गो बैंक में ग्राहकों के खातों से छेडख़ानी करके छोटे-छोटे फ्रॉड और प्रधानमंत्री जनधन योजना (पीएमजेडीवाई) के अंतर्गत खुले करोड़ों खातों में बैंक अधिकारियों द्वारा स्वयं छोटी-छोटी राशियों का जमा किया जाना। दोनों घटनाएं एक जैसी हैं।
वेल्स फार्गो बैंक में व्यवसाय, कमाई और ग्राहकों की प्रतिबद्धता बढ़ाने के लिए एक अभियान चलाया गया। कर्मचारियों को बड़े लक्ष्यों से लाद दिया गया कि मौजूदा ग्राहक बैंक के जमा खाते, क्रेडिट कार्ड आदि के अन्य प्रोडक्ट अधिकाधिक खरीदें। लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कर्मचारियों ने बैंक ग्राहकों की प्रोफाइल सूचनाओं का दुरुपयोग करके ग्राहकों को बिना बताये उनके नाम में एक-दो नहीं, लाखों फर्जी खाते खोल डाले। और यह सब लगभग पिछले पांच सालों से चल रहा था। मजे की बात यह है कि जहां फ्रॉड करनेवाले लगभग पांच हजार से ज्यादा लोगों को नौकरी से बर्खास्त किया गया, वहीं ऐसे कर्मचारियों को भी बर्खास्त किया गया, जिन्होंने अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं किया। बैंक को माफी मांगनी पड़ी और 185 मिलियन डॉलर की जुर्माना राशि भी भरनी पड़ी। बैंक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जॉन स्टंफ और रिटेल बैंकिंग की प्रमुख कैरी टॉलस्टेड पर गाज गिरी है। बैंक ने टारगेट व्यवस्था को समाप्त कर दिया है। अभी सब-प्राइम संकट के जोरदार झटके से विश्व अर्थव्यवस्था उबर ही नहीं पायी है कि वेल्स फार्गो बैंक के मामले ने एक बार फिर साबित किया है कि बैंक कोई सबक नहीं सीख रहे हैं।
यहां अपने देश में हाल ही में एक सनसनीखेज खबर आयी कि प्रधानमंत्री जनधन योजना में खुले खातों में से जीरो बैलेंस खातों में जबरदस्त कमी आयी, जिसका कारण ‘ऊपर से दबाव’ के चलते शाखा प्रबंधकों द्वारा अपनी जेब से एक-एक रुपया खाते में जमा करना बताया गया। पिछले 28 सितंबर तक, लगभग दो सालों में बैंकों ने 24.74 करोड़ नये खाते खोले। इन खातों में 28 सितंबर की तारीख में 43,532 करोड़ रुपये जमा थे। प्रति खाता औसत लगभग 1,759 रुपये बनता है। यह औसत राशि किसी भी हालत में कम नहीं है। बैंकों ने खाता खोलने के साथ-साथ 9.71 करोड़ सुरक्षा बीमा तथा 3.06 करोड़ जीवन बीमा पॉलिसियां भी बेची हैं।
यह भी कोई छोटा काम नहीं है। वर्ष 2014 में 28 अगस्त से जब यह योजना लागू की गयी थी, उसके तुरंत बाद योजना लागू करने की अवधि घटा दी गयी, लेकिन लक्ष्य नहीं घटाया गया। बैंक शाखाओं के कर्मचारियों ने दिन-रात एक करके, छुट्ïटी न लेकर, अवकाश के दिनों को भूल कर खाता खोलने के लक्ष्य को पूरा किया, तो इसे गिनीज वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। कुछ लोगों ने बीमा योजनाओं और सरकार द्वारा मिलने वाली किसी सहायता को ठीक से न समझ पाने की वजह से डुप्लीकेट खाते खोल लिये होंगे, लेकिन फर्जी खाते खोलने के मामले सामने नहीं आये। यह बैंक कर्मियों की प्रतिबद्धता का एक जबरदस्त उदाहरण है।
