बहन की मौत से आहत अल्पना ने शुरू की महिलाओं के हक की लड़ाई

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। अपने ही मर्द के हाथों जलती हुई औरत, मोम की तरह पिघलती हुई औरत, कब आयेगा वो समय जब दिखेगी बदलती हुई औरत। यह पक्तियां डॉ. अल्पना बाजपेयी ने उस समय लिखी जब उन्हें अपनी बड़ी बहन को दहेज की आग में झुलसा हुआ देखा। यह चंद पक्तियां औरतों के हालात बयान कर देती हैं। डॉ. अल्पना पेशे से शिक्षिका हैं लेकिन समाज सेवा का जल्वा ही है कि ऐसी दबी कुचली औरतों के हक मे खड़ी दिखती हैं।
अपनी बहन की मौत से आहत डॉ. अल्पना ने नारी शक्ति संस्था की स्थापना की और महिलाओं के हक की लड़ाई शुरू की। उसी कड़ी में संस्था की तरफ से महिलाओं को समर्पित अल्कांचल नामक पत्रिका का विमोचन किया गया। इस संबंध में सवाल करने पर उन्होंने बताया कि पत्रिका की शुरूआत के पीछे ऐसी कई कहानियां जुड़ी है।

हर ऐसी लडक़ी में नजर आती है बहन
6 अगस्त 1988 एक ऐसा दिन था जिसने हम सब को एक बड़ा सदमा दिया था। मेरी बड़ी बहन अल्का को दहेज के भूखे उसके ससुराल वालों ने जिंदा जला दिया। जिस दर्द से तड़प कर उसकी मौत हुई वह आज तक मैं और मेरा परिवार नहीं भूल पाए हैं। न्याय के लिए हम लोगों को सडक़ों पर भटकना पड़ा। उसके बाद हर उस लडक़ी को न्याय दिलाने के लिए हम लोग जुट गए जो दहेज व घरेलू हिंस से पीडि़त थी। उनकी मदद कर लगता था कि मैंने अपनी बहन की मदद की।

नारी शक्ति संस्था का गठन भी उसी समय हुआ
मेरी बहन महिला कॉलेज से बीए पास कर चुकी थी। जब उसकी शादी एक आर्मी घराने में हुई थी। इस हादसे के बाद हम और उनके कॉलेज की आठ लड़कियों ने उन्हें न्याय दिलाने का बीडा उठाया। मृत्यु की लड़ाई लडऩे के लिए हम लोगों ने इसे नारी शक्ति संस्था का नाम दिया।

ऐसी महिलाओं का बनें सहारा
मेरी दिली इच्छा है कि मैं अपनों से सताई पीडि़त महिलाओं का सहारा बनंू। एक सपना है कि यदि भविष्य में आर्थिक रूप से इतनी मजबूत हुई तो ऐसी महिलाओं के लिए एक बड़ा हॉस्पिटल का निर्माण कराऊंगी जहां महिलाओं को मुफ्त उच्चस्तर का इलाज मिल सके, और दूसरा एक ऐसा सामाजिक संरक्षण गृह बनाऊ जहां उन्हें अपने परिवार जैसा प्यार और सम्मान मिले। समाज में ऐसे कई आश्रय है लेकिन वहां कि स्थिति दैयनीय है। यदि कोई महिला अपने पति व परिवार से तंग हो कर वहां जाती है। तो वहां की भयावह स्थिति देख मजबूरन वापस उसी नरक में लौट जाती है।

लोग जुड़ते गए कारवां बनता गया
हम लोगों ने अपने संघर्ष की शुरुआत सात से आठ लड़कियों के साथ शुरू की थी। लोग हमसे जुड़ते गए। तब से अब तक हम लोगों ने कई ऐसे काम किए हैं जिसे याद कर आत्म संतुष्टिï मिलती है। अब तक हम लोग करीब सात सौ से अधिक महिलाओं को न्याय दिला चुके हैं। 28 साल से हम और हमारी संस्था के लोग इनसे जुड़े हैं।

इन राजनीतिक पार्टियों से दुखी: हूं
जो महिलाएं समाज के हित में काम करती हैं उन्हें राजनीतिक पार्टियां सपोर्ट नहीं करतीं लेकिन यह राजनीतिक पार्टियां महिलाओं के मुद्दे पर बातें खूब करती हैं पर काम कोई नहीं करता।

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