बुजुर्गों की अवहेलना

ऐसे अनेक मामले संज्ञान में आए हैं जहां बेटों ने अपनी मां को घर से निकाल दिया या फिर वृद्धा आश्रम छोड़ आए। यह सब नैतिकता में गिरावट की वजह से हो रहा है। भौतिक सुख की चाह में हम अपने संस्कार को भूलते जा रहे हैं। यदि बुजुर्ग बोझ न होते तो आज इतने वृद्धा आश्रम न होते। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो जितना ज्यादा सफल है वही अपने मां-बाप की अवहेलना ज्यादा कर रहा है।

sanjay sharma editor5एक समय था जब ऐसे लोगों को किस्मतवाला समझा जाता था, जिन पर बड़े-बुर्जुगों का आशीर्वाद और छत्रछाया बनी रहती थी लेकिन आज के परिवेश में परिस्थितियां बदल गई हैं। एकल परिवार का चलन बढऩे की वजह से अब बुजुर्ग अपने ही बच्चों को बोझ लगने लगे हैं। जिन मां-बाप को ईश्वर के तुल्य समझा जाता है वही आज बच्चों को बोझ प्रतीत होने लगे हैं। ऐसा ही एक मामला रेलवे अस्पताल में देखने को मिला जहां एक 70 साल की बुजुर्ग को उसके परिजन छोडक़र फरार हो गए। सुषमा नाम की एक मरीज को बीते 21 दिसंबर को उत्तर रेलवे मंडल के चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था, जहां परिवार वाले इस बुजुर्ग मरीज को भर्ती कराकर फरार हो गए।
ऐसे अनेक मामले संज्ञान में आए हैं जहां बेटों ने अपनी मां को घर से निकाल दिया या फिर वृद्धा आश्रम छोड़ आए। यह सब नैतिकता में गिरावट की वजह से हो रहा है। भौतिक सुख की चाह में हम अपने संस्कार को भूलते जा रहे हैं। यदि बुजुर्ग बोझ न होते तो आज इतने वृद्धा आश्रम न होते। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो जितना ज्यादा सफल है वही अपने मां-बाप की अवहेलना ज्यादा कर रहा है। मध्यम वर्ग और निम्र मध्यम वर्ग में तो अभी थोड़ी गुंजाइश बची हुई है कि लोग अपने बुजुर्ग मां-बाप का ख्याल रख रहे हैं लेकिन उच्च वर्ग की स्थिति ज्यादा खराब है। वहां किसी के पास अपने बुजुर्ग मां-बाप की सेवा के लिए न तो वक्त है और न ही पैसा। पिछले साल एक एनजीओ द्वारा किए गए सर्वें में भी इस बात का खुलासा हुआ था कि बहुओं द्वारा बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रताडि़त किए जाते हैं।
देश की राजधानी दिल्ली हो या उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, हर जगह बुजुर्गों की ऐसी ही हालत है। पहले के समय में संयुक्त परिवार का चलन होने से परिवार में प्यार, एकता की भावना होती थी। एक-दूसरे के सुख-दुख को अपना समझते थे और बच्चे वही देखकर बड़े होते थे। इसीलिए वह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारी से करते थे और अपने माता-पिता की सेवा दिल से करते थे। लेकिन आज के परिवेश में एकल परिवार का चलन होने की वजह से बच्चे परिवार के महत्व को नहीं समझ पा रहे, जिसका परिणाम है कि आगे चलकर बच्चे अपने ही मां-बाप को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ रहे। जिस तरह से आज बुजुर्गों की अवहेलना हो रही है वह कहीं से ठीक नहीं है। आज हम अपने बुजुर्गों की अवहेलना कर रहे हैं तो कल हमारे बच्चे हमारी करेंगे। क्योंकि हम जो बोयेंगे वहीं काटेंगे।

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