बैंक कर्मियों पर पडऩे वाले दबाव को इनकार नहीं किया जा सकता। व्यवसाय बढ़ाना और लाभ कमाना किसी भी व्यावसायिक संस्था का लक्ष्य होता है। लेकिन सब-प्राइम संकट और वेल्स फार्गो बैंक के मिसाल इस ओर इशारा करते हैं कि विकसित पश्चिम देशों के बैंक ज्यादा कमाने के लालच में फंसते रहते हैं। हमारे देश में भी नयी अर्थव्यवस्था के लागू होने के बाद से लाभ कमाने को बल मिला। कुछ महीनों पहले एक बहुचर्चित स्टिंग ऑपरेशन से भी बैंकों में खाता खोलने की कमियों पर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ था। कई बैंकों पर इसके लिए रिजर्व बैंक ने जुर्माना भी लगाया।
भारत में बैंकों पर दबाव का कारण बिल्कुल अलग है। साठ के दशक में जब अधिक उपज वाली फसल की किस्में आयीं, तो उनकी खेती के लिए पूंजी की आवश्यकता थी। प्राइवेट सेक्टर के बैंक खेती के लिए ऋण देने के प्रति उदासीन थे, तब बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इसे बैंकों पर ऊपर का दबाव मान सकते हैं, लेकिन इसका फायदा यह हुआ कि भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया। लोगों को वित्तीय व्यवस्था से जोडऩे का कार्यक्रम वित्तीय समावेशन 2005 में शुरू किया गया।
कार्यक्रम धीरे-धीरे चलता रहा। उस कार्यक्रम को स्वाभिमान नाम देकर गति प्रदान करने की कोशिश की गयी, लेकिन उसे जबरदस्त सफलता मिली। पीएमजेडीवाइ के नाम में इस कार्यक्रम को भी ऊपर का दबाव मान सकते हैं, लेकिन फायदा यह हुआ कि लगभग पच्चीस करोड़ लोग खातों के माध्यम से बैंकिंग व्यवस्था से जोड़े जा चुके हैं। अब भी चौबीस प्रतिशत खाते अगर बिना बैलेंस के हैं, तो यह पता लगाया जाना चाहिए कि कितने खाते हैं, जिनमें आज तक कोई लेन-देन नहीं हुआ।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खातों में लेन-देन न होने के कारणों की पड़ताल नहीं की गयी। खातों में लेन-देन का सीधा संबंध आम जनता के स्तर पर होने वाले लाभ से है, उनके रोजगार से है, किसानों की सफल होती खेती से है। इन विषयों पर कोई पड़ताल नहीं हुई है।
रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 में कृषि ऋण में वृद्धि दर पिछले साल के मुकाबले 30.2 प्रतिशत से घट कर 12.6 प्रतिशत रह गयी। बैंकों ने वर्ष 2014-15 के लिए प्राथमिक क्षेत्र और कृषि ऋण लक्ष्यों को भी नहीं प्राप्त किया। ऋण न मिल पाने के कारण आम जनता के स्तर पर पूंजी की कमी और फलस्वरूप लाभ की कमी होना स्वाभाविक है। खेती के क्षेत्र में अभी भी 59.8 प्रतिशत लोगों को ही संस्थागत वित्त प्राप्त हो पाता है और जिनके पास 0.01 हेक्टेयर से कम भूमि है, उनमें 85 प्रतिशत किसान सूदखोरों से ऋण उठाते हैं। हम कैसे सोच सकते हैं कि ये अपने खाते में लेन-देन करेंगे।
वेल्स फार्गो बैंक और पीएमजेडीवाइ खातों के मामले इस ओर इशारा करते हैं कि समस्या बैंक को दिशा देने में है। कोई भी संस्था बिना लक्ष्य के विकास नहीं कर सकती। जरूरी है कंट्रोल और नियंत्रण। फील्ड स्तर के कर्मचारियों को हतोत्साहित करना बैंकों को कहीं का नहीं रख छोड़ेगा।

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