बिहार चुनाव नतीजों के बाद भाजपा में खेमेबंदी

नीरज कुमार दुबे
बिहार विधानसभा चुनावों में करारी हार को लेकर भारतीय जनता पार्टी में मचा घमासान पार्टी अनुशासन को तार तार कर रहा है। हार को लेकर पार्टी के मार्गदर्शक मंडल का सार्वजनिक बयान और इस बयान के विरुद्ध कार्यवाही की खुलेआम मांग दर्शाती है कि पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव की प्रक्रिया में निश्चित रूप से कई खामियां थीं क्योंकि दोनों पीढ़ी के नेता एक दूसरे के साथ सहज नजर नहीं आ रहे हैं। बिहार चुनावों में हार के बाद पार्टी नेताओं के बयानों का जो दौर चला उससे खेमेबंदी भी साफ तौर पर नजर आई। एक अलग तरह की पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के लिए सचमुच यह बड़ी ही विकट स्थिति है।
बिहार चुनावों में हार के बाद यह कहा जा रहा है कि ‘मोदी लहर’ खत्म हो गयी है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से भाजपा को जो विजय रथ चला था उसने महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और झारखंड में भी फतह हासिल की लेकिन दिल्ली में आकर यह रथ रुक गया। हालांकि दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नहीं जुड़ी थी क्योंकि वहां पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के लिए एक चेहरा (किरण बेदी) पेश किया था लेकिन बिहार में तो चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम नीतीश कुमार था जिसमें नीतीश कुमार ने राजग को चारों खाने चित किया। प्रधानमंत्री की 30 से ज्यादा बड़ी रैलियों और राजग के धुआंधार प्रचार के बावजूद यह गठबंधन 243 सीटों में से मात्र 58 पर सिमट गया।
भाजपा के ऐसे वरिष्ठ लोग जोकि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से खुद को किनारे लगा दिये जाने से परेशान थे या उपेक्षित महसूस कर रहे थे, उनको पहली बार मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर हमला बोलने का बड़ा मौका हाथ लगा क्योंकि बिहार चुनावों की रणनीति मोदी और शाह ने ही मुख्यत: मिलकर बनाई थी। मोदी-शाह की जोड़ी की जुगलबंदी से खफा वरिष्ठ नेताओं को यह पता है कि अभी पार्टी में संगठन चुनावों का दौर चल रहा है और जनवरी तक पार्टी का नया अध्यक्ष चुना जाना है। अमित शाह फिर से पार्टी अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार हैं। विरोधी खेमे का मानना है कि यदि अभी से प्रयास किया जाए और अमित शाह की अध्यक्ष पद पर वापसी को रोका जाए तो मोदी-शाह की जोड़ी टूटेगी और अन्य नेताओं का दौर आएगा। गौरतलब है कि अभी अमित शाह राजनाथ सिंह द्वारा बीच में छोड़े गये अध्यक्षीय कार्यकाल को ही पूरा कर रहे हैं क्योंकि राजनाथ सिंह ने गृहमंत्री बनने के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। विरोधी खेमे के हौसले इसलिए भी बुलंद हैं क्योंकि उनके सामने नितिन गडकरी का उदाहरण मौजूद है जिनका फिर से पार्टी अध्यक्ष पद पर चुना जाना निश्चित था और इस औपचारिकता से कुछ घंटे पूर्व ही हालात ऐसे बन गये कि गडकरी को इस्तीफा देने पर बाध्य होना पड़ा था।
बिहार विधानसभा चुनावों के समय से ही कभी टिकट बंटवारे, तो कभी प्रचार से खुद को दूर रखे जाने तो कभी पार्टी की रणनीतियों की आलोचना करते रहे सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, आर.के. सिंह को चुनाव परिणामों के बाद मनोज तिवारी और भोला सिंह का भी साथ मिला। इसके बाद जब पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों ने बिहार विधानसभा चुनावों में हार को गंभीरता से लेने और जवाबदेही तय करने का सुझाव दिया तो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे नेताओं को यह नागवार गुजरा। यह सुझाव नागवार गुजरना भी था क्योंकि पार्टी संसदीय बोर्ड ने बिहार चुनाव परिणामों पर बैठक करते हुए सभी को क्लीन चिट दे दी थी और उसे हार का मात्र यही कारण समझ आया कि राजग महागठबंधन के चुनावी गणित को समझने में विफल रहा। मार्गदर्शक मंडल ने यह भी सुझाव दिया कि हार की समीक्षा उन्हें नहीं करनी चाहिए जोकि इसके लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।
मार्गदर्शक मंडल सदस्यों के संयुक्त बयान पर जब विवाद गहराया तो सरकार में शामिल तीन पूर्व पार्टी अध्यक्षों- राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू और नितिन गडकरी ने भी एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि पार्टी में कभी यह परम्परा नहीं रही कि हार या जीत के लिए किसी नेता को जिम्मेदार ठहराया जाए बल्कि पार्टी में सामूहिक जिम्मेदारी ली जाती है। वेंकैया नायडू ने तो यह कह कर मोदी सरकार का बचाव भी किया कि जब वह खुद (वेंकैया नायडू) पार्टी अध्यक्ष थे तब अटलजी का नेतृत्व होने के बावजूद पार्टी चुनाव हार गयी थी और 2009 के लोकसभा चुनावों में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में लड़ी पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा था। नितिन गडकरी ने तो कथित रूप से अमित शाह को यह सुझाव दे दिया कि संयुक्त बयान जारी करने वाले और बयानबाजी करने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उनके इस बयान पर जब विवाद बढ़ा तो गडकरी ने कहा कि उन्होंने वरिष्ठ नेताओं के प्रति असम्मान नहीं जताया। एकमात्र राजनाथ सिंह ऐसे रहे जिन्होंने वरिष्ठ नेताओं की चिंताओं पर गौर किये जाने की बात कही लेकिन वह भी खुलकर बुजुर्ग नेताओं के साथ नहीं आए। डेमैज कंट्रोल की जिम्मेदारी वित्त मंत्री अरुण जेटली को सौंपी गयी जोकि खुद कभी आडवाणी कैम्प के माने जाते थे। संयुक्त बयान के बाद उन्होंने डॉ. मुरली मनोहर जोशी से मिलकर उन्हें मनाने का प्रयास किया। खास बात यह रही कि पार्टी के भीतरी झगड़े में बीचबचाव करने इस बार आरएसएस खुलकर सामने नहीं आया। इसके पीछे माना जा रहा है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत इस समय दबाव में हैं क्योंकि उनके कथित आरक्षण विरोधी बयान को भी बिहार में पार्टी की हार के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है।

Pin It