बढ़ेगा भारत-फ्रांस तकनीकी सहकार

मोदी के भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता ग्रहण करने के बाद वाले दौर में निश्चय ही उभयपक्षीय सद्भाव में बढ़त हुई और मोदी के पहले राजकीय दौरे के बाद से ही परमाणविक ईंधन की सप्लाई के बारे में फ्रांस का रुख सकारात्मक दिखाई दिया। भारत-फ्रंस के बीच व्यापार का पैमाना अभी भी बहुत छोटा है और इसमें विस्तार की संभावनाएं प्रचुर हैं।

पुष्पेश पंत
भारतीय बाजार और भारत की तकनीकी क्षमता फ्रांस के लिए कम आकर्षक नहीं है। इसीलिए भारत-फ्रांस के बीच तकनीकी सहकार और व्यापार का दायरा निरंतर बढ़ रहा है। इस वर्ष गणतंत्र दिवस के पर्व पर हमारे खास मेहमान के रूप में फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद आमंत्रित हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि भारतीय सिपाहियों के साथ कदम ताल मिलाने के लिए विदेशी वर्दीधारी शामिल किये गये। यह संकेत स्पष्ट है कि फ्रांस के साथ भारत की सामरिक रिश्तेदारी निरंतर घनिष्ठ हो रही है।
भारत और फ्रांस के बीच तनाव कभी-कभार अपवाद स्वरूप ही राजनयिक असमंजस पैदा करनेवाला सिद्ध हुआ है। मसलन, 1956 में सुएज संकट के वक्त। यह सच है कि कभी 18वीं सदी में फ्रांस ने पुर्तगालियों और अंगरेजों के साथ-साथ औपनिवेशिक साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा के साथ ही भारत में कदम रखा था, पर 19वीं सदी के आरंभ में (यूरोपीय मंच पर नेपोलियन के सूर्यास्त के बाद) ही यह साफ हो चुका था कि वह इस उपमहाद्वीप में अंगरेजी ताकत और कूटनीति का मुकाबला नहीं कर सकता। पुद्दुचेरी (पांडिचेरी), चंद्रनगर, दमन-दिउ के छोटे भूभागों को छोड़ उन्होंने कभी यहां ‘राज’ नहीं किया और न ही हिंदुस्तानियों को अपना गुलाम समझा। अंगरेजी शासन के विरुद्ध लडऩेवाले सुब्रह्मण्यम भारती और श्री अरविंदो जैसे देशभक्त इस सूक्ष्म फ्रांसीसी उपनिवेश का उपयोग शरण्य के रूप में करते थे। आजादी के बाद फ्रांस ने इस उपमहाद्वीप में अपने नन्हे उपनिवेशों का हस्तांतरण शांतिपूर्ण परामर्श के बाद स्वाधीन भारत को कर दिया। अर्थात् फ्रांस की पहचान भारत के मित्र के रूप में काफी पुरानी और पक्की है। 1950 के दशक में फ्रांसीसी वास्तुकार ले कार्बूजिए ने चंडीगढ़ नगर के निर्माण की रूपरेखा तैयार की थी, जिसे आजाद भारत का पहला सुनियोजित नगर समझा जाता है। इसीलिए ओलांद की भारत यात्रा वहीं से शुरू की गयी।
मोदी के भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता ग्रहण करने के बाद वाले दौर में निश्चय ही उभयपक्षीय सद्भाव में बढ़त हुई और मोदी के पहले राजकीय दौरे के बाद से ही परमाण्विक ईंधन की सप्लाई के बारे में फ्रांस का रुख सकारात्मक दिखाई दिया। भारत-फ्रंस के बीच व्यापार का पैमाना अभी भी बहुत छोटा है और इसमें विस्तार की संभावनाएं प्रचुर हैं। इसलिए यह सोचना तर्कसंगत है कि ओलांद की भारत यात्रा के बाद इसके लिए भी जमीन तैयार की जा रही है।
इसके अलावा पिछले लगभग दो साल से हमारी सरकार का यह प्रयास रहा है कि वह देश के राजनयिक विकल्पों को सिर्फ महाशक्तियों तक सीमित न रखे और अन्यत्र मित्रों-सहयोगियों की तलाश करे। पिछले साल जब नरेंद्र मोदी ने फ्रांस की यात्रा की थी, तब राफेल लड़ाकू विमानों का एक महत्वपूर्ण सौदा हुआ था। जहां फ्रांस में इसको लेकर काफी उत्साह था, वहीं अमेरिका और ब्रिटेन में कुछ निराशा मुखर हुई थी, क्योंकि वे देश हमारी वायुसेना की जरूरतों की आपूर्ति करते रहे हैं। हालांकि, इस मामले में रूस पर भी हमारी काफी बड़ी पारंपरिक निर्भरता रही है, पर काफी समय से हम अपनी वायुसेना और स्थलसेना के लिए हथियार जुटाते वक्त इस निर्भरता को घटाने की कोशिश करते रहे हैं।
