बहुत खास है अपना बड़ा मंगल

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

Captureलखनऊ को यू ही गंगा-जमुनी तहजीब का मरकज नहीं कहा जता। यहंा तक पहुंचने के लिए लखनऊ ने अपने आप को प्रूव किया है तब जाकर पूरी दुनिया में आपसी भाई चारे का डंका लखनऊ से बजता है। हुसैनी सबील लगती हो तो हिंदू आते हैं और बड़े मंगल पर लगने वाले लंगर लगते हैं तो मुस्लिम अपना योगदान देने से पीछे नहीं रहते। बात जब लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब की हो तो अलीगंज के हनुमान मंदिर की चर्चा आवश्यक हो जाती है।
लखनऊ में बड़े मंगल के आयोजन में हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई आदि सभी धर्मों के लोग-बढ़-चढक़र हिस्सा लेते हैं। मान्यता है कि इस कल्चर की शुरुआत आज से लगभग चार सौ वर्ष पहले मुगल शासकों द्वारा की गयी थी। नवाब मोहम्मद अली शाह का बेटा एक बार गंभीर रूप से बीमार हुआ। उनकी बेगम रूबिया ने अपने बेटे का कई जगह इलाज कराया लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। बेटे की सलामती की मन्नत मांगने वह अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर आयी। पुजारी ने बेटे को मंदिर में ही छोड़ देने को कहा। बेगम रूबिया रात में बेटे को मंदिर में ही छोड़ गयीं। दूसरे दिन रूबिया को बेटा पूरी तरह स्वस्थ मिला। तब रूबिया ने इस पुराने हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। उस समय लगाया गया प्रतीक चांदतारा का चिन्ह आज भी मंदिर के गुंबद पर चमक रहा है। मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ ही मुगल शासक ने उस समय ज्येष्ठ माह में पडऩे वाले मंगल को पूरे शहर में गुड़ धनिया (भुने हुए गेहूं में गुड़ मिलाकर बनाया जाने वाला प्रसाद) बंटवाया और प्याऊ लगवाये। तभी से इस बडे मंगल के पर्व की नींव पड़ी।
बड़ा मंगल मनाने के पीछे एक और कहानी है। नवाब शुजा-उद-दौला की दूसरी पत्नी जनाब-ए-आलिया को ख्वाब में दिखा कि उन्हें हनुमान मंदिर का निर्माण कराना है। ख्वाब में मिले आदेश को पूरा करने के लिये आलिया ने हनुमान जी की मूर्ति मंगवाई। हनुमान जी की मूर्ति हाथी पर लाई जा रही थी। मूर्ति को लेकर आता हुआ हाथी अलीगंज के एक स्थान पर बैठ गया और फिर उस स्थान से नहीं उठा। आलिया ने उसी स्थान पर मंदिर बनवाना शरू कर दिया जो आज नया हनुमान मंदिर कहा जाता है। मंदिर का निर्माण ज्येष्ठ महीने में पूरा हुआ। मंदिर बनने पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करायी गयी और बड़ा भंडारा हुआ। तभी से जेठ महीने का हर मंगलवार बड़ा मंगल के रूप में मनाने की परम्परा चल पड़ी। चार सौ साल पुरानी इस परंपरा ने इतना वृहद रूप ले लिया है कि अब पूरे लखनऊ के हर चौराहे व हर गली पर भंडारा चलता है। जिसमें लखनऊ भर के लोग शामिल होते हैं।

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