फैक्ट्री बिक गई, नहीं मिला वेतन

  • 22 वर्षों से न्याय के लिए दर-दर भटक रहे श्रमिक

-4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। न्याय के लिये सैकड़ों मजदूर आज भी भटकने पर मजबूर हैं। 22 वर्ष बाद भी उनको श्रम विभाग से न्याय की उम्मीद है। उनको आज भी लगता हैं कि उनका वेतन मिल जायेगा। हालत यह है कि 116 मजदूरों में 46 मजदूर न्याय के इन्तजार में भगवान को प्यारे हो गये। शेष 70 मजदूरों को श्रम विभाग से न्याय नहीं मिल सका। अधिकांश श्रमिक बूढ़े व इतने दुर्बल हो गये हैं कि उनसे कोई अब काम भी नहीं कराया जा सकता है।
अकबरी गेट लखनऊ स्थित अहमद हुसैन-दिलदार हुसैन नामक तम्बाकू फैक्ट्री लिमिटेड कम्पनी में ग्राम भपटामऊ, कसमण्डीकलां, जेहटा, काकोरी, दुर्गागंज, नौबस्ता, बड़ागांव, सेंधरवा, मौरा, कठिंगरा आदि गांवों के 116 श्रमिक मजदूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। अभिलेखों में दर्ज जानकारी के अनुसार 27 जुलाई 1991 में फैक्ट्री मालिक ने बिना नोटिस दिये श्रमिकों को बेरोजगार कर दिया था। जिसका विरोध श्रमिक यूनियन द्वारा किया गया था। जिसके परिणाम स्वरूप फैक्ट्री मालिक द्वारा फैक्ट्री में तालाबंदी कर दी गयी। तालाबंदी होने से बेरोजगार हुए श्रमिकों ने फैक्ट्री खुलवाने के लिए लेबर कोर्ट की शरण ली। उपश्रमायुक्त ने फैक्ट्री मालिक को निर्देशित किया कि तालाबंदी खत्म कर श्रमिकों को काम पर फिर से लगाया जाये। आदेश पर फैक्ट्री में एक बार फिर श्रमिकों को काम मिल गया। इसके एक वर्ष बाद फिर फैक्ट्री मालिक द्वारा तालाबंदी कर दी गयी। जिसका विरोध करने के बाद श्रमिकों ने लेबर कोर्ट में अपील दायर की। वर्ष 1999 में लेबर कोर्ट का फैसला एक बार फिर श्रमिकों के पक्ष में आया। जिसमें फैक्ट्री मालिक को आदेशित किया गया कि फैक्ट्री को बेच कर श्रमिकों का बकाया भुगतान किया जाये। आदेश पर फैक्ट्री तो बिक गयी लेकिन श्रमिकों को उनका भुगतान नहीं मिल सका। श्रमिक प्रतिनिधि मारूफ का कहना है कि श्रम मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक कई बार शिकायती पत्र दिया जा चुका हैं। लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुयी है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1999 से आज तक कई स्तरों पर इस मामले का न्याय श्रमिकों के हित में हुआ है। लेकिन राजनैतिक दबाव के चलते श्रमिकों को आज तक न्याय नहीं मिल पा रहा है। इस सम्बन्ध में श्रम उपायुक्त डीआर शुक्ला का कहना है कि मालिक व श्रमिकों के मध्य उत्पन्न विवाद को शीघ्र ही उनके स्तर से निपटा दिया जायेगा। फिलहाल वेतन की चाह में 46 श्रमिकों की मौत हो चुकी है और जो शेष बचे हैं उनमें अधिकतर बूढ़े व दुर्बल हैं, जो कार्य करने में असक्षम हैं।

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