बुलंदशहर मामले को सुनकर भर आईं आंखें

अजीत अंजुम

मैनेजिंग एडीटर, इंडिया टीवी

Captureहाँ बेटी..रोने के सिवा मैं कर भी क्या सकता हूँ, लेकिन डिंपल जी ..अखिलेश जी…आप क्या कर रहे हैं।
एक दो दिन संसद और विधानसभाओं में हंगामा होगा..सत्ता से सवाल पूछने की रस्म अदायगी होगी..गैंग रेप पर सरकार को घेरने की सियासत होगी…मीडिया के दबाव में पुलिस की दिखावटी मुस्तैदी होगी ..टीवी चैनलों मेंं बहस-ए-ग़ुस्सा और हल्ला बोल होगा फिर गैंग रेप की ये घटना सबकी स्मृति से लोप हो जाएगी…। सब अपने अपने अगले एजेंडे को साधने में लग जाएंगे, लेकिन इस पीडि़त परिवार का क्या होगा? जरा उस बेटी के बारे में सोचिए जिसके साथ दरिंदगी हुई है …उस मां के बारे में सोचिए …जो बेटी के साथ ख़ुद भी शिकार हुई है… उस पिता के बारे में सोचिए, जिसकी बेटी से साथ रेप हुआ है…जिसकी चीखें सुनकर भी वो कुछ कर नहीं सका…जब बेटी ने पापा…पापा…की आवाज लगाई और पापा ने बेटी को बचाने की कोशिश की तो उसकी इतनी पिटाई कर दी गई कि वो बेदम हो गया…बेबस बेटी की निरीह आवाज उसे कैसे जीने देगी…बेटी ने विरोध किया तो मां-बाप को मार देने की धमकी देकर उसके साथ जबरदस्ती की गई…मां भी बेचारी क्या करती…वो ख़ुद भी तो उन दरिदों के चंगुल में थी…आज पिता कह रहा है अगर हमें इंसाफ नहीं मिला तो परिवार समेत खुदकुशी कर लेंगे…उसकी बेटी उसे कह रही है… पापा…मैं सोने की कोशिश करती हूं…तो उन हैवानों के डरावने चेहरे सामने आ जाते हैं …क्या करें पापा? अपनी बेटी को संभालने के लिए क्या करे वो मां…जो खुुद दरिंदगी की शिकार हुई है…मैं तो ये पंक्तियां लिखते समय रो रहा हूं.. उस पिता का दर्द महसूस करके…चश्मे पर आंसुओं की बूंदे इन शब्दों को बार बार ओझल कर रही है..।
काश! सत्ता …सरकार और सिस्टम के भीतर धडक़ने वाला कोई पुर्जा होता!
डिंपल जी…आप नेता भी हैं…सांसद भी हैं… सूबे के सीएम की पत्नी भी हैं और बच्चों की मां भी…। हो सकता है अखिलेश जी अपने राज-काज में इतने व्यस्त हों कि उन्हें यूपी समेत देश में हर रोज हो रही रेप की रूटीन घटनाओं की तरह लगे और उनके पास इतनी फुर्सत भी न हो कि एक पिता…एक मां या एक बेटी के दर्द को समझ पाएं…। मीडिया के दबाव में चार अफसरों को सस्पेंड करके उन्हें अपना सियासी फर्ज निभा देने का अहसास भी हो रहा होगा…। उनके लिए यूपी के 20 करोड़ नागरिकों में से ये भी हैं लेकिन आप तो थोड़ा वक्त निकाल सकती हैं…। इस परिवार का दर्द समझने के लिए…संसद और मुख्यमंत्री आवास की व्यस्तताओं से समय निकालकर एक बार उस पिता, बेटी और मां से मिलिए ..और हाँ …अपने सरकारी अमले और काफिले से अलग हटकर मिलिए …उनके दर्द को समझिए और सोचिए कि ताउम्र किस दंश के साथ जिएंगे वो? ..एक गरीब पिता जो टैक्सी चलाकर अपने परिवार को पाल रहा था, उसे तो अब समाज मोहल्ला परिवेश सभी चाहे अनचाहे घुटने और ठीहा बदलने को मजबूर कर रहे हैं…क्या करे वो बाप? क्या करे वो मां? क्या करे वो बेटी?
और अंत में रोते हुए पिता के नाम
तुम भी एक बाप हो ..मैं भी बाप हूं…तुम भी रो रहे हो…मैं भी रो रहा हूं…रोना हमारी नियति है क्योंकि नीति नियंता के लिए हम और तुम सवा सौ करोड़ की भीड़ का एक हिस्सा भर हैं…वोट भर हैं…तुम्हारी बात तो दुनिया सुन भी रही है लेकिन लाखों ऐसे अभागे मां-बाप हैं, जिनकी तो कोई सुनता भी नहीं…।
(अजीत अंजुम की फेसबुक वॉल से…)

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