बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की भावना के विपरीत विचार

भारत में लिंगानुपात सुधरा जरूर है लेकिन कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। अभी भी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एक हजार लडक़ों के अनुपात में 918 बच्चियां हैं। यह कड़वी सच्चाई है कि सरकारों की ओर से तमाम जागरूकता अभियानों के बावजूद कन्य भ्रूण हत्या पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकी है।

नीरज कुमार दुबे
देश में लिंग परीक्षण जांच पर रोक की बजाय इसे अनिवार्य कर देने का केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी का सुझाव केंद्र सरकार के ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की भावना के विपरीत है। हालांकि सुझाव पर विवाद के बाद मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है, ‘‘मंत्रालय स्पष्ट करता है कि किसी भ्रूण के लिंग का पता लगाने का कैबिनेट का कोई प्रस्ताव नहीं है और गर्भ में बच्चे के लिंग का अनिवार्य रूप से पता लगाने का विचार कुछ हितधारकों ने दिया है।’’ बयान में कहा गया है कि जन्म से पूर्व बच्चे के लिंग का अनिवार्य रूप से पता लगाने के विचार का उद्देश्य जन्म के समय उचित देखभाल करना है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी स्पष्ट किया है कि महिला एवं बाल विकास मंत्री द्वारा लिंग परीक्षण जांच संबंधी सुझाव उनकी व्यक्तिगत राय है, यह मंत्रिमंडल का निर्णय नहीं है। लेकिन इस सुझाव से विभाग की मंत्री के तौर पर मेनका की सोच पर जरूर सवाल उठे हैं।
केंद्रीय मंत्री ने क्षेत्रीय संपादकों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह सुझाव देते हुए तर्क दिया कि यह इसलिए है ताकि बच्चे की ठीक से देखरेख हो सके। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि मंत्री क्या देश की जमीनी सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं। जिस देश में तमाम प्रतिबंधों के बावजूद धड़ल्ले से भ्रूण परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएं जब तब सामने आती हों और कई बार इस काम में सिर्फ लोगों के ही नहीं डॉक्टरों के भी शामिल होने की घटनाएं आम हों, वहां लिंग जांच की अनुमति देना कितना घातक सिद्ध होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है।
अकसर देखने में आता है कि किसी महिला को कन्या को जन्म देने के बाद पारिवारिक प्रताडऩा का शिकार होना पड़ता है ऐसे हालात में जब परिवार वालों को पहले ही ज्ञात हो जाएगा कि गर्भ में पल रहा बच्चा लडक़ा नहीं है तो महिलाओं के लिए प्रसव से पहले का समय सिर्फ शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भी परेशानी बढ़ाने वाला होगा। यह कुदरत के नियम के भी विपरीत है जोकि बच्चा लडक़ा है या लडक़ी, यह जानने का अवसर उसके जन्म के बाद ही देती है।
भारत में लिंगानुपात सुधरा जरूर है लेकिन कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। अभी भी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एक हजार लडक़ों के अनुपात में 918 बच्चियां हैं। यह कड़वी सच्चाई है कि सरकारों की ओर से तमाम जागरूकता अभियानों के बावजूद कन्य भ्रूण हत्या पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकी है। सरकार ने पहले ही इस संबंध में जो कड़े कानून बना रखे हैं उसका ही पालन पूरी तरह से वह सुनिश्चित नहीं करा पा रही है ऐसे में अगर नई व्यवस्था आती है तो उसकी निगरानी के लिए जरूरी तंत्र कहां से आएगा? अभी गली गली में फैले क्लीनिकों में मात्र यही व्यवस्था है कि माता पिता से इस बात पर दस्तख्त करा लिये जाते हैं कि वह लिंग जांच का आग्रह नहीं करेंगे लेकिन इसके बावजूद ऐसी जांचें होती हैं। मान लीजिये यदि जांच से छूट मिल जाती है तो विकृत मानसिकता वाले लोगों के लिए कितना आसान होगा कि सिर्फ कुछ नई लाइनों पर दस्तख्त करके ही अपनी मनमानी कर सकें।
हालांकि सरकार की ओर से की गयी किसी नई पहल या नये विचार का सिर्फ विरोध के नाम पर ही विरोध नहीं होना चाहिए। मंत्री ने इस विषय पर बहस और सुझाव का विचार भी रखा है। संभव है इस व्यवस्था के पक्ष में भी विचार आएं लेकिन जो जमीनी हालात हैं उसमें इस विचार का तगड़ा विरोध होना तय है। मंत्री के सुझाव पर सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से तथा सोशल मीडिया पर जिस तरह से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है उससे संभवत: सरकार इस ओर कोई भी कदम उठाने से हिचकेगी। सोशल मीडिया पर एक शख्स की यह टिप्पणी देखिये- ‘एक बार संजय गांधी ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए पुरुषों की नसबंदी का अभियान चलाया, अब मेनका गांधी कन्या जन्म नियंत्रित करने का प्रयास कर रही हैं।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम की शुरुआत करते समय कहा था, ‘हमें बेटियों को मारने का हक नहीं है’, ‘हमारा मंत्र होना चाहिए- बेटा, बेटी एक समान’। उन्होंने कहा था कि जब तक हमारी मानसिकता 18वीं सदी की है, हमें खुद को 21वीं सदी का नागरिक कहने का कोई अधिकार नहीं। उम्मीद है हरियाणा के पानीपत में हुए इस कार्यक्रम में मौजूद रहीं महिला एवं बाल विकास मंत्री को प्रधानमंत्री का वह भाषण अभी भी याद होगा।

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