बदहाल व्यवस्था के भरोसे स्मार्ट सिटी में शामिल होने की ख्वाहिश

कूड़ा निस्तारण, पेयजल, जल भराव समेत कई मुद्दों पर नगर निगम की लापरवाही उजागर

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ । राजधानी की जनता पीने के साफ पानी, जन शिकायतों के निस्तारण में लापरवाही, ऑनलाइन प्रमाण पत्र बनवाने और कूड़ा निस्तारण में लापरवाही की समस्या से जॅझ रही है। इसका निस्तारण करने की बजाय विभागीय अधिकारी लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए कागजी महल खड़े करने में व्यस्त हैं। ऐसे में लखनऊ का नाम सरकार की तरफ से जारी होने वाली स्मार्ट सिटी की अगली लिस्ट में शामिल हो पायेगा। इस पर संदेह लगने लगा है।
शहर के 40 प्रतिशत मोहल्लों में पीने के पानी की भयंकर समस्या है। करीब 80 प्रतिशत मोहल्लों में सप्लाई के माध्यम से आने वाला पानी पीने योग्य नहीं है। इसकी वजह पानी का गंदा होना और पीने वाले पानी में क्लोरीन की अधिक मात्रा मिले होने की वजह से आने वाली बदबू है। जिसके कारण सप्लाई वाले पानी को पीना मुश्किल हो गया है। नगरीय क्षेत्र में गंदे पानी की सबसे अधिक समस्या खदरा, चौक, हुसैनगंज, यहियागंज, उदयगंज, इन्दिरानगर, नाका, राजाजीपुरम, आलमबाग, श्रीनगर, चित्रगुप्त नगर, मानक नगर, सुजानपुरा, विजय नगर, कृष्णानगर, प्रेम नगर, रश्मिखंड, चारबाग, ऐशबाग, हसनगंज, हुसैनाबाद, वजीरगंज समेत कई मोहल्लों में है। यहां के लोग समय-समय पर जोनल अधिकारियों, जल कल विभाग के अधिकारियों और नगर आयुक्त तक से गंदे पानी की समस्या का समाधान करवाने की शिकायतें कर चुके हैं। नगर निगम के सदन में गंदे पानी और पीने के पानी की भयंकर किल्लत का मामला उठाया जा चुका है। इसके बावजूद स्वच्छ पानी की आपूर्ति और लोगों को आसानी से पीने का पानी उपलब्ध हो पाने की उम्मीद कम ही लग रही है। जबकि महापौर ने 1 मार्च से 31 मई तक पीने के पानी की कनेक् शन देने और पेयजल की जांच करवाने का जल संस्थान के अधिकारियों को निर्देश दिया था लेकिन हकीकत में पेयजल से जुड़ा कोई भी काम मोहल्लों में होता नहीं दिख रहा है। नतीजतन लोग गंदे पानी की वजह से पेट संबंधी बीमारियों और त्वचा संबंधी बीमारियों के अलाया अन्य कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों के शिकार बन रहे हैं।

