फिर न करें नरमी बरतने की भूल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो जनवरी को पठानकोट आतंकवादी हमले के एक साल पूरे होने के बावजूद लखनऊ में आयोजित भाजपा की विशाल रैली में उसका कोई जिक्र नहीं किया। इसके अलावा उन्होंने उरी आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक का भी उल्लेख नहीं किया, जबकि उनकी सरकार व भाजपा ने आतंकवाद के संदर्भ में पाकिस्तान को सबक सिखाने के रूप में इसे न सिर्फ प्रचारित किया था, बल्कि इसका श्रेय भी लिया था। तो क्या माना जाए कि मोदी यूपी विधानसभा चुनाव अभियान को विकास के मुद्ïदे पर ही आगे बढ़ाना चाहते हैं? या इसका यह अर्थ निकाला जाए कि मोदी अब पाकिस्तान के प्रति अपने आक्रामक रुख में नरमी लाने की सोच रहे हैं?
मोदी ने बीते 25 दिसंबर को ट्वीट के जरिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को उनकी जन्मदिन की बधाई दी थी। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दोनों देशों के बीच तनाव को कुछ कम करेगा। बहरहाल, यह बात अभी अस्पष्ट है कि मोदी ने अपने एक दोस्त को सिर्फ शिष्टाचार के नाते ट्वीट किया था या इसके जरिए द्विपक्षीय संबंधों पर जमी बर्फ को पिघलाने का संकेत दिया था। हालांकि मोदी और नवाज के बीच निजी तौर पर अच्छे संबंध हैं। पूर्व में कई मौकों पर इसके सुबूत देखने को मिलते रहे हैं, जैसे कि गत वर्ष मई में लंदन में हार्ट सर्जरी के लिए ऑपरेशन थियेटर में जाने से पूर्व नवाज शरीफ ने मोदी को फोन किया था।
बीते वर्ष नवंबर के अंतिम दिनों में जनरल कमर बाजवा पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने थे। हालांकि इस बात की उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह भारत के प्रति पाकिस्तानी सेना की शत्रुतापूर्ण नीति से अलग कोई दृष्टिकोण अपनाएंगे, किंतु यह जरूर है कि जबसे वह सेना प्रमुख बने हैं, जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा और अंतरराष्टï्रीय सीमा के आसपास पाकिस्तान की तरफ से उकसावे वाली गोलीबारी नहीं हुई है। किंतु आतंकी हमले लगातार जारी हैं। एक महीने पहले नवाज शरीफ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने अमृतसर में हुए ‘हार्ट ऑफ एशिया’ सम्मेलन में पाकिस्तान की अगुआई की थी। तब उन्होंने संकेत दिया था कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर समेत सभी मुद्ïदों पर वार्ता शुरू करने के पक्ष में है, जबकि भारत ने स्पष्ट किया था कि जब तक पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद जारी रहेगा तब तक उससे कोई वार्ता संभव नहीं है।
भारत को अपनी इस नीति को जारी रखने की आवश्यकता है। इससे जरा-सा भी पीछे हटना देश के लिए खतरनाक साबित होगा, क्योंकि पूर्व की तरह ही इस बार भी इससे पाकिस्तान को यही संदेश जाएगा कि आतंकी हमलों के बाद एक बार जब भारत के लोगों का गुस्सा शांत हो जाता है तब भारत पुन: वार्ता की मेज पर आ जाता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि भारत न सिर्फ अपनी दृढ़ता बरकरार रखे, बल्कि अपने इस कथन पर भी कायम रहे कि आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते। यह इसलिए भी अधिक जरूरी है, क्योंकि पाकिस्तान में कट्ïटरपंथी मानसिकता का लगातार विस्तार हो रहा है। पाकिस्तान में कट्टरपंथी जमातों का मानना है कि भारत मुख्यत: एक हिंदू राष्टï्र है और दीर्घकाल में यह कई टुकड़ों में बंट जाएगा। ऐसे में भारत के लिए यह दिखाना जरूरी है कि भारतीय जनता और सरकार के पास अपने देश और इसके मूल्यों के लिए लडऩे की दृढ़ इच्छाशक्ति है।
