बदहाल न्याय व्यवस्था केआंसू

न्यायमूर्ति ठाकुर का दर्द आसानी से समझा जा सकता है। पर मुकदमों का बोझ कम करने के लिए दूसरे सुधार भी जरूरी हैं। मसलन, अगर प्रशासन लोगों की समस्याओं तथा शिकायतों के प्रति अधिक संवेदनशील और पर्याप्त जवाबदेह हो तो अदालत की शरण में जाने के वाकये बहुत कम हो जाएंगे।

sanjay sharma editor5देश में न्याय व्यवस्था की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। लेकिन यह मुद्दा अब चर्चा में आया है। जजों की कमी का मुद््दा हमारे न्याय व्यवस्था को कमजोर करता रहा है। इससे पहले भी कई मुख्य न्यायाधीशों ने इस तरफ देश और सरकार का ध्यान खींचा था। जजों की कमी का रोना रोते हुए प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर के आंसू निकल आए। न्यायाधीश ठाकुर मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन को रविवार को संबोधित कर रहे थे। जजों की संख्या बढ़ाने को लेकर उन्होंने सरकार की निष्क्रियता पर भी अफसोस जाहिर किया। इससे न्याय व्यवस्था का मामला एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गया।
न्यायाधीश ठाकुर ने कहा कि आप न्यायपालिका पर सारा बोझ नहीं डाल सकते। उन्होंने न्यायालय और न्यायाधीश से जुड़े मुद्दे पर सरकार की संवेदनहीनता पर सवाल खड़े किए। मौजूदा समय में देश में कुल लंबित मामलों की तादाद दो करोड़ अठारह लाख से भी अधिक है। इनमें से बाईस लाख सत्तावन हजार मामले दस साल से ज्यादा वक्त के हैं। इन आंकड़ों से हमारे न्यायतंत्र की हालत आसानी से समझी जा सकती है। देश में जजों की तादाद आबादी के अनुपात में बहुतकम है। देश की अदालतों पर मुकदमों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया में इस तरह के हालात कहीं और नहीं है। हमारे न्यायालयों के लिए तारीख पर तारीख के डॉयलाग भी बोले जाते रहे हैं। इतना ही नहीं कई कैदी तो न्याय के इंतजार में पूरा जीवन ही गुजार देते हैं।
ऐसे में न्यायमूर्ति ठाकुर का दर्द आसानी से समझा जा सकता है। पर मुकदमों का बोझ कम करने के लिए दूसरे सुधार भी जरूरी हैं। मसलन, अगर प्रशासन लोगों की समस्याओं तथा शिकायतों के प्रति अधिक संवेदनशील और पर्याप्त जवाबदेह हो तो अदालत की शरण में जाने के वाकये बहुत कम हो जाएंगे। मुकदमों की एक बड़ी संख्या जमीन के झगड़ों से संबंधित होती है। भूमि संबंधी रिकार्ड दुरुस्त करके सरकार अदालती मामलों में कमी ला सकती है। बेहतर होगा हमारी सरकार न्यायाधीश के उठाए गए बिंदुओं पर एक सकारात्मक रूख अख्तियार करे। जिससे देश की न्याय व्यवस्था में बदलाव की आशा पैदा की जा सके। लोकतंत्र के लिए यह एक बेहतर कदम होगा।

Pin It