बढ़ रही बच्चों से अभिभावक की दूरी

बच्चों को गैजेट्स से दूर रहने की देते है नसीहत और खुद लगे रहते हैं अभिभावक
अनजाने में बच्चे को अनदेखा या अनसुना करने का ज्यादातर अभिभावकों को नहीं एहसास

Captureप्रीति सिंह
लखनऊ। सोशल नेटवर्किंग साइट से कुछ फायदे हैं तो उसके कुछ नुकसान भी हैं। जहां कुछ रिश्तों को जोडऩे का काम सोशल नेटवर्किंग साइट कर रही है तो वहीं जीवन के सबसे अजीज रिश्तों से दूरी बढ़ाने का काम कर रही है। हम बच्चों को मोबाइल व कम्प्यूटर के ज्यादा इस्तेमाल करने पर पाबंदी लगाते है और उन्हें नसीहत भी देते कि नुकसान करता है। घर में अपने लाडली या लाडले को टीवी देखने और वीडियो गेम खेलने का समय तो निर्धारित कर देते है पर जब अपने पर बात आती है तो हम सारी नसीहते भूल जाते है। अभिभावकों पर मोबाइल, गैजेट्स के उपयोग के कोई नियम-कायदे लागू नहीं होते। हाल ही में एक शोध में यह बात सामने आई है कि सोशल मीडिया की वजह से अपने ही बच्चों से दूरी बढ़ा रही है।
शिल्पी बैंक कर्मचारी है। पति बिजनेस मैन। दोनों की सोशल लाइफ है और सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहते है। शिल्पी की बेटी मानवी क्लास 3 में पढ़ती है। शिल्पी फेशबुक और व्हाट्सएप पर काफी सक्रिय है। सोशल मीडिया के माध्यम से दोस्तों, रिश्तेदारों के करीब आ गई पर इस बीच बेटी से कब दूरी बन गयी पता ही नहीं चला। स्कूल से टीचर की काल आयी तो पता चला कि आस्था बहुत गुमशुम रहती है। आस्था ने अपनी टीचर को कारण बताया कि मम्मा-पापा दोनों फोन पर लगे रहते है। मुझे वीडियो गेम खेलने नहीं देते और खुद घंटों लगे रहते है। मुझे टाइम ही नहीं देते। कुछ बोलती हूं तो कहते है डिस्टर्ब मत करो। ऐसा सिर्फ आस्था के साथ ही नहीं है। अधिकांश बच्चों की यही शिकायत है कि मम्मी-पापा तो खुद फोन या लैपटाप पर लगे रहते है और हमसे ठीक से बात भी नहीं करते। एक एनजीओ के लिए डा.रूचिता गोस्वामी ने मोबाइल, गैजेट्स के अत्यधिक इस्तेमाल का पारिवारिक संबंधों पर क्या असर पड़ता है, इस विषय पर रिसर्च किया जिसमें उन्होंने यह पाया है कि बच्चों से बातचीत करते या साथ में खाना खाते समय 30 फीसदी मां-बाप पूरी तरह से मोबाइल में उलझे हुए थे। 16 फीसदी बीच-बीच में स्मार्टफोन निहार रहे थे। शोधकर्ताओं ने यह भी महसूस किया कि अभिभावक जब मोबाइल फोन खंगालने में व्यस्त थे, तब बच्चे उनकी नजर पाने को तरस रहे थे। वे कोई न कोई गलती कर रहे थे, जिससे मां-बाप का ध्यान मोबाइल से हटकर उन पर पड़े । पर मां-बाप मोबाइल किनारे रखने या बंद करने को तैयार नहीं थे। वे या तो बच्चे को झिडक़ देते थे या फिर डांटकर शांत करा देते थे।

बढ़ रही है लोगों में दीवानगी
डा. रूचिता बताती है कि लोगों में होड़ सी लगी है सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने की। काम से फुर्सत मिली नहीं कि फेशबुक या व्हाट्सएप पर जुट जाते है। बच्चे क्या कर रहे है इसकी चिंता से ज्यादा अपडेट रहने की होड़ लगी रहती है। अपने बच्चों की ही फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड करते है पर बच्चों की भावनाएं कितनी आहत होती है इससे कोई लेना-देना नही होता है। 30 फीसदी अभिभावक बच्चों से बातचीत करते वक्त स्मार्टफोन खंगालने में व्यस्त रहते हैं । खाना खाते वक्त भी फोन पर नजरे टिकी रहती हैं। बच्चे अपनी तरफ मां-बाप का ध्यान खीचने के लिए गलतियां तक करते है, बावजूद इसके मां-बाप मोबाइल नहीं छोड़ते। बच्चों को झिडक़कर दोबारा फोन में लग जाते है।
अकेलेपन व उपेक्षा का पनप रहा अहसास
बाल विशेषज्ञ डा. नेहा जैन का कहना है कि बच्चे को सुख-सुविधा के सारे साधन मुहैया कराने मात्र से अभिभावकों की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती है। उसे प्यार, अपनेपन और सुरक्षा का एहसास कराना भी बेहद अहम है। जो मां-बाप इसमें असफल रहते हैं, वे बच्चों से भावनात्मक पक्ष पर नहीं जुड़ पाते हैं। इसके अलावा अकेलेपन और उपेक्षा के एहसास के चलते उनके बच्चे का व्यक्तित्व तथा मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।

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