बाजारी ताकतें क्या योग को उपभोक्ता मध्यम वर्ग का शाश्वत भाव बनने देंगी?

Captureएक विज्ञापन में आधा दर्जन अर्ध-नग्न युवतियां एक खास किस्म की महक वाला पदार्थ इस्तेमाल करने वाले युवक को घेर लेती हैं कामुक मुद्रा में। ऐसा लगता है कि मात्र महक पर ही ये नारियां अपना सब कुछ न्योछावर कर सकती हैं। इसमें नारि-गरिमा का अपमान तो होता ही है लेकिन इस विज्ञापन से प्रभावित पुरुष युवा वर्ग वह कॉस्मेटिक पदार्थ खरीदने लगता है। उपभोक्ता संस्कृति में आकंठ डूबे इस वर्ग जिसमें युवा, बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सभी हैं, ने भी जून 21 यानि रविवार को सामूहिक रूप से यौगिक क्रियाएं की। लगा मानो पूरा देश योगमय हो गया है, वैसे ही, जैसे चार साल पहले अन्ना आन्दोलन में जन-भागीदारी को देखकर लगा अब देश में भ्रष्टïाचार नहीं रहेगा और अगर कोई भ्रष्टाचारी दिखा तो जनता की शून्य-सहिष्णुता उसे मरघट तक पहुंचा कर ही दम लेगी।
दूसरी ओर महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र के दूसरे सूत्र में ही योग की परिभाषा करते हुए कहा-‘योगश्च चित्तवृत्ति निरोध:’ यानि मन को चंचल होने से रोकना ही योग है। पहला सूत्र है-‘अथ योगानुशासनम’ यानि अब योग के अनुशासन के बारे में। तात्पर्य यह कि योग की शुरुआत ही अनुशासन से और मन की वृत्तियों को रोकने से होती है।
यह बात सही है कि आज से दो दशक पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि देश के सैकड़ों शहरी पार्क पटे पड़े होंगे युवा, बच्चे, बूढ़े योग करने वालों से। दुनिया के 192 देशों ने 21 जून, 2015 को पहला विश्व योग दिवस मनाया। यह दिन जन-चेतना का एक नया मुकाम हासिल कर चुका है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि योग को विश्व पटल पर मान्यता दिलाने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है।
यहां पर एक निरपेक्ष विश्लेषक के लिए तीन प्रश्न हैं। क्या यह जन-चेतना बनी रहेगी, क्या बाजारी ताकतें जो आदमी की सोच बदलने की सिद्ध क्षमता रखती हैं यह बर्दाश्त करेंगी कि व्यक्ति उपभोग की मशीन मात्र बने रहने की जगह एक ऐसी दुनिया में जाये जिसका प्रवेश द्वार ही ‘इन्द्रिय-निग्रह’ (इन्द्रियों के रुझान से बचने के प्रयास) की प्रतिज्ञा के साथ खुलता हो? किस भाव से प्रेरित हो कर ये लाखों लोग अल-सुबह आये थे और कब तक आयेंगे?
देश में कुल 18 करोड़ टी.वी. सेट हैं. साढ़े आठ लाख सेट्स हैं शहरों में और साढ़े नौ लाख गांवों में। नव-वैश्विक समाज में मध्यम वर्ग में किसी नयी अवधारणा की स्वीकार्यता तब ज्यादा तेज होती है जब टेलीविजन के जरिए उच्च वर्ग यानि कोई अमिताभ बच्चन, कोई किरण बेदी या कोई ऐश्वर्या राय और आजकल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस अवधारणा को अपना लेता है। योग को प्रचलित करने का भी वही नुस्खा है जो मैगी बेचने का। भूख जीत चुका मध्यम वर्ग मनोरंजन की नयी नयी अवधारणाओं को अंगीकार करता है और कुछ दिन के बाद फिर किसी नए प्रोडक्ट या किसी नयी अवधारणा पर चला जाता है। दिलीप कुमार की स्वीकार्यता साढ़े तीन दशक रही तो अमिताभ की ढाई दशक। आज के गाने या हीरो पांच साल से कम में जन-स्वीकार्यता से बाहर हो जाते हैं। सामूहिक जन-भावना अभिव्यक्त करने के लिए कैंडल मार्च यूरोपीय अवधारणा है पर निर्भया बलात्कार के बाद शहरी मध्यम वर्ग ने इसे स्वीकार कर लिया कम से कम तब तक जब तक कोई नया तरीका ऊपर से नहीं आता।
