बैंकिंग प्रणाली में सुधार की जरूरत

सरकार को कमजोर और घाटे में चल रहे बैंकों को समय-समय पर पूंजी देने की मजबूरी बनी रहती है। पुनर्गठन से इस मुश्किल का उपाय खोजा जा सकता है। जानकारों की माने तो इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी परियोजनाओं को वित्त मुहैया कराने के लिए बड़े बैंक जरूरी हैं। बड़े बैंकों के पास पूंजी जुटाने की क्षमता और कर्ज वापसी की संभावना पूरी रहती है।

sanjay sharma editor5एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट्स) और फंसे हुए कर्जों का बढ़ता बोझ, अनेक बैंकों के मूल्य में कमी, प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं के कारण बैंकिंग प्रणाली में ठोस सुधारों की जरूरत लंबे समय से महसूस हो रही है। इस हालात में केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पुनर्गठित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
हाल में इसके लिए बनाए गए नवगठित बैंक बोर्ड ब्यूरो को मजबूत और मुनाफा कमा रहे बैंकों के साथ छोटे या घाटे में चल रहे बैंकों के परस्पर विलय के जरिये बड़े बैंक बनाने से जुड़े नियम की जिम्मेदारी दी गई है। बीते महीने बैंकों के ‘ज्ञान संगम’ कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि भारत को ज्यादा संख्या में बैंकों की नहीं, बल्कि मजबूत बैंकों की जरूरत है। ऐसे में सरकार की मंशा अर्थव्यवस्था की मांग के अनुरूप क्षमतावान बड़े बैंक स्थापित करने की दिखती है।
सरकार को कमजोर और घाटे में चल रहे बैंकों को समय-समय पर पूंजी देने की मजबूरी बनी रहती है। पुनर्गठन से इस मुश्किल का उपाय खोजा जा सकता है। जानकारों की माने तो इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी परियोजनाओं को वित्त मुहैया कराने के लिए बड़े बैंक जरूरी हैं। बड़े बैंकों के पास पूंजी जुटाने की क्षमता और कर्ज वापसी की संभावना पूरी रहती है। हमारे शहरों में एक ही इलाके में अनेक बैंकों की शाखाएं हैं ऐसे में इनके विलय से बैंकों के खर्च में कटौती हो सकती हैं।
पर सरकार के रास्ते में बैंकों के विलय को लेकर कई चुनौतियां भी हैं। पिछले साल के ‘ज्ञान संगम’ कार्यक्रम में ज्यादातर बैंकों ने एक सुर में कहा था कि विलय के लिए यह समय ठीक नहीं है, क्योंकि फिलहाल बैंक कई मुश्किलों से जूझ रहे हैं। बैंक कर्मचारियों के संगठनों ने भी बैंकों के विलय और निजीकरण का विरोध किया है। इस तरह सरकार को बैंक कर्मियों की छंटनी के सवालों का भी जवाब देना होगा। कुछ जानकार वैश्विक स्तर पर हुए विलयों के असफलता का हवाला देकर सरकार की इस योजना को लेकर आगाह कर रहे हैं। इनका मानना है कि विलय से बड़ी परिसंपत्तियों के बनने का तर्क कमजोर है।
विलय के विरोधी मानते हैं कि बैंकिंग प्रणाली की बेहतरी के लिए सही व्यापारिक रणनीति, सक्षम प्रबंधन और कुशल कार्यप्रणाली पर सरकार को जोर देना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार विलय से जुड़े सभी कारकों और संभावित परिणामों के संतुलित समीक्षा कर कोई कदम उठाएगी, ताकि अर्थव्यवस्था की मजबूती तय की जा सके।

Pin It