पाकिस्तान में यह कट्ïटरपंथी सोच इन दिनों मुमताज कादरी के लिए बनाई जा रही मजार के जरिए स्पष्ट रूप से जाहिर हो रही है। मुमताज कादरी को पिछले साल फरवरी में पंजाब प्रांत के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर की हत्या करने के जुर्म में फांसी दी गई थी। कादरी एक पुलिसकर्मी था और तासीर का बॉडीगार्ड भी। उसने अन्य पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में तासीर की इसलिए हत्या कर दी थी, क्योंकि उसे लगा था कि वह ईशनिंदा कानून के खिलाफ हैं। इस पाकिस्तानी कानून में इस्लाम या पैगंबर मोहम्मद की निंदा करने वालों को मौत की सजा का प्रावधान है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने हेतु इसका खूब इस्तेमाल किया जाता है।
मामले की सुनवाई के दौरान कादरी को जब अदालत ले जाया जाता था, तब इस्लाम की रक्षा करने के लिए उस पर गुलाब की पंखुडिय़ां बरसाई जाती थीं। हालांकि कादरी के खिलाफ मामला एकदम शीशे की तरह साफ था, लिहाजा जजों को उसे दोषी ठहराने में कठिनाई नहीं हुई। सरकार को भी उसे फांसी पर लटकाना पड़ा, क्योंकि उसने एक ख्यात जननेता की हत्या की थी, जो उस समय एक बड़े पद पर काबिज थे। कादरी को फांसी पर लटकाने के खिलाफ पाकिस्तान के लगभग सभी प्रमुख शहरों में विरोध प्रदर्शन हुआ था। इस्लामाबाद बार एसोसिएशन ने भी उसके मृत्युदंड के खिलाफ विरोध प्रकट करने के लिए हड़ताल का आयोजन किया था। कादरी के समर्थन में पाकिस्तान के समाज में उठी यह आवाज दर्शा रही है कि वहां की सेना और राजनीतिक वर्ग ने वर्षों पूर्व जिन कट्टर नीतियों को आत्मसात किया था, आज पाकिस्तान उस रास्ते पर बढ़ चला है। पाकिस्तान के एक जाने-माने अखबार डॉन ने कादरी के एक समर्थक के बयान के हवाले से लिखा था कि कादरी ने पैगंबर के पक्ष में अपने जीवन का बलिदान देकर स्वयं के लिए सहानुभूति हासिल की है। कादरी के परिजनों व संबंधियों ने मुमताज कादरी शहीद फाउंडेशन का गठन किया है। वे उसके पैतृक गांव में उसके लिए एक मजार का निर्माण कर रहे हैं। इसके लिए पाकिस्तान में लोग भारी मात्रा में दान भी दे रहे हैं। डॉन की रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि मजार का निर्माण इस बात का संकेत है कि कानून के शासन के बावजूद समाज अपना अलग रास्ता चुन सकता है।
पाक में बढ़ती कट्ïटरता का एक और संकेत सिंध की विधानसभा द्वारा स्वीकृत उस बिल के विरोध में मिल रहा है, जिसमें जबरन धर्म परिवर्तन को प्रतिबंधित किया गया है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को इस्लाम धर्म कबूलने के लिए मजबूर करना आम बात है। एक हिंदू सदस्य द्वारा विधानसभा में यह बिल लाया गया था और उसे इस आधार पर स्वीकृत किया गया था कि इस्लाम जबरन धर्म परिवर्तन की अनुमति नहीं देता, लेकिन कट्ïटरपंथी पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं और वहां के गवर्नर ने अभी तक इस पर अपनी सहमति नहीं दी है।
कट्टरपंथ की राह पर चल रहे पाकिस्तान का सामना करने के लिए भारत को चाहिए कि वह अपनी दृढ़ता हमेशा जाहिर करता रहे और किसी तरह की नरमी बरतने का संकेत न दे, क्योंकि इसे भारत की कमजोरी माना जाएगा।

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