जहां एक ओर भारत सरकार धन्यवाद की पात्र है कि कम से कम योग ऐसी आत्मोत्थान क्रिया को जन-मानस तक लाई। एक सामूहिक चेतना पैदा हुई, लेकिन यह समाज की सोच का शाश्वत भाव हो यह मात्र एक दिन के राज्य-नीत राष्टï्र-व्यापी समारोह से नहीं होगा। उसी तरह जिस तरह मदर्स-डे, फादर्स-डे का असर कुछ घंटों का भी नहीं होता और ‘महिला दिवस’ या ‘वैलेंटाइन डे’ के दिन अंधेरे पार्कों में छेडख़ानियां और बलात्कार बढ़ जाते हैं। इसके लिए गैर-राज्यीय सामाजिक संस्थाएं विकसित करनी होंगी। इसे शिक्षा का भाग बनाना होगा उस शिक्षा का जो स्वस्थ व्यक्तित्व विकसित करने का साधन है और परिवार की संस्था और मां के गोद से ही इन्द्रिय निग्रह का पथ सिखाना होगा। अगर बाप शराब पी कर गाली-गलौच करेगा तो बेटा इन्द्रिय-निग्रह के कठिन मार्ग पर जाने की सोच भी नहीं सकता।
फिर एक ओर नव-धनाढ्य वर्ग या गांव से निकले नए सॉफ्टवेयर इंजीनियर को बाजार की ताकतें हर क्षण बता रही हैं कि जीवन उपभोग में है। ये बाजारी ताकतें इन युवाओं के भविष्य में होने वाले आय के आधार पर उपभोग कर्ज देने को तत्पर हैं। ‘पार्टी तो बनती है’ का जीवन-सार दिलो-दिमाग में बैठा कर। उस युवा दंपत्ति का लम्बी गाड़ी खरीदना, हर शाम फोन करके किसी फूड-चेन से खाना मंगवाना, मदर्स-डे पर गांव में बीमार मां को फोन करना जीवन का लक्ष्य हो जाता है। ऐसे में यह दंपत्ति हर माह (पति-पत्नी की आय) घर में पगार के रूप में आये एक लाख रुपये से इन्द्रिय-निग्रह सोचे और उसका दिन भर टीवी देखने वाला सात साल का बेटा अपने को अभावग्रत माने और कुंठा का शिकार हो जाए, यह संभव नहीं है। जून 21 को पार्क में आना भी टीवी में चले प्रचार का हीं कमाल है। किसी सोच-परिवर्तन का नहीं। योग करने और जिम जाने में अंतर है। बाजारू ताकतें सलमान के छह और आठ पैक छाती को दिखाती हैं न कि एक शांत, धीर , सुडौल शरीर वाले युवा को। आखिर उन्हें तथाकथित प्रोटीन वाले डिब्बे भी तो बेहद महंगे दाम पर बेचने हैं। पतंजलि ने तो कहीं नहीं लिखा है किस ब्रांड का प्रोटीन खाने से सीने के पैक्स बनेंगे। वह तो प्रकृति-प्रदत्त सामान्य-जीवन में ही उत्तम स्वास्थ्य के जरिये उत्कृष्ट मन की बात करते हैं। यह बाजार को कैसे रास आयेगा?

लिहाजा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो अपना काम कर दिया। अब जरूरत है समाज के समर्पित भाव वाले लोगों की जो नए मध्यम वर्ग की सोच बदलें और बताएं कि आत्म संतोष मैकडोनाल्ड के बर्गर से या बड़ी गाड़ी खरीदने की ललक से नहीं बल्कि अच्छे और स्वस्थ मन से आता है। योग उसी आत्मसंतोष का माध्यम है।

(लेखक, ब्रॉड कास्ट एडिटर एसोसिएशन के महासचिव हैं)

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