बेपरवाह सांसद

संसद सत्र के हर मिनट पर करीब 29000 रुपए का खर्च आता है। राज्यसभा में आमतौर पर दिन में करीब 5 घंटे और लोकसभा में करीब 6 घंटे यानी कुल 11 घंटे कामकाज होता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जनता की खून-पसीने की कमाई का उपयोग किस तरह हो रहा है।

sanjay sharma editor5हमारे सांसदों ने ठान लिया है कि वो संसद को चलने नहीं देंगे। राज्यसभा हो या लोकसभा, दोनों जगह हंगामे की स्थिति बनी हुई है। जनता की समस्याओं से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है। जिस तरीके से संसद में कांग्रेसी हंगामा कर रहे है वह कही से भी नैतिक नहीं है। पिछले दिनों देश में बड़ा आतंकी हमला हुआ था। इस मुद्दे पर गुरुवार को राज्यसभा में गृहमंत्री राजनाथ सिंह को बयान देना था। गृहमंत्री बयान देने के लिए आए और बयान दिए भी लेकिन कांग्रेसी नारेबाजी में व्यस्त रहे। इतने संवेदनशील मुद्दे पर गृहमंत्री बयान दे रहे है और कांग्रेसी प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार के खिलाफ नारा लगा रहे है, यह कैसी राजनीति है।
संसद का मानसून सत्र शुरु हुए 10 दिन होने को है पर कार्यवाही के नाम पर परिणाम सिफर रहा है। संसद का मानसून सत्र अब तक हंगामे की भेट ही चढ़ा है। इस सत्र में करीब तीस विधेयक पास होने हैं जिनमें वस्तु एवं सेवा कर विधेयक, श्रम सुधार और भूमि अधिग्रहण सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। ये आर्थिक सुधारों के लिए बेहद अहम हैं। लेकिन सत्ता के खिलाड़ी बेपरवाह हैं। उन्होंने संसद को हंगामे का मंच बना लिया है।
वैसे यह कोई नई बात नहीं है। अगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार रहेगी तो भाजपा उसका विरोध करेगी और भाजपा की सरकार है तो कांग्रेस विरोध करेगी। इस राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते कोई काम आज तक समय पर नहीं हो पाया। एक तरफ संसद में जनता के हित में न तो कोई बिल पास हो रहा है और न ही कोई चर्चा हो पा रही है तो दूसरी ओर संसद की कार्यवाही में करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं।
संसद सत्र के हर मिनट पर करीब 29000 रुपए का खर्च आता है। राज्यसभा में आमतौर पर दिन में करीब 5 घंटे और लोकसभा मे करीब 6 घंटे यानी कुल 11 घंटे कामकाज होता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जनता की खून-पसीने की कमाई का उपयोग किस तरह हो रहा है।
इस समय पूरा देश पूर्व राष्टï्रपति अब्दुल कलाम के निधन से दुखी है। अब्दुल कलाम ने भी शिलांग जाते समय संसद के हंगामे पर दुख व्यक्त किया था। उन्होंने चिंता जतायी थी कि इसी तरह हंगामे की भेट संसद सत्र चला गया जो जनता के हित में कोई चर्चा ही नहीं हो पाएगी। अब्दुल कलाम के कार्यों व उनके सपनों के बारे में सभी नेताओं व सांसदों ने मीडिया में बयानबाजी की पर उनके सपने को कैसे साकार करना है इससे कोई सरोकार नहीं है। हमारे सांसद जनता की समस्याओं और उनके हितों के बारे में सोच ले तो यही अब्दुल कलाम के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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