बांग्लादेश पर चीन की मेहरबानी के मायने

तीस सालों बाद अचानक बांग्लादेश चीन के लिए अहम कैसे हो गया? दरअसल, बांग्लादेश को आर्थिक मदद देकर चीन ने अपने पत्ते फिर से फेंटने शुरू कर दिए हैं। वह दक्षिण एशिया में अपने प्रतिद्वंद्वी भारत को हल्के में नहीं लेना चाहता है। आतंकवाद के मुद्दे पर जिस प्रकार भारत ने पाक को अलग-थलग कर दिया है, उससे चीन बेहद चिंतित है।

sanjay sharma editor5ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत करने से पूर्व चीन ने भारत को घेरने के लिए एक और चाल चली है। चीन के राष्ट्रपति शीजिनपिंग बांग्लादेश पहुंच चुके हैं। यहां वे 24 बिलियन डॉलर के करार पर हस्ताक्षर करेंगे। इस धनराशि से बांग्लादेश में ऊर्जा संयंत्र और बंदरगाह स्थापित करने समेत कई परियोजनाओं पर काम किया जाएगा। बांग्लादेश को मिलने वाली यह अब तक की सबसे बड़ी विदेशी सहायता है। यह भारत द्वारा बांग्लादेश में निवेश की गई दो बिलियन डॉलर से बारह गुना अधिक है। सवाल यह है कि ड्रैगन अचानक बांग्लादेश पर इतना मेहरबान क्यों हो गया? क्या इसके जरिए वह दक्षिण एशिया में अपना दबदबा कायम करना चाहता? तीस सालों बाद अचानक बांग्लादेश चीन के लिए अहम कैसे हो गया? दरअसल, बांग्लादेश को आर्थिक मदद देकर चीन ने अपने पत्ते फिर से फेंटने शुरू कर दिए हैं। वह दक्षिण एशिया में अपने प्रतिद्वंद्वी भारत को हल्के में नहीं लेना चाहता है। आतंकवाद के मुद्दे पर जिस प्रकार भारत ने पाक को अलग-थलग कर दिया है, उससे चीन बेहद चिंतित है। इस मामले में वह विश्व बिरादरी का कोपभाजन न बन जाए उसने अपने प्रिय मित्र पाकिस्तान का साथ नहीं दिया। इसके अलावा चीन को हाल में नेपाल ने बड़ा झटका दिया है। भारत यात्रा पर आए नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड ने यह कहकर कि नेपाल और भारत के भाग्य एक दूसरे से जुड़े हैं, चीन की चिंता बढ़ा दी है। उस समय चीन की सरकारी मीडिया ने इसका विरोध किया था और नेपाल को चेतावनी भी दी थी। चीनी मीडिया ने कहा था कि जब जरूरत थी तो नेपाल चीन के पास आया और अब भारत के पास पहुंचकर पलट गया। बतातें चलें कि चीन ने नेपाल को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। वहां की वामपंथी पाटिर्यों को भारत के खिलाफ चीन हमेशा भडक़ाता रहा है। नेपाल में संविधान को लेकर जब मधेसी आंदोलन शुरू हुआ तो चीन ने इस बात को हवा दी कि यह आंदोलन भारत के इशारे पर किया जा रहा है। कुल मिलाकर ड्रैगन की यह नीति बांग्लादेश से न केवल अपने संबंधों बल्कि भारत के खिलाफ अपनी कूटनीतिक स्थिति भी मजबूत करने से प्रेरित है। कहना न होगा कि चीनी राष्ट्रपति ऐसे समय बांग्लादेश की यात्रा पर है जब भारत अपने पड़ोसी देशों श्रीलंका, नेपाल तथा बांग्लादेश से संबंध मजबूत करने का लगातार प्रयास कर रहा है। चीन के इन प्रयत्नों पर भारत को पैनी नजर रखनी होगी वरना बांग्लादेश में नेपाल का इतिहास भी दोहराया जा सकता है।

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