बच्चों की जिद के आगे झुकते मां बाप

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

Captureलखनऊ। समय बदल रहा है लाइफ स्टाइल बदल रही है और समय के हिसाब से आज कल के बच्चों की डिमांड भी बदल रही है। पैरेंट्स पहले अपने बच्चों को अच्छे माक्र्स लाने पर रिस्ट वाच ए साइकिल या कोई छोटे मिठे गिफ्ट दिलाने का प्रॉमिस करते थे लेकिन अब इलेक्ट्रानिक आइटम्स मोबाइल, टैब, लैपटाप। लेकिन चलिए ये इलेक्ट्रॉनिक सामान दिलाना कुछ हद तक सही है। लेकिन जब बात हो बच्चों की जिंदगी को तो मां बाप उनकी विश पूरी करने के लिए उन्हें मौत के मुंह में क्यों ढकेल देते हैं। आज बच्चे ने 10वीं में अच्छे माक्र्स लाये नहीं कि उसे उसकी मनपसंद बाइक दिला दी जाती है ये जानते हुए भी कि 18 साल से कम उम्र के लोग वाहन नहीं चला सकते। उसके बावजूद लोग ऐसे कदम उठाते हैं। पैरेंट्स के प्यार का उनके लाडले नाजायज फायदा उठा रहे हैं। जिस उम्र में डीएल बनता उस उम्र में बच्चों के हाथ में बाइक आ गयी। नतीजा आये दिन एक्सीडेंट के रूप में सामने आ रहा है। कभी वो उस बाइक से स्टंट करके खुद को खतरे में दाल रहे तो कभी रह चलते लोग उसका शिकार हो जाते।

घरवालों के साथ स्कूल की भी लापरवाही
मोटे तौर पर माना जाता है कि स्टूडेंट की हाईस्कूल में एज 14 से 15 साल और इंटर के स्टूडेंट्स की एवरेज एज 16 से17 साल होती है। लेकिन स्कूलों की ओर से इस बारे में कोई डायरेक्शन ना होने का फायदा बच्चे उठाते हैं। और वह अपने गार्जियन से जिद कर बाइक हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं। अगर सभी स्कूल प्रभंधक इस बारे में कोई एक्शन ले तो शायद इस स्थिति में कोई सुधार आ सके। सीएमएस स्कूल में पडऩे वाले अनिरुद्ध शुक्ला का कहना है की मैंने अपने घर पर प्रॉमिस किया था की अगर मेरे अच्छे माक्र्स आए फाइनल में तो मुझे मेरी मनपसंद बाइक गिफ्ट के तौर पर दी जायगी। मैंने प?ाई में मेहनत की और मुझे पापा ने वो बाइक दिला दी है। अनिरुद्ध की तरह ऐसे कई और बच्चे हैं जिनकी विश इस तरह पूरी कर दी जाती है। सेंट फ्रांसिस में पढऩे वाली खुशबू ने बताया की मेरे कई फ्रेंड्स के पास बीके और स्कूटी है। वो सभी उसी से स्कूल आया करते हैं लेकिन मैं साइकिल से ही जाती थी ये बात मुझे अच्छी नहीं लगती थी इसलिए जब मैंने घर पर इस बारे में बात की तो मम्मी ने मुझे मेरे बर्थडे पर मुझे स्कूटी गिफ्ट करी जिससे मैं भी अब स्कूटी से स्कूल आती हूं।
वहीं 16 साल के आयुष सिंह ने बताया की अक्सर अपने घर पर खड़ी बाइक को चलाते हैं साथ ही वो उससे स्टंट भी करते हैं दोस्तों के साथ। यहां तक की कहीं टाइम से पहुंचने के लिए अक्सर वो बीके लेके निकलते हैं और स्पीड में चला के समय से पहुँच भी जाते हैं बल्कि घर पर तो कभी कोई रोक टॉक नही करता इसके लिए।
स्टेटस शो करने की होड़
बच्चों के साथ.साथ पैरेंट्स में भी स्टेटस शो करने की होड़ शुरु हो गयी है। ज्यादातर बच्चों को पेरेंट्स की ओर से मिल रही आजादी और महज इच्छा जता देने पर ही मनमाफिक चीज मिल जाने से उनकी हिम्मत में इजाफा हो रहा है। सोसाइटी में हाई स्टेटस दिखाने की होड़ में पेरेंट्स भी बच्चों के महंगे शौक पूरा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। या यूं कहे की आज अधिकतर मां बाप पैसे कमाने की होड़ में इस कदर अंधे होते चले जा रहे हैं की उन्हें ये तक दिखाई नही देता की उनका बच्चा उनसे जो जिद कर रहा है वो उसके लिए कितनी सही है। उन्हें ये तब समझ आता है जब उनके बच्चों को उनके दिए हुए उसी गिफ्ट से कोई नुक्सान पहुँचता है। जरुरत है बच्चों की सही विश को पूरा करने की।
सडक़ों पर रेस लगाते बच्चे

स्कूल जाने के लिए बच्चों के लिए कई साधन बनाये जाते हैं। जो उन्हें उनके स्कूल से ही उपलब्ध होता है। जैसे स्कूल बसए रिक्शाए स्कूल वैन या बच्चों की ही खुद की साइकिल। उसके बावजूद आज बच्चा ये सारी सुविधाएं छोड़ अपने लिए दो पहिये वाहन के लिए घर पर जिद करता है और मां बाप उस जिद के आगे तुरंत झुक जाते हैं। बाइक घर पर आ तो गयी लेकिन उसे चलाओ तो रूल्स के साथ। न वो भी कहां होना है इन सभी बच्चों से। सडक़ पर बाइक निकलते ही 40 से ऊपर की स्पीड पर बाइक या स्कूटी हवा से बातें करते हुए चलती है वो भी बिना हेलमेट के। इन सबके साथ स्कूल के कुछ ऐसे बच्चे भी हैं जो अपने दोस्तों को लिफ्ट देने के चक्कर में ट्रिपलिंग करके चलते हैं। साथ ही ट्रैफिक पुलिस के पकड़े जाने पर 100 का नोट थमाकर निकलने की कोशिश में लग जाते हैं।

पहले सिखायें रूल्स

शहर में ट्रैफिक लोड काफी बढ़ता जा रहा है । जिस उम्र में बच्चों के हाथ में साइकिल होती है उस उम्र में उनके हाथ में बाइक है। जोश और स्पीड दोनों पर काबू करना इनके लिए मुश्किल होता है। ना तो ट्रैफिक नियमों की जानकारी और ना ही गाडिय़ों पर कंट्रोल। यह उन बच्चों के साथ.साथ रोड पर निकलने वाले दूसरे सिटिजन के लिए भी मुसीबत पैदा करते हैं। हो सके तो बच्चों को ट्रैफिक रूल्स के बारे में जरूर बताएं साथ ही पेरेंट्स भी उसे फॉलो करे क्योंकि ऐसे करने पर बच्चे अपने पेरेंट्स का ही उदहारण समझेंगे।

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