बयानों से कांग्रेस ने अपनी मानसिकता का परिचय दिया

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का दावा है कि वे किसी से नहीं डरतीं क्योंकि ‘वे इंदिरा गांधी की बहू हैं’। किसी कवि ने अंधेरे में चलने वाले राहगीर को परामर्श दिया है ‘डर लगे तो गाना गाओ’। ज्यादातर लोग ऐसा अवसर आने पर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगते हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि आरएसएस के लोगों ने उन्हें मंदिर में प्रवेश से रोका। लोकसभा में इसे और राज्य सभा में केरल के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के एक कार्यक्रम में निमंत्रित न किए जाने का आरोप प्रधानमंत्री पर मढक़र किए जा रहे हंगामे से एक बात बहुत स्पष्ट है कि कांग्रेस अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के भयभीत होने को प्रचारित कर रही है। जबकि दोनों ही आरोप तथ्यहीन पाए गए।
सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस ने ऐसे अवसर पर हुड़दंग मचाने का एक और विकल्प प्राप्त कर लिया है। हुड़दंग के स्वरूप की कुरूपता को इतना बढ़ा दिया है कि उसके सांसद सदन में अध्यक्ष की पीठ के सामने खड़े होकर नारेबाजी करने, पीठ पर कागज के गोले फेंकने से भी आगे बढक़र खेल प्रतियोगिताओं में जैसे विपक्षी को हतोत्साहित करने के लिए सामूहिक रूप से मुंह पर हाथ का गोला बनाकर आवाज निकाली जाती है, वैसी आवाज जिसे ‘हूटिंग’ कहा जाता है, का प्रदर्शन कर अमर्यादित आचरण को नया आयाम प्रदान किया है। वह भी क्यों? क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट ने सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी समेत अन्य कई कांग्रेसियों को घोटाले के एक मामले में अदालत में न हाजिर होने की दलील को अस्वीकार कर दिया। सोनिया गांधी ने तो किसी से न डरने की बात कहकर अदालत में हाजिर होने से भयभीत होने की मानसिकता जाहिर ही कर दी। उनके सुयोग्य पुत्र ने तो अदालती आदेश को प्रधानमंत्री कार्यालय की साजिश कहकर विक्षिप्त मानसिकता तक का परिचय दे डाला। उनकी पार्टी में बहुत से धुरंधर कानूनविद हैं, उन सभी ने मिलकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी की उसके बावजूद वे नेशनल हेराल्ड वाद में अदालती कार्यवाही रोक पाने में असफल रहे।
सोनिया गांधी जिस सास की बहू होने का दावा करती हैं उसी की मानसिकता के अनुरूप अदालती आदेश को ‘जनता की आवाज’ से चुनौती देने पर उतारू हो गई हैं। यह देश का सौभाग्य है कि इंदिरा गांधी की तरह सोनिया गांधी के हाथ में देश की सत्ता नहीं है अन्यथा चालीस साल के अंतराल पर सत्ता में बने रहने के लिए एक और आपात स्थिति का दौर चल पड़ता जो संविधान को दरकिनार कर सभी प्रकार के नागरिक अधिकारों को गला घोट देता। सोनिया गांधी की स्वेच्छाचारिता और असहिष्णुतावृत्ति के बारे में यदि किसी को संदेह था तो उसे शरद पवार की पुस्तक ने दूर कर दिया होगा।
राहुल गांधी के बार-बार यह दोहराने के बाद कि नेशनल हेराल्ड का वाद प्रधानमंत्री कार्यालय की साजिश है और इसका विरोध हम हर स्थान पर (मतलब संसद और सडक़ पर) करेंगे, कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने यह अभियान चला दिया कि संसद की कार्यवाही ठप्प करने का अदालती केस से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसके लिए कतिपय केंद्रीय मंत्रियों और कुछ मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आरोपों के बाद उनकों पद से न हटाया जाना और कुछ कांग्रेसियों को सताया जाना है। इस प्रकार की दलील तो कोई नौसिखुआ वकील भी नहीं देता है क्योंकि अब संसद को ठप्प करने के जो कारण बताये जा रहे हैं, वे दिल्ली उच्च न्यायालय के अदालत में हाजिर होने का आदेश देने के काफी पहले से मौजूद थे। संसद उसके पहले सुचारू रूप से चल रही थी और अनेक लंबित विधेयकों को पारित करने पर सहमति भी बन चुकी थी। लेकिन जैसे ही न्यायालय का निर्देश आया, संसद और सडक़ पर हुड़दंग शुरू हो गई। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी का निर्वाचन अवैध घोषित किए जाने पर देशभर की राजधानियों में प्रदर्शन आयोजित किए गए, यह नारा लगाया गया कि जिस लाखों लोगों ने चुना जो करोड़ों की प्रधानमंत्री है उसे ‘एक व्यक्ति’ कैसे पद से हटा सकता है। जिस तथ्य पर न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन अवैध घोषित किया था, उस मुद्दे को पिछली तिथि से न केवल संशोधित कर इंदिरा गांधी के निर्वाचन से सर्वोच्च न्यायालय से ‘वैध’ करवा लिया गया बल्कि क्षोभ पर काबू पाने के लिए आपात स्थिति लगा दी गई। सोनिया गांधी यदि सत्ता में होती तो शायद फिर वैसा ही होता।
नेहरू गांधी परिवार अपने को कानून से ऊपर मानता है। राहुल गांधी आजकल भले ही यह कहते घूम रहे हों कि वे गरीबों के साथ हैं व किसानों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों आदि की लड़ाई लड़ेंगे लेकिन नेहरू गांधी परिवार आम आदमी के साथ ही नहीं तो मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों यहां तक कि प्रधानमंत्री को किसी अदालती जांच का पात्र कैसे बनाया जा सकता है। लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व अकल्पनीय हार के बावजूद सोनिया गांधी का पद पर बने रहना, जिस पर अ_ारह वर्ष से हैं और कांग्रेस में राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने का कीर्तन जारी रहना इस बात का सबूत है कि नेहरू इंदिरा ही नहीं राजीव गांधी की भी कांग्रेस मर चुकी है। सोनिया गांधी ने अपने 18 साल के अध्यक्षीय कार्यकाल में दस वर्ष तक आज्ञाकारी प्रधानमंत्री से हुकुमत चलवाने के बाद भी उसे लोकसभा में कुल चौव्वालीस सीटों में समेटकर जो संकेत दिया है उसके बावजूद ‘रस्सी जल गई पर ऐंठन बाकी’ है वाली कहावत दोहरायी जा रही है।

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