बिहार चुनावों की जीत से हौसला बढ़ेगा राजग का

लोकसभा चुनावों में जनता दल युनाइटेड की करारी हार के बाद जब महागठबंधन बना तो इसने विधानसभा उपचुनावों और राज्यसभा उपचुनावों में मिलकर राजग को करारी पटखनी दी थी। लेकिन जीतन राम मांझी के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान महागठबंधन की लोकप्रियता तेजी से कम होती गयी।

 नीरज कुमार दुबे
बिहार विधान परिषद चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को, खासकर भारतीय जनता पार्टी को मिली अप्रत्याशित जीत ने जहां राजग में उत्साह का संचार कर दिया है तो वहीं जदयू-राजग-कांग्रेस का महागठबंधन बार-बार यही कह रहा है कि इन परिणामों का आगामी विधानसभा चुनावों पर कोई असर नहीं होगा। चुनाव परिणामों का हर दल के नेता अपने अपने हिसाब से विश्लेषण कर रहे हैं लेकिन जो सबको नजर आ रहा है वह यह है कि विधानसभा चुनावों में कांटे की टक्कर होने वाली है। चुनाव परिणामों ने दर्शा दिया है कि नीतीश मुख्यमंत्री के रूप में भले आज भी लोगों की पहली पसंद हों लेकिन उनके महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं होने का नुकसान उन्हें आगे भी झेलना पड़ सकता है।
राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले सेमीफाइनल कहे जा रहे इन चुनावों में महागठबंधन के पिछडऩे का बड़ा कारण धन बल भी माना जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक विधान परिषद चुनावों में जितने भी लोग जीते हैं सभी करोड़पति हैं। इन चुनावों में मतदाताओं की संख्या सीमित ही है इसीलिए उनको प्रभावित करने के ज्यादा आसार रहते हैं। अकसर राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों में ‘वोट के बदले नोट’ के मामले सामने आते रहते हैं। अभी हाल ही में तेलुगू देशम पार्टी के एक विधायक भी ऐसे ही आरोप में गिरफ्तार किये गये। उन्हें कथित तौर पर एक नामित विधायक को रिश्वत देते रंगे हाथों पकड़ा गया था।
लोकसभा चुनावों में जनता दल युनाइटेड की करारी हार के बाद जब महागठबंधन बना तो इसने विधानसभा उपचुनावों और राज्यसभा उपचुनावों में मिलकर राजग को करारी पटखनी दी थी। लेकिन जीतन राम मांझी के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान महागठबंधन की लोकप्रियता तेजी से कम होती गयी। मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार की वापसी के बाद जनता दल युनाइटेड का ग्राफ बढ़ता हुआ माना गया और ऐसी भी रिपोर्टें आईं कि चूंकि भाजपा अभी तक अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तय नहीं कर पाई है और इस पद के उम्मीदवार को लेकर राजग में मतभेद हैं इसलिए नीतीश बढ़त बनाये हुए हैं। स्वयं नीतीश ने भी जनता से सीधे जुड़ाव के लिए कई कार्यक्रम घोषित किये, अपनी आगामी योजनाएं पेश कीं और महागठबंधन के उम्मीदवारों के लिए खुद वोट भी मांगे लेकिन परिणाम अपेक्षा अनुरूप नहीं आये तो कह दिया कि इन चुनाव परिणामों का राज्य विधानसभा चुनावों से कोई वास्ता नहीं है और यह जनता की राय नहीं है।
नीतीश ने यह भी दावा किया कि महागठबंधन के नेताओं के बीच सब कुछ ठीकठाक है। लेकिन उनके बयान में निहित सच्चाई की पोल महागठबंधन के नेताओं ने ही खोल दी। राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि यह नतीजे बताते हैं कि आपस में मतभेद दूर करना अब जरूरी है। जदयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने चुनाव परिणामों को आंखें खोलने वाला करार देते हुए कहा कि गठबंधन में शामिल सभी दलों को समीक्षा करनी चाहिए कि आखिर हमसे कहां चूक हो गई। जदयू के बिहार प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा कि हम जिस सीट पर जीत की उम्मीद करते थे उस पर भी हम हार गए, यह विचारणीय सवाल है।
दूसरी ओर भाजपा की स्थिति में ऐन चुनावों से पहले कुछ सुधार जरूर हुआ है। पार्टी ने इन चुनावों में जीत का जश्न जिस प्रकार पटना से लेकर दिल्ली तक मनाया उससे साफ है कि पार्टी जनता के बीच यही संदेश देना चाहती है कि राज्य में वह ही पहली पसंद के तौर पर उभर रही है। पार्टी को अब सीटों के बंटवारे के दौरान राजग सहयोगियों से मोलभाव करने में भी आसानी होगी।
बहरहाल, जदयू नेता यह जो तर्क दे रहे हैं कि विधानसभा चुनाव 243 सीटों पर होना है ऐसे में 24 सीटों के चुनाव परिणामों से कोई निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है, से असहमत होने का कारण है। चुनाव सर्वेक्षण करने वाली एजेसियां 1000-1500 लोगों से बातचीत के आधार पर ही पूरे संसदीय या विधानसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम के बारे में भविष्यवाणी कर देती हैं जोकि कई बार सही भी निकल जाती है। ऐसे में विधान परिषद चुनाव परिणामों को सर्वेक्षण एजेंसियों का एक सैंपल मान लें तो विधानसभा चुनाव परिणामों के लिए राजग की बढ़त की भविष्यवाणी की भी जा सकती है।

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