कूड़ा निस्तारण का बुरा हाल
नगरीय क्षेत्र में कूड़ा निस्तारण का बुरा हाल है। शहर के 110 वार्डों में से 54 वार्डों में कूड़ा निस्तारण का काम ज्योति इन्वायरोटेक कंपनी को सौंपा गया है। जिला प्रशासन के मुताबिक इस कंपनी के चारों प्लांट बनकर तैयार हैं, यहां रोजाना कूड़ा डम्प किया जाता है लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। जिन 54 वार्डों में कंपनी ने कूड़ा उठाने का काम लिया है, वहां कंपनी के मजदूर सप्ताह में दो या तीन दिन ही कूड़ा उठाने आते हैं। शहर की प्रमुख सडक़ों पर कूड़ों का ढेर पड़ा रहता है। जो भी कूड़ा घर बने हुए हैं, वहां कई दिनों तक कूड़ा घर के अंदर और बाहर कूड़ा पड़ा रहता है। इस वजह से रास्ते से आने-जाने वालों को बदबू की समस्या से दो चार होना पड़ता है। कूड़े को उठाने का समय भले ही निर्धारित हो लेकिन समय से कूड़ा उठाने का काम नहीं होता है। वीआईपी इलाकों को छोडक़र कहीं भी कूड़ा डालने के लिए डस्टबिन रखा दिखाई नहीं देता है। जिन इलाकों में नगर निगम के कर्मचारी कूड़ा उठाने का काम करते हैं। वहां कूड़ा उठाकर क्षेत्र में खाली पड़े स्थान पर डाल दिया जाता है। इसके बाद नगर निगम की गाडिय़ां अपनी सुविधा के अनुसार कूड़ा उठाती हैं। इस बात का खुलासा समय-समय पर नगर आयुक्त और महापौर के निरीक्षण में भी हो चुका है। शहर में नालियां चोक हैं। नालियों की सफाई के लिए लगातार पार्षदों की तरफ से सफाई की मांग की जा रही है। इन सबसे बावजूद शहर की जनता की बेहतरी से जुड़े काम लंबित पड़े हुए हैं। हर बार बजट नहीं आने या संसाधनों की कमी की बात कहकर मामले को लंबित कामों की सूची में डाल दिया जाता है।
इसके अलावा सडक़ों पर अतिक्रमण, बाजारों में तारों के मकडज़ाल, पार्किंग और जाम की समस्या भी है। जिसका निस्तारण करने में संबंधित विभागों के अधिकारी नाकाम साबित हो रहे हैं। आलम ये है कि लखनऊ को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए भेजे जाने वाले प्रस्ताव के करार के प्रति कुछ विभागों के अधिकारी गंभीर नहीं है। इन्हें करार के जल्द साइन होने की बजाय इस बात की खुशी है कि सरकार ने प्रस्ताव बनाकर जमा करने की तिथि 25 मार्च कर दी है। इसलिए हम इत्मीनान से करार पर साइन करके भेजेंगे। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहर को स्मार्ट सिटी की लिस्ट में शामिल कराने की ख्वाहिश पूरा करने में अधिकारी कितनी शिद्दत के साथ लगे हैं।

ऑनलाइन व्यवस्था भी फेल
जिले में आन लाइन प्रमाण पत्र बनवाने की तीन प्रकार की व्यवस्था लागू है। इसके बावजूद लोगों को जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए 10-15 दिन तक भटकना पड़ रहा है। नगर निगम के अधिकारी कभी संसाधनों का रोना रोते हैं, तो कभी सर्वर सही के काम नहीं करने की बात कहते हैं, कुल मिलाकर आम जनता को 24 घंटे के अंदर जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र देने का आदेश हवा-हवाई साबित हो रहा है। जबकि 31 मार्च को तिलक हाल में आयोजित नगर निगम के सदन में महापौर ने नगर स्वास्थ्य अधिकारी पीके सिंह को तीन दिन के अंदर आन लाइन प्रमाण पत्र बनवाने में हो रहे विलंब की समस्या को दूर करने का आदेश दिया था। इसमें नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने उसी दिन से केवल सीआरएस सिस्टम से जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने की सुविधा उपलब्ध करवाने का भरोसा दिलाया था लेकिन वह भी फेल है। राजधानी में अभी भी ई डिस्ट्रिक व ई नगरीय सुविधा से जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के आवेदन पत्र स्वीकार किये जा रहे हैं। इसी प्रकार स्मार्ट सिटी के मानकों में शामिल सफाई कर्मियों की ऑनलाइन उपस्थिति का भी प्रबंध नहीं है। यहां सफाई मजदूर अपनी मर्जी के मालिक हैं। शहर में जगह-जगह कूड़ों का ढेर पड़ रहता है। सफाई कर्मचारी अपनी सुविधा के अनुसार सफाई और कूड़ा उठाते हैं। इनकी शिकायत पर भी जल्दी सुनवाई नहीं होती है। आलम ये है कि नगर निगम के कंट्रोल रूम नंबर पर शिकायतकर्ताओं के साथ अभद्रता की शिकायत निगम के सदन में की जा चुकी है। इसको गंभीरता से लेकर महापौर ने 24 घंटे की हेल्पलाइन सेवा शुरू करने और एक मोबाइल नंबर 9415607789 को हेल्प लाइन नंबर बनाने का आदेश दिया था। लेकिन अब तक हेल्प लाइन नंबर शुरू नहीं हो पाया।

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