बाघा बॉर्डर.. यहां दिखता है खून के हर कतरे में देशभक्ति का जुनून

Captureभारत-पाक सीमा से संजय शर्मा की खास रिपोर्ट

पाकिस्तान की सीमा से सटे भारत के आखिरी गांव अटारी में जाये बिना आप इस रोमांच को महसूस नहीं कर सकते। बाघा बॉर्डर पर रोज होने वाली रिट्रीट सेरेमनी को देख कर देशभक्ति का जो जज्बा महसूस होता है, उसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। आजादी की सालगिरह के पहले की शाम जब पाकिस्तान की आजादी का जश्न मनाया जा रहा था, तब मैंने इस रोमांच को महसूस किया। सीमा के एक ओर हजारों लोग भारत माता की जय के नारे लगाते तो एक छोटे गेट के दूसरी तरफ बैठे हजारों लोग पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते। आप खुद को कितना भी रोकना चाहें पर रोक नहीं सकते और खुद-ब-खुद मुट्ठी बांध कर भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे लगाने पर मजबूर  हो जायेंगे। सब कुछ सपने सरीखा अमृतसर से 34 किलोमीटर दूर है देश का आखिरी गांव अटारी। जो हिंदुस्तान में है और एक गेट के बाद है बाघा गांव, जो पाकिस्तान में है। इसे अटारी बॉर्डर या बाघा बॉर्डर कहते हैं। यह भारत के अमृतसर और पाकिस्तान के लाहौर के बीच ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है। दोनों देशों के बीच थल मार्ग से सीमा पर करने वाला यही एकमात्र मार्ग है। यह अमृतसर से 32 और लाहौर से 22 किलोमीटर दूर है। हम यहां लगभग चार बजे पहुचे। सेरेमनी साढ़े छह बजे शुरू होती है। सोचा था थोड़ा पहले पहुंच कर आस-पास का जायजा लेंगे। मगर मेरे पहुंचने से पहले हजारों लोग पहुंच चुके थे। सुरक्षा बेहद कड़ी थी क्योंकि यहां पर आतंकवादी हमले का इनपुट था। 2014 में पाक इलाके में एक आत्मघाती आतंकी ने विस्फोट कर दिया था, जिसमें साठ लोग मारे गए थे। गर्मी भी बहुत थी। सेरेमनी शुरू होने से पहले ही सैकड़ों लोग वापस आते नजर आये। पता चला कि आजादी का जश्न मनाने इतने लोग आ गए हैं कि अंदर जगह ही नहीं बची है। यहां लगभग सात हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था है लेकिन यहां इस जश्न को देखने बीस हजार से ज्यादा लोग पहुंच चुके थे। इन लोगों को अंदाजा ही नहीं था कि यहां पहुंचने से पहले पास भी बनता है। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि वीआईपी पास वालों को भी धक्के खाने पड़ रहे थे। कर्नल अनिल चौहान ने मेरी मदद की और मैं स्टेडियम में अंदर जा पाया।
स्टेडियम में थोड़ा अंदर जाते ही एक ओर छह फुट से भी ज्यादा लंबे हमारे सैनिक अपने पैरों को सर से ऊपर ले जाने की कोशिश कर रहे थे और इतनी ही लंबी दो लड़कियां भी यही कोशिश कर रही थीं। स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था। सामने ही एक छोटा गेट लगा हुआ था, जिसके दूसरी तरफ भी ऐसा ही स्टेडियम बना था, जिसमें पाकिस्तान के नागरिक थे और वो भी खचाखच भरा हुआ था। सेरेमनी शुरू होने से पहले ही दोनों तरफ से अपने-अपने देश के समर्थन में नारे लगने शुरू हो गए थे। कुछ उत्साही महिलायें और बच्चे मुख्य सडक़ पर आकर देशभक्ति के गानों पर डांस भी करने लगे।
सेरेमनी शुरू होने के बाद का नजारा रोमांच से भरने वाला था। गेट से लगभग 200 फीट की दूरी पर खड़े सैनिक दो-दो के क्रम में आते। अपने गेट पर पाक की तरफ अपने सर से भी ऊपर पैर उठाते..अपनी भुजायें दिखाते और मानो ललकारते हुए कहते-यह देश हमारी मां है, गलती से भी इसकी तरफ आंख उठाकर मत देखना।
