बच्चों की गुमशुदगी

संयुक्त राष्ट्र  की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल औसतन साढ़े 44 हजार बच्चे गुम हो जाते हैं। उनमें से कई यौन-शोषण के अड्डों, भीख मंगवाने वाले या मानव अंगों की तस्करी करने वाले गिरोहों के पास पहुंचा दिए जाते हैं। गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल बहत्तर लाख बच्चे बाल दासता के शिकार होते हैं। इनमें एक तिहाई बच्चे दक्षिण एशियाई देशों के होते हैं।

sanjay sharma editor5एक गैर-सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर घंटे करीब ग्यारह बच्चे लापता हो जाते हैं। इसके अलावा जुलाई 2014 में गृह मंत्रालय की तरफ से संसद में जो आंकड़े पेश किए गए थे उनके अनुसार देश में 2011 से जून 2014 के बीच 3.25 लाख बच्चे लापता हुए। देश में लापता बच्चों का आंकड़ा घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। यह इतना संवेदनशील मुद्ïदा है फिर भी इस तरफ शासन-प्रशासन का ध्यान नहीं जाता। बच्चे लापता हो जाते हैं और उसकी सूचना पुलिस दर्ज कर लेती है लेकिन उसके बाद पुलिस सिर्फऔर सिर्फतर्क देती है। पुलिस का तर्क होता है कि कमजोर तबकों के गायब हुए बच्चे या तो कहीं भाग गए हैं या भटक गए हैं और कुछ समय बाद खुद लौट आएंगे। पर हकीकत कुछ और है, क्योंकि विभिन्न शोध, मानवाधिकार आयोग और गैर-सरकारी संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि लापता हुए ज्यादातर मासूम बच्चे तस्करी के शिकार हो जाते हैं।
देश में बाल तस्करों का जाल बढ़ रहा है और इस तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है। शायद इसी वजह से बाल तस्करी को लेकर उच्चतम न्यायालय ने बीते वर्षों में कठोर रुख अपनाते हुए, समय-समय पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को फटकार लगाई है। वर्ष 2014 में उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ और बिहार सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा था कि उन्होंने लापता बच्चों के मामले में 2013 में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया।
मालूम हो कि इन दोनों राज्यों में बच्चों के लापता होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मशीनी तरीके से जवाब दाखिल करने और जमीन पर कुछ नहीं करने का तमाशा बंद होना चाहिए। कुछ दिनों पहले केन्द्रीय गृह मंत्री ने भी मानव तस्करी को बड़ी चुनौती बताया था। यहां सवाल उठता है कि जब सरकार को भी यह चुनौती लग रही है तो इस दिशा में व्यापक स्तर पर काम क्यों नहीं हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र  की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल औसतन साढ़े 44 हजार बच्चे गुम हो जाते हैं। उनमें से कई यौन-शोषण के अड्डों, भीख मंगवाने वाले या मानव अंगों की तस्करी करने वाले गिरोहों के पास पहुंचा दिए जाते हैं। गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल बहत्तर लाख बच्चे बाल दासता के शिकार होते हैं। इनमें एक तिहाई बच्चे दक्षिण एशियाई देशों के होते हैं। भारत में स्थिति की गंभीरता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश के विभिन्न थानों में हर साल कुल करीब सात लाख बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हर वर्ष ‘एक्शन रिसर्च ऑन ट्रैफिकिंग इन वुमेन एण्ड चिल्ड्रेन’ रिपोर्ट जारी करता है जिसमें कहा जाता है कि जिन बच्चों का पता नहीं लगता वास्तव में लापता नहीं होते बल्कि उनका अवैध व्यापार किया जाता है।

Pin It