बिहार विधानसभा चुनाव मैदान में केन्द्र सरकार

केन्द्र सरकार द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव जीतने के लिए सारी ताकत झोंक देने के बावजूद चुनाव में किसकी जीत होगी यह आज भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा सितम्बर माह में बिहार में चुनाव प्रचार में सक्रिय रहना एवं मंत्री पद का वेतन स्वीकार करना नैतिकता के नाते गलत है। जब चुनावी लड़ाई लडऩे में भाजपा संगठन सक्षम है एवं बिहार में सक्रिय है तो केन्द्र सरकार के मंत्रियों को बिहार आकर मोर्चा संभालने की जरूरत नहीं थी।

 डॉ. हनुमंत यादव
26मई 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण के बाद से ही लगभग एक महीने तक समाचार माध्यमों में यह बात छाई रही कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न केवल स्वयं अपने कार्यालय प्रात: 10 बजे पहुंच जाते हैं बल्कि उनके निर्देशानुसार उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी भी नियमित रूप से समय पर आना-जाना करते हैं। मंत्रियों के पदचिन्हों पर चलते हुए उनके मंत्रालयों के अधिकारी भी समय पर कार्यालय पंहुचने लगे थे। प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रियों को यह भी निदेश दिए गए कि मंत्रियों के पास जो भी फाइलें आती हैं उन पर त्वरित नियमानुसार निर्णय लेकर कोई भी कार्य विलम्बित न रखें। मंत्रिमंडल के पदग्रहण के 100 दिन पूरे होने पर समाचार माध्यमों में यह समाचार भी सुर्खियों में रहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्रियों की क्लास लेकर उनके कामकाज की समीक्षा की तथा जिन मंत्रियों को कामकाज अपेक्षानुसार नहीं था उन्हें चेतावनी भी दी गई। यह भी उन दिनों यह पढ़-सुन कर बहुत अच्छा लगता था कि प्रधानमंत्री द्वारा एक अच्छी कार्य संस्कृति विकसित की जा रही है।
पिछले महीने मैं एक सप्ताह के लिए बिहार प्रवास पर था। उन दिनों चुनाव प्रचार तेजी से प्रारम्भ हो चुका था तथा चुनावी चर्चाएं होने लगी थीं। गत सप्ताह पुन: बिहार के भागलपुर, समस्तीपुर व बेगूसराय प्रवास पर था, यह संयोग ही था कि इन जिलों में 12 अक्टूबर को मतदान होने की वजह से चुनाव प्रचार चरम सीमा पर था। वहां अनेक प्रबुद्धजनों के द्वारा कहते सुना गया कि एन.डी.ए. के नाम पर वास्तव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ रही है। केन्द्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री अनंतकुमार बिहार विधानसभा चुनाव के प्रभारी हैं। उनके नेतृत्व में केन्द्र सरकार के एक तिहाई मंत्री पिछले एक माह से बिहार में डेरा डाले हुए हंै तथा 11 केन्द्रीय मंत्री इन 11 जिलों में चुनाव की बागडोर संभाले हुए हैं। बीबीसी के अनुसार प्रधानमंत्री ने बिहार विधानसभा चुनाव जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। उनके निर्देश पर कुछ मंत्रियों को छोडक़र केन्द्र सरकार की पूरी केबिनेट पिछले एक सप्ताह से बिहार में चुनाव प्रचार में सक्रिय है। प्रधानमंत्री मोदी संसद का बजट सत्र समाप्त होने के बाद हर माह किसी न किसी सरकारी योजना के शिलान्यास या उद्घाटन के नाम से बिहार आते रहे हैं। 18 अगस्त को उन्होंने बिहार के लिए कुल 1.25 लाख करोड़ की भारी-भरकम राशि का आर्थिक पैकेज का विस्तार से ऐलान करते हुए चुनाव में एनडीए को भारी मतों से जिताने का आह्वान किया।
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने जब अपनी चुनावी रैलियों में भाजपा के सत्ता में आने पर दलित परिवारों को रंगीन टीवी, छात्रों को लैपटाप, गरीबों को साल में एक बार धोती-कुर्ता और गरीब महिलाओं को मुफ्त साड़ी देने की बात करना प्रारम्भ की तो अधिकतर लोगों को विश्वास ही नहीं हो पाया। क्योंकि बिहार के खस्ताहाल आर्थिक स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की हर मंच पर मांग करते रहे हैं जिससे कि बिहार की राज्य विकास योजनाओं के लिए 90 प्रतिशत अनुदान के रूप में मिल सके। भाजपा ने चुनावी एजेंडे के स्थान पर पार्टी का विजन डाक्युमेंट जारी किया। केन्द्र सरकार द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव जीतने के लिए सारी ताकत झोंक देने के बावजूद चुनाव में किसकी जीत होगी यह आज भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा सितम्बर माह में बिहार में चुनाव प्रचार में सक्रिय रहना एवं मंत्री पद का वेतन स्वीकार करना नैतिकता के नाते गलत है। जब चुनावी लड़ाई लडने में भाजपा संगठन सक्षम है एवं बिहार में सक्रिय है तो केन्द्र सरकार के मंत्रियों को बिहार आकर मोर्चा संभालने की जरूरत नहीं थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शपथग्रहण करने के बाद जिस प्रकार एक अच्छी कार्य संस्कृति विकसित करने का प्रयास किया था उससे यह आाशा जगी थी कि वह राजनीति में स्वस्थ परम्पराएं स्थापित करेगी तथा अनुकरणीय स्वच्छ प्रशासन देगी, किन्तु अब ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है।

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