लड़ाकू विमानों के अलावा अलाउत नामक फ्रांसीसी हेलिकॉप्टर काफी समय से भारत के लिए उपयोगी रहे हैं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स कारखाने में इनके भारतीय अवतार चेतक का निर्माण अरसे से हो रहा है। यह उल्लेखनीय नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में भी फ्रांसीसी हवाई जहाज एयरबस सरकारी एवं निजी कंपनियों में काफी लोकप्रिय है। अमेरिकी बोइंग कंपनी को उसने इस बाजार में जबरदस्त टक्कर दी है। पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि दूरसंचार में एल्काटेल, या प्राण रक्षक औषधियों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रोश जैसी कंपनियां भारत में अपने को स्थापित करने में ज्यादा कामयाब नहीं हो सकी हैं।
भारत और फ्रांस के बीच कुल व्यापार अब भी बहुत सीमित है, महज 12 बिलियन यूरो का। वहां से यहां होनेवाला पूंजी निवेश भारत में होनेवाले कुल पूंजी निवेश का मात्र दो प्रतिशत है। पिछले दस वर्षों में यूपीए के शासनकाल में मनमोहन सिंह की राजनयिक निष्क्रियता के अलावा यूरोपीय समुदाय की पस्ती और पश्चिमी जगत का आर्थिक मंदी की चपेट में रहना भी इसके लिए जिम्मेवार समझे जाने चाहिए। हालांकि, यूरोपीय समुदाय के साथ भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार हमारे कुल अंतरराष्टï्रीय व्यापार का तकरीबन एक चौथाई हिस्सा है। फ्रांस के साथ उभयपक्षीय व्यापार के क्षेत्र में विस्तार की अपार संभावनाएं हैं।
यह याद दिलाने की जरूरत नहीं कि फ्रांस दुनिया का एकमात्र देश है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों की आपूर्ति प्रमुखत: परमाण्विक माध्यम से करता है। कॉर्बन प्रसरण का बढ़ता संकट हो या मध्यपूर्व की अस्थिरता के मद्देनजर ऊर्जा सुरक्षा की संवेदनशीलता, फ्रांस के साथ सहकार का सामरिक महत्व असंदिग्ध है। यहां यह जोडऩे की जरूरत है कि अमेरिका लंबे समय से (पोखरण परीक्षणों के बाद से) भारत के खिलाफ निषेधों के जरिये फ्रांस तथा अन्य देशों पर दबाव डालता रहा है कि वे भारत के साथ सहयोग न करें। आज यह स्थिति बदल चुकी है और फ्रांस को इस बात का अहसास है कि भारत के पास दूसरे विकल्प भी हैं।
आज यूरोपीय समुदाय के अंतर्विरोध- राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक- सन्निपात ज्वर के रूप में प्रकट हो रहे हैं। जर्मनी हो या फ्रांस इनके लिए अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को निरापद स्वस्थ रखना प्राथमिकता बन गया है। भारतीय बाजार और भारत की तकनीकी क्षमता फ्रांस के लिए कम आकर्षक नहीं।
इसीलिए तकनीकी सहकार व व्यापार का दायरा निरंतर बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में भारतीय वाहन निर्माता कंपनी महिंद्रा ने फ्रांस की रेनौल कंपनी के साथ समझौता कर उसी नाम से इन टिकाऊ गाडिय़ों का भारत में निर्माण आरंभ किया है। 2014-15 तक 18 भारतीय उपग्रह फ्रांसीसी एयरोस्पेस वैली द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गये। पिछले वर्षों में इसरो ने अपने पीएसएलवी रॉकेटों में दो फ्रांसीसी संचार उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे। दरअसल, राफेल सौदा 126 विमानों के लिए था, पर आखिर में यह 36 जहाजों की सरकारी खरीद तक सीमित रहा, क्योंकि भारत में इनके निर्माण के लिए तकनीकी हस्तांतरण पर सहमति नहीं हो सकी। परंतु, निकट भविष्य में इस बड़े सौदे को पुन: जीवनदान मिल सकता है। तीव्रगामी बुलेट ट्रेन के संदर्भ में भी फ्रांस जापान के साथ स्पर्धा में है। पेरिस में हुए आतंकी हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ जंग में हम दो देशों के राष्ट्रीय हितों का संयोग अनायास रेखांकित हो चुका है। यह सुझाना तर्कसंगत है कि आनेवाले दिनों में मौसम बदलाव से लेकर आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष तक सभी क्षेत्रों में भारत और फ्रांस की सामरिक साझेदारी घनिष्ठ होगी। साथ ही भारत में फ्रांसीसी पूंजी निवेश तथा तकनीकी सहकार भी बढ़ेगा।

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