बिहार के चुनाव अभियान में अपशब्दों की बाढ़

चुनाव प्रचार के दौरान यह साफ देखने को मिल रहा है कि अशिष्ट बोली पर किसी एक का अधिकार सुरक्षित नहीं है और नेता जनता को दूसरे दल से सावधान करने के लिए बेसिर पैर के बयान दिये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने लालू प्रसाद यादव के साथ ‘शैतान’ को जोड़ा तो लालू प्रसाद ने प्रधानमंत्री को ‘ब्रह्म पिशाच’ की संज्ञा दे डाली और कहा कि ऐसे पिशाच को भगाना उन्हें भलीभांति आता है।

 नीरज कुमार दुबे
बिहार विधानसभा चुनावों के लिए जारी चुनाव प्रचार के दौरान एक नयी बात यह पता चली कि गालियों का भी शब्दकोश होता है। हाल ही में राज्य में एक चुनाव प्रचार रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव पर निशाना साधते हुए कहा था कि वह हर रोज सुबह शब्दकोश में नयी गालियां ढूंढते हैं। वैसे गालियों का शब्दकोश अस्तित्व में यदि नहीं भी है तो विभिन्न दलों के नेता जिस प्रकार एक दूसरे के खिलाफ अनर्गल शब्दों का नियमित रूप से प्रयोग कर रहे हैं उससे यह तो तय है ही कि ‘शब्दकोश’ जल्द तैयार जरूर हो जाएगा।
चुनाव प्रचार के दौरान यह साफ देखने को मिल रहा है कि अशिष्ट बोली पर किसी एक का अधिकार सुरक्षित नहीं है और नेता जनता को दूसरे दल से सावधान करने के लिए बेसिर पैर के बयान दिये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने लालू प्रसाद यादव के साथ ‘शैतान’ को जोड़ा तो लालू प्रसाद ने प्रधानमंत्री को ‘ब्रह्म पिशाच’ की संज्ञा दे डाली और कहा कि ऐसे पिशाच को भगाना उन्हें भलीभांति आता है। प्रधानमंत्री ने ‘जंगलराज-2’ के आगमन को लेकर चेताया तो लालू ने सांप्रदायिक शक्तियों से लोगों को सावधान किया। दादरी घटना से उपजे विवाद की गूंज बिहार में भी सुनाई दी और ‘चाय पर चर्चा’ से भटक कर ‘गाय पर चर्चा’ शुरू हो गयी। ‘हिन्दू भी गोमांस खाते हैं’, ‘ऋषि-मुनि भी गोमांस खाते थे’ जैसे राजद नेताओं के बयानों से पार्टी की संभावनाओं पर असर पडऩे लगा तो पार्टी नेता स्पष्टीकरण देने लगे लेकिन ऐसा करते समय फिर विवाद पैदा कर बैठे। जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने तो एक चुनावी सभा में यहां तक कह दिया कि जो जदयू को वोट नहीं देगा वह जहन्नुम में जाएगा। इस बयान के मद्देनजर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कर ली गयी है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने लालू यादव को ‘चारा चोर’ कहा तो लालू यादव ने पलटवार करते हुए शाह को ‘नरसंहारी’ कह डाला। दोनों के ही खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई गई है।
जदयू नेताओं की बात करें तो नीतीश कुमार जहां भी प्रचार के लिए जा रहे हैं वहां प्रधानमंत्री पर अपने चुनावी वादे पूरे नहीं करने का आरोप लगा रहे हैं साथ ही भाजपा की कथनी और करनी में कथित फर्क को उजागर कर रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा नेता कुमार के खिलाफ विश्वासघात करने का आरोप लगा रहे हैं और दर्शा रहे हैं कि जब से लालू और नीतीश की जोड़ी साथ आई है बिहार में अपराध की दर बढ़ गयी है।
चुनाव प्रचार में शुरू से ही ‘जंगलराज-2’ से जनता को सावधान करती आ रही भाजपा हालांकि उस समय बैकफुट पर आ गयी थी जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की इस टिप्पणी पर विवाद हो गया कि ‘आरक्षण’ सुविधा की समीक्षा की जानी चाहिए। भागवत के इस बयान के बाद बिहार में महागठबंधन के नेताओं ने भाजपा को आरक्षण विरोधी करार देने के लिए हरसंभव प्रयास शुरू कर दिये और इस मुद्दे पर भाजपा की ओर से दी जा रही हर प्रकार की सफाई नाकाफी नजर आने लगी लेकिन तभी गौ माता की कृपा भाजपा पर हुई और दादरी घटना की प्रतिक्रिया में राजद अध्यक्ष ने ऐसा बयान दिया कि भाजपा रक्षात्मक से आक्रामक मुद्रा में आ गयी और चुनावी माहौल में बड़ा बदलाव आ गया। तीन-चार चरणों के चुनावों में हर पार्टी के लिए मुश्किल यही होती है कि उसे सभी चरणों तक माहौल अपने पक्ष में रखने के लिए तमाम प्रयास करने पड़ते हैं और एक भी गलत कदम बाकी के चरणों में पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
बहरहाल, यहां हमारे चुनाव आयोग की स्थिति पर दया भी आती है क्योंकि उसे आदर्श आचार संहिता के लिए कड़े नियम बनाने की इजाजत तो है लेकिन कार्रवाई के मामले में उसके हाथ बंधे हुए हैं। तभी तो हर चुनाव में नेतागण चुनाव आयोग की कार्रवाई की परवाह किये बिना वह सब कुछ बोलते, करते हैं जिससे उन्हें लाभ मिलने की संभावना होती है और चुनाव आयोग ऐसे कदमों पर नाखुशी जताकर या चेतावनी देकर और स्पष्टीकरण मिलने मात्र से ही संतुष्ट हो जाता है।

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