जब बेहद सुन्दर दिखने वाली हमारी दोनों बहादुर लड़कियां आईं तो पूरा स्टेडियम तालियों से गूंज उठा..लग ही नहीं रहा था कि यह चल कर आई है बल्कि लग रहा था यह जमीन से ऊपर तैर कर गेट तक पहुंची है। यह क्रम लगभग बीस मिनट चला। अलग-अलग क्रम में सैनिकों ने गेट पर जाकर पाकिस्तान को चुनौती देने के अंदाज में प्रदर्शन किया और फिर अपने अफसरों को सलामी दी। बीच-बीच में हम सब भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारों से इन बहादुर सैनिकों का हौसला बढ़ाते रहे। लगभग यही क्रम गेट के दूसरी तरफ पाकिस्तान की तरफ से भी चलता रहा। इस सेरेमनी के बाद दोनों गेट खोले गए और दोनों देश के लोगों ने पूरे जोश के साथ अपने-अपने राष्ट्रीय ध्वज उतारे और इसके साथ ही सेरेमनी का कार्यक्रम खत्म हुआ। इस कार्यक्रम में कई बॉलीवुड के सितारों के अलावा राजनेता भी मौजूद थे, जो आजादी की सालगिरह से पहले की इस खूबसूरत शाम को अपनी आंखों में बसाना चाहते थे। सेरेमनी के बाद मैं गौर से पाक की तरफ देख रहा था। वहां एक मचान पर खड़े लोगो ने हाथ हिलाया…उनके हाथ के कैमरे देख कर लग रहा था, वो पत्रकार होंगे ..मैंने भी हाथ हिलाया तो उन्होंने फ्लाइंग किस दी और हाथ जोडक़र नमस्ते किए, उनके अभिवादन से ऐसा लग रहा था कि जैसे कह रहे हों कि अब यह नफरत का कारोबार किसी तरह बंद हो। सामने हमारे देश के बहादुर हाथ में आधुनिक हथियार लिए खड़े थे और मुश्किल से दस फीट की दूरी पर पकिस्तान के सिपाही के हाथ में भी ऐसे ही हथियार थे, उनके बीच में बस कुछ कटीले तार थे। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे और हम उनको। इससे पहले पाकिस्तान की सेना के अफसरों ने बीएसएफ के अफसरों को अपने देश की आजादी की सालगिरह के मौके पर मिठाइयां भी भेंट की। यह अच्छा सिलसिला लगातार चल रहा है। पंद्रह अगस्त को हमारे आफिसर्स भी उन्हें मिठाई देते है।
आजादी के बाद बदला बाघा बॉर्डर का नजारा
बाघा बॉर्डर आजादी के बाद बहुत बदल गया है। जब भारत और पाकिस्तान अलग हुए तो अटारी गांव भारत में रह गया और उससे मिला हुआ बाघा गांव पाकिस्तान में। 1949 में यहां एक छोटा गेट लगा दिया गया और 1958 में यहां एक छोटी सी पुलिस चौकी बना दी गई जो अब भी है। 1965 में बीएसएफ की स्थापना के बाद यह चौकी उसे सौंप दी गई और वही लोग उसकी देखभाल करते है। 1965 में ही रिट्रीट कार्यक्रम शुरू कर दिया गया और धीरे-धीरे इसको भव्य रूप दिया जाता रहा। जब लोग यहां ज्यादा संख्या में आने लगे तो 1990 में इस गेट को और बड़ा किया गया। जिस समय पंजाब में आतंकवाद फैलना शुरू हुआ और पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ बढ़ी तो इस पूरे इलाके में कटीले तारों की फैंसिंग कर दी गई । 2001 में लोगों के बैठने के लिए स्टेडियम बनाया गया, पर यहां जुटने वाली भीड़ के हिसाब से छोटा पडऩे लगा। इसलिए 2015 से इसका विस्तार शुरू किया गया, जिससे बीस हजार लोग यहां बैठ सकें। जब आप सेरेमनी से वापस आयेंगे, तो वेलकम इंडिया लिखा हुआ बोर्ड आपका स्वागत करता हुआ नजर आएगा, जिसको देख कर आपको ख़ुशी का अनुभव होगा। थोड़ा आगे ही एक छोटा सा पर बहुत सुन्दर मंदिर है। अगर आप कभी नहीं गए तो एक बार बाघा बॉर्डर जरूर जाइये और देखिये आपके खून का हर एक कतरा आजादी को कैसे महसूस करेगा